ये लंगड़ी नगरपालिकायें


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राजीव लोचन साह
May 15, 2018

दिक्कत यह है कि 73वें-74वें संविधान संशोधन कानून को लागू करने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है और उत्तराखंड बने 12 साल बीत जाने के बावजूद हमारे प्रदेश में अभी पंचायत कानून नहीं बने हैं। इसके पीछे राजनेता, नौकरशाहों और माफियाओं की उस तिकड़ी का स्वार्थ है, जिसका दबदबा ये कानून बनने से खत्म हो जायेगा…

(उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा 14 मई को नगरपालिकाओं का परिसीमन रद्द कर दिये जाने के बाद पालिकाएँ पुनः चर्चा में आ गयी हैं। मगर इस फैसले से चुनाव लड़ने वालों के उत्साह में कोई कमी नहीं आयी है। ऐसे में हम ‘नैनीताल समाचार’ के 15 से 30 अप्रेल 2013 के अंक में प्रकाशित अग्रलेख को पुनः प्रकाशित कर रहे हैं, जो आज भी प्रासंगिक है। यहाँ बताना भी प्रासंगिक है कि मुजफ्फरनगर काण्ड के बारे में ऐतिहासिक निर्णय देने के लिए ख्यात इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रवि स्वरूप धवन (अब स्वर्गीय) ने इस टिप्पणी से प्रभावित हो कर इसकी प्रतियाँ इलाहाबाद महापालिका में बंटवाई थीं।)

उत्तराखंड में नगर निकायों के चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो गई है। मई पहले हफ्ते तक सभी महापालिकाओं, नगरपालिकाओं और नगर पंचायतों का गठन हो जायेगा। इन चुनावों की घोषणा के साथ ही नगर-कस्बों में उत्साही लोगों की भीड़ उमड़ आयी है, जो मेयर-पालिकाध्यक्ष से लेकर वार्ड मेंबरी तक का चुनाव लड़ने को उतावली है। आम मतदाता में कोई विशेष उत्साह तो नहीं दिखाई देता, मगर वार्ड स्तर के चुनाव होने के कारण इन चुनावों में प्रत्याशी येन-केन-प्रकारेण अपने परिचितों को मतदानस्थल तक ले ही आते हैं। मीडिया भी अपने स्वार्थों के चलते माहौल बनाता है और मतदान का प्रतिशत ठीकठाक हो जाता है।

सवाल यह है कि क्या इन चुनावों से कुछ निकलता भी है ? और, चुनाव लड़ने वाले ये युयुत्सु अपने मकसद के प्रति कितने गंभीर हैं ?

प्रत्याशियों की भीड़ को देखकर पहली बात तो यह समझ में आती है कि चुनाव अब हमारे समाज की नस-नस में समा गया है। लोकसभा से लेकर छात्रसंघ, विधानसभा से लेकर व्यापार मंडल और पंचायतों से लेकर टैक्सी यूनियन तक के चुनाव लोग इसलिये लड़ते हैं, ताकि एक नेता के रूप में उनकी पहचान बने। पहचान बनाने की यह बेचैनी अपनी गाडि़यों में विविध प्रकार की प्लेटें टाँकने के रूप में भी देखी जाती हैं। इसी तरह यह भाव है कि चूँकि और कुछ नहीं किया जा सकता, इसलिये चुनाव लड़ लिया जाये, ताकि लोग पहचानने लगें। चुनाव क्यों लड़ रहे हैं, चुनाव जीत भी लेंगे तो करेंगे क्या, इस पर दिमाग की कोई सफाई नहीं होती। पाँच-दस प्रतिशत ही प्रत्याशी ऐसे होते हैं जो ईमानदारी से जनता की सेवा करने के उद्देश्य से चुनाव लड़ते हैं। इससे ज्यादा संख्या उन लोगों की होती है, जो सोचते हैं कि जीत गये तो किसी न किसी रूप में कमाने-खाने का एक जरिया बन जायेगा। मीडिया की रुचि चुनावों में इसलिये होती है, क्योंकि यह उसके लिये विज्ञापन कमाने का एक उत्सव जैसा है। पेडन्यूज के मामले पकड़े जाने के बाद कई अन्य तरीकों से पैसे कमाने के तरीके मीडिया ने खोज लिये हैं। इसलिये मीडिया ‘मतदाता जागरूकता’ जैसे बहानों से चुनावों के पक्ष में माहौल बनाने की पूरी कोशिश करता है। अखबारों के पन्ने नामांकन पर्चे दाखिल करने के अनावश्यक चित्रों से भरे रहते हैं। मुद्दों की बात उनमें कहीं नहीं होती।

कटु सच्चाई यह है कि जिस हाल में नगरपालिकायें आज हैं, वहाँ जाकर कुछ कर पाना संभव ही नहीं है। लोकतंत्र के लिये बहुत जरूरी होने के बावजूद विधायिकायें अपने मकसद में पूरी तरह असफल और आप्रासंगिक हो गई हैं, क्योंकि सारी ताकत कॉरपोरेट हितों के लिये काम करने वाली ‘योजना आयोग’ जैसी एक असंवैधानिक संस्था के हाथ में सिमट गई है और पंचायती राज संस्थाओं को उनका संवैधानिक हक दिया ही नहीं गया है। यहाँ पंचायती राज संस्थाओं की ही बात करें। 73वाँ-74वाँ संविधान संशोधन कानून लागू होने के बाद पंचायती राज संस्थाओं की स्थिति केन्द्र और राज्य सरकारों के समकक्ष हो गई है। संविधान के ‘भाग पाँच‘ में ‘केन्द्र’ और ‘भाग छः’ में ‘राज्य’ हैं तो ‘भाग 9’ में ‘पंचायतें’ और ‘भाग 9अ’ में ‘नगरपालिकायें’। इसीलिये वर्ष 2002 में पंचायत चुनाव करवाने में आनाकानी करने पर हमारे द्वारा एक जनहित याचिका, जिसमें यह आशंका व्यक्त की गई थी कि पंचायतों का गठन न होने से प्रदेश में संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है, लगाने के बाद तत्कालीन तिवारी सरकार को अनिच्छा से ही सही, चुनाव करवाने पड़े थे। 2012 में भी नगरपालिकाओं में ‘प्रशासक’ बैठाने की खंडूरी सरकार की कोशिश फलीभूत नहीं हुई।

दिक्कत यह है कि 73वें-74वें संविधान संशोधन कानून को लागू करने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है और उत्तराखंड बने 12 साल बीत जाने के बावजूद हमारे प्रदेश में अभी पंचायत कानून नहीं बने हैं। इसके पीछे राजनेता, नौकरशाहों और माफियाओं की उस तिकड़ी का स्वार्थ है, जिसका दबदबा ये कानून बनने से खत्म हो जायेगा।

आज तो शहरी निकाय पंगु और नौकरशाही के गुलाम हैं। नगरपालिकाओं के ऊपर विकास प्राधिकरण, जो लूट-खसोट के केन्द्र हैं और अब तो पूरी तरह असंवैधानिक भी हो गये हैं, बिठाये गये हैं। किसी नगरपालिका की कार्रवाही भी पुष्टि के लिये कमिश्नर के पास भेजी जाती है। नगरपालिका का अधिशासी अधिकारी प्रदेश शासन का अंग होता है और निर्वाचित पालिकाध्यक्ष से ज्यादा जिलाधिकारी के प्रति जवाबदेह होता है। वह पालिका के निर्णयों पर चाहे तो अमल करे, चाहे उन्हें अनदेखा कर दे, मगर डी.एम. की एक हाँक पर दौड़ अवश्य लगाता है। गाँव की हों या शहर की, सारी विकास योजनायें केन्द्रीकृत हैं और उनकी बागडोर जिलाधिकारी के पास होती है। पालिकाध्यक्ष या वार्ड मेंबरों की कोशिश यही रहती है केन्द्र और राज्य सरकारों की इन योजनाओं, जो विश्व बैंक या एशियन डेवलपमेंट बैंक आदि के ऋण पर निर्भर हैं, से ज्यादा से ज्यादा कैसे झपट लाया जाये। इनके लिये उन्हें सचिवालय के बाबुओं के आगे गिड़गिड़ाना पड़े, खिलाना-पिलाना पड़े तो भी कोई उज्र नहीं होता। उनका लालच यह होता है कि इन योजनाओं में इन तथाकथित जन प्रतिनिधियों को अपने हाथ गीले करने का भी मौका मिल जायेगा। जबकि 73वें-74वें संविधान संशोधन के बाद किसी आई.ए.एस. अधिकारी का पंचायती राज संस्थाओं में कोई हस्तक्षेप नहीं रह जाता। संविधान की बारहवीं अनुसूची के अनुसार नगरपालिकाओं को नगरीय योजना, भू उपयोग, आर्थिक और सामाजिक विकास, सड़कें और पुल, जल व्यवस्था, लोक स्वास्थ्य, अग्निशमन, पर्यावरण संरक्षण, दुर्बल वर्गाें की सुरक्षा, गंदी बस्ती सुधार, निर्धनता उन्मूलन, नगरीय सुविधाओं की व्यवस्था, साँस्कृतिक-शैक्षणिक उन्नयन, श्मशान घाट और कब्रिस्तान, कांजी हाउस, जन्म-मरण सांख्यिकी, पथ प्रकाश और वधशालाओं आदि की जो 18 जिम्मेदारियाँ सौंपी गई हैं, संविधान की धारा 243एक्स के अनुसार प्रदेश विधानसभा की मदद से वे उसके लिये टैक्स लगा सकती हैं। इस कानून में एक ‘जिला नियोजन समिति’ का बेहद महत्वपूर्ण प्रावधान है, जिसमें जिले की सभी पंचायतें और नगर निकाय मिल कर अपने संसाधनों और जरूरतों के अनुरूप योजनायें बना कर प्रदेश सरकार को भेजेंगी और प्रदेश वित्त आयोग इन योजनाओं के लिये आर्थिक संसाधन मुहैया करेगा। संविधान के अनुरूप जिला नियोजन समितियाँ गठित की जायें तो राज्य स्तरीय सचिवालय तक अप्रासंगिक हो जायेगा। उसका स्थान ये समितियाँ ले लेंगी। कहने को हमारे प्रदेश में एक अदद वित्त आयोग भी है और जिला नियोजन समितियाँ भी। लेकिन एक समर्थ पंचायती राज कानून के अभाव में वे सिर्फ शोभा बढ़ाने के लिये हैं।

ऐसे में यह समझ से बाहर है कि इन नगरपालिकाओं में जाने के लिये इतनी मारामारी हो क्यों रही है। एक बड़ी लड़ाई लड़ कर 73वें और 74वें संविधान संशोधन कानूनों के अनुरूप उत्तराखंड में पंचायत और नगरपालिका कानून बनाना पहली जरूरत है। उसी से संसाधनों की लूट-खसोट रुकेगी, राजनेता, नौकरशाहों और माफियाओं की तिकड़ी पर अंकुश लगेगा और ग्रामीण हो या शहरी, जनता अपनी इच्छा और जरूरतों के अनुसार अपना विकास स्वयं कर सकेगी। सरकार की हिम्मत नहीं होगी कि हमारे जल, जंगल और जमीन यों ही लुटा दे। कोई भी अभयारण्य जनता की सहमति के बगैर नहीं बनाया जा सकेगा, कहीं भी न तो जल विद्युत परियोजनायें जनता की राय लिये बगैर बनाई जायेंगी और न महिलाओं से पूछे बगैर शराब बेची जा सकेगी।

 

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