युद्ध- राजनैतिक दल-चुनाव- इतिहास-परिणाम- परम्परा और बदलाव


नैनीताल समाचार
March 6, 2019

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( द्वितीय विश्व युद्ध से 1999 तक )

९ मई १९४५ को जर्मन सेनाओं ने आधिकारिक रूप से मित्र राष्ट्र सेनाओं के आगे आत्मसमर्पण किया। इसी के साथ यूरोप में लगभग ४ वर्ष चलने वाले महायुद्ध का अंत भी हो गया। विजेता देश ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल देश के महानायक के रूप में स्थापित हो गए।

ब्रिटेन में दो ही बड़े राजनैतिक दल हैं – कंजर्वेटिव पार्टी एवं लेबर पार्टी (अन्य दलों की उपस्थिति न के बराबर ही )। विस्टन चर्चिल के नेतृत्व में ब्रिटेन जंग का नायक बन कर उभरा था, युद्ध के दौरान उनके नेतृत्व और निर्णय क्षमता पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं था। ब्रिटिश संसद का कार्यकाल समाप्त होने को था, अतः चुनाव की घोषणा भी हो गयी। लेबर पार्टी के नेता थे – क्लीमेंट एटली। युद्ध के दौरान लेबर पार्टी के नेता समय समय पर सरकारी नीतियों और निर्णयों की सार्वजनिक आलोचना करते ही रहते थे।

सामान्य रूप से राजनैतिक पंडितों एवं चुनाव विशेषज्ञों के अनुसार तो यह होना चाहिए था कि जिस नेता के नेतृत्व में विजय प्राप्त हुई, उस नेता और उसके दल के खिलाफ न कोई मुद्दा टिकना चाहिए था, न कोई राजनैतिक दल या नेता। पर जनता शायद ऐसा न सोचती थी, जैसा पंडित और विशेषज्ञ सोचते थे।

ऐतिहासिक युद्ध में ऐतिहासिक विजय के लगभग दो माह बाद (१९ जुलाई १९४५) को चुनाव परिणाम घोषित हुए तो विस्टन चर्चिल के दल (कंजरवेटिव पार्टी) की भारी हार हुई। लेबर पार्टी विजयी रही और उसके नेता क्लीमेंट एटली नए प्रधानमंत्री बने। विस्टन चर्चिल इतिहास बन गए।

सन १९९० में (अगस्त १९९०) में एक बड़े युद्ध की नींव रखी गयी। इस दिन ईराक ने अपने पडौसी देश कुवैत पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लिया। लेकिन यह हमला महज दो देशों के बीच का झगडा ही नहीं था बल्कि तेल पर नियंत्रण की राजनीति के चलते अंतर्राष्ट्रीय मसला भी था। अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया के कई देश एकजुट होने लगे। जार्ज एच डब्ल्यू बुश (रिपब्लिकन पार्टी) उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति थे और मारग्रेट थेचर ब्रिटिश प्रधानमन्त्री (कंजरवेटिव पार्टी), थेचर को यूरोप की लौह महिला भी कहा जाता था। ये दोनों ही देश नाटो के सबसे महत्वपूर्ण देश भी हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो शक्ति भी रखते हैं। दोनों ही नेता अपने अपने देश में सबसे लोकप्रिय नेता भी थे। ब्रिटेन की तरह अमेरिका भी मुख्यतः दो दल प्रधान (रिपब्लिकन दल एवं डेमोक्रेटिक दल) देश ही है।

फिर ईराक युद्ध हुआ, कुवैत को इराकी कब्जे से मुक्त कर लिया गया। अमेरिका और ब्रिटेन, दोनों ही युद्ध के अगुआ थे, तो निश्चित था कि विजय का श्रेय भी इनको ही मिलना था, मिला भी। यह अलग बात है कि युद्ध के दौरान दोनों ही देशों में युद्ध के खिलाफ भारी प्रदर्शन भी हुए, जिनमें विपक्षी दलों की भूमिका भी रही।

खाड़ी युद्ध की तैयारियों, युद्ध और युद्ध के बाद दो बड़ी राजनैतिक घटनाएँ हुई। पहली यह कि युद्ध की तैयारियों के दौरान ब्रिटन की प्रधानमंत्री और यूरोप की लौह महिला –मार्गरेट थेचर – को उन्हीं की पार्टी के एक बड़े नेता ने चुनौती दी और थेचर को पद छोड़ना पड़ा (उन्ही की पार्टी के जान मेजर उनके स्थान पर प्रधानमन्त्री बने )। दूसरी घटना युद्ध के बाद हुई, अमरीकी राष्ट्रपति के चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी हार गई और डेमोक्रेटिक पार्टी के बिल क्लिंटन राष्ट्रपति बने।

१९६५ में भारत –पाक युद्ध हुआ, कांग्रेस पार्टी के नेता और देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुरशास्त्री इस युद्ध के महानायक थे। शास्त्री जी के असमय निधन के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी। दो वर्ष बाद हुए आम चुनावों में कांग्रेस को वाकओवर नहीं दिया गया, सभी तत्कालीन विपक्षी दलों ने कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा। न सिर्फ चुनाव लड़ा, बल्कि देश में पहली बार विपक्षी दलों का गठबंधन भी बना। परिणाम यह रहा कि लोकसभा में बहुमत लाने के बावजूद कांग्रेस (जो कि सन ६५ की विजय का श्रेय ले चुकी थी) लोकसभा में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या घटी, साथ ही कई राज्यों में कांग्रेस बड़ी पार्टी होने के बावजूद विपक्ष के गठबंधन ने सरकारें बनायी (जिन्हें तब संविद –संयुक्त विधायक दल – सरकार कहा जाता था)।

९१७१ में पुनः भारत –पाक युद्ध हुआ। कांग्रेस तब देश की सबसे बड़ी पार्टी थी और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री। युद्ध में पाकिस्तान की करारी हार हुई और उसके दो टुकड़े भी हो गए। इंदिरा गांधी देश की महानायिका बन गयी। लेकिन दो ढाई वर्षों के अन्दर ही कांग्रेस और इंदिरा गांधी आंतरिक और बाह्य कारणों से दिक्कत में आ गयी। कांग्रेस के कुछ बड़े नेता बागी हो गए, और विपक्षी दल एक जुट होने लगे। १९७५ में गुजरात में हुए विधान सभा चुनावों में ७१ के युद्ध में विजय का श्रेय लेने वाली कांग्रेस को हार मिली और विपक्षी गठबंधन को जीत। इसके बाद जो हालात बिगड़े, उनके कारण इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने जैसा गलत – दमनकारी-अलोकतांत्रिक कदम उठाना पड़ा। बाद में विपक्षी दलों ने मिलकर एक नया दल ही बना लिया और 1977 के चुनावों में कांग्रेस को बुरी तरह से पराजय मिली।

१९९९ में कारगिल संघर्ष हुआ ,जिसमें पाकिस्तान को तगड़ी मार पड़ी। गठबंधन के नेता अटल बिहारी वाजपेयी तब देश के प्रधानमन्त्री थे। कारगिल विजय का सेहरा उन्ही के बाँधा जाना स्वाभाविक ही था, और उनकी स्वयं की लोकप्रियता – सहजस्वीकार्यता असंदिग्ध थी। किन्तु अगले आम चुनाव (२००४) में कारगिल विजय का श्रेय लेने वाले अटल जी की पार्टी एवं उनके गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा।

यह तो था इतिहास, अब परम्परा की बात

लोकतांत्रिक पद्धति के देशों में यह परम्परा रही है कि युद्ध हो या शांतिकाल, सत्तापक्ष एवं विपक्ष एक दूसरे की आलोचना करते ही रहते हैं, सहमति-असहमति की जुबानी जंग जारी रहती है। युद्ध में विजेता सरकार और नेता (प्रधानमंत्री /राष्ट्रपति ) को श्रेय भी दिया जाता है, और उस श्रेय में अनेकों किस्म के किन्तु-परन्तु-यदि-लेकिन जैसे सवाल उठा कर मीनमेख भी निकाली जाती रहीं हैं। कोई नयी बात नहीं है, पहले भी होता था, अब भी हो रहा है। हर राजनैतिक दल अपने वोट बैंक को बनाए रखने और उसे बढाने का जुगाड़ करता ही आया है, चाहे वह युद्धकाल हो या शांति का समय। देशसेवा –समाजसेवा के परम्परागत लोकलुभावने नारों के पीछे दुनिया के हर राजनैतिक दल के सिर्फ दो ही उद्धेश्य हुआ करते हैं – पहला, किसी तरह से सत्ता में आना, दूसरा – सत्ता में आने के बाद सत्ता को बचाए रखना।

यहाँ मैंने ब्रिटेन, अमेरिका और भारत के उदाहरण सिर्फ इसीलिए दिए हैं क्योंकि इन तीनों में कुछ समानताएं हैं, राजनीतिक रूप से (हमारी शासन पद्धति एवं संसदीय परम्परा ब्रिटेन की प्रमाणित प्रतिलिपि हैं, और चुनाव में अमेरिकन शैली का हम अनुकरण करने लगे हैं)। साम्यवादी देशों या तानाशाही वाले देशों का जिक्र इसलिए नहीं किया है क्योंकि वहां लोकतंत्र होता ही नहीं। इजराइल का जिक्र इसलिए नहीं कर रहा हूँ क्योंकि वहां की कुछ बातें बुनियादी रूप से अन्य देशों से भिन्न हैं। पहली – वहां संसद में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली है (जिस दल को जितने प्रतिशत मत मिलेंगे, उसी के अनुसार उसे संसद में स्थान भी मिलेंगे ), दूसरी सबसे बड़ी भिन्नता यह है कि कई राजनैतिक दल और राजनैतिक मतभेद होने के बावजूद आपातकाल के दौरान लिए जाने वाले निर्णयों के लिए बनी स्थायी समिति में वर्तमान प्रधानमन्त्री के साथ साथ पूर्व प्रधानमन्त्री (चाहे वे किसी भी दल के रहे हों) और विपक्ष का नेता भी अनिवार्य रूप से सदस्य होते हैं। युद्ध या संकट काल में लिए गए निर्णयों में सभी की भागेदारी रहती है।

बदलाव जो आये हैं, उनका जिक्र अपने देश के संदर्भ में ही करना चाहूँगा। आरोप –प्रत्यारोप, श्रेय लेने –छीनने की होड़ में कभी ऐसा नहीं हुआ कि दलों ने एक दूसरे पर देशद्रोही होने का आरोप लगाया हो। आजकल पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से बेभाव देशद्रोही होने या देशभक्त होने के प्रमाणपत्र बांटे जा रहे हैं, यह चिंताजनक है। असहमति या भिन्न राय को देशद्रोह घोषित करना लोकतंत्र की परम्परा नहीं है, ऐसा सिर्फ साम्यवादी देशों में होता है या तानाशाहों की परम्परा में।

और एक बदलाव आया है जोकि सतही तौर पर हास्य –व्यंग –विनोद तो दिखता है, पर है गंभीर मसला। समर्थक –विरोधी तो पहले भी होते थे, अब भी हैं, लेकिन आजकल एक नयी प्रजाति का जन्म और विकास हुआ है, वह है भक्त प्रजाति (फोटोशाप, फेक न्यूज़, गाली देना इनकी विशेषता है)। और इनके तर्क भी बड़े मजेदार होते हैं, मान लीजिये कि मैं चलते चलते मेरा पैर केले के छिलके पर पड़ जाय और मैं गिर जाऊं, तो भक्त तत्काल घोषित कर देंगे कि मैं तो अँधा हूँ, मैंने शराब पी रखी है आदि आदि। किन्तु इनके नेता जी गिर जाय तो भक्त कहेंगे – अहो ! धन्य है हमारे नेता जी, जो इस देश की माटी से इतना प्यार करते हैं कि आज दंडवत लेट कर माटी चूम रहे हैं, जय हो विजय हो।

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