वन विश्राम भवनों में पर्यटन पर अदालत की मनाही


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विनोद पाण्डे
August 3, 2018

सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय में देश भर के वन विश्राम भवनों का राजकीय उपयोग के अलावा किसी भी अन्य किस्म के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। न्यायालय ने कहा है कि ये भवन वनकर्मियों के वन और वन्य जीवों के संरक्षण, प्रबंधन और सुरक्षा संबधी कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान रहने के लिए बने हैं। इनका ईको पर्यटन या किसी अन्य नाम से प्राईवेट-पब्लिक पार्टिसिपेशन के रूप में व्यापारिक उपयोग न किया जाये। उत्तराखंड में इस फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
उत्तराखण्ड में करीब 66 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र के अंर्तगत है। यहां के वनों का ब्रिटिश काल, बल्कि उसके पूर्व से ही इतिहास रहा है। यहां की लोक कथाओं व लोकगीतों में जगह-जगह पर वन बसता है। वन यहां के लोगों की आजीविका से जुड़ा रहा है। यहां के जंगल ब्रिटिश हुकूमत की आमदनी का एक बहुत बड़ा स्रोत थे और उनके शिकारगाह भी थे, इसलिए उसने वनों में करीब प्रति 12 किमी. की दूरी पर विश्राम भवन बनाये थे। इनकी विशेषता यह थी कि ये जंगल के सबसे सुविधाजनक व संुदर स्थानों पर बनाये गये। इनकी बनावट से लेकर इनका फर्नीचर उच्च श्रेणी का था। साहबों के साथ के लाव लश्कर के रूकने के लिए भी क्वार्टर बने थे। किसी समय ये विश्राम भवन कुली बेगार जैसे बंदिशों के कारण भी रहे थे। जब तक वन विभाग में काम करने की संस्कृति थी, वन विभाग भ्रष्टाचार के दलदल में नहीं फंसा था, इन विश्राम भवनों का लगातार उपयोग होता रहा। कर्मनिष्ठ अधिकारी महीनों तक इनमें रहकर जंगलों का निरीक्षण और अध्ययन करते थे। उन दिनों वर्किंग प्लान और सिल्वीकल्चर जैसे प्रभागों में जाने के लिए वनाधिकारियों में होड़ लगी रहती थी। अब ये प्रभाग घोर उपेक्षा में चले गये हैं। बदली कार्य संस्कृति में अधिकारियों का जंगल से रिश्ता कमजोर हो गया। बढ़ते सड़कों के जाल से दिन में जंगल जा कर रात अपने घर लौट आना भी संभव हो गया। फलतः ये विश्राम भवन वनाधिकारियों से महरूम होते गये। दूसरी ओर ये इन अधिकारियों के परिचितों व अन्य विशिष्ट व्यक्तियों के लिए पिकनिक स्पाॅट बनने लगे। इधर ईको पर्यटन के जुम्ले ने जोर पकड़ा तो वन विभाग ने इनमें सैलानियों के रुकने की विधिवत घोषणा कर उनके किराये की व्यावसायिक दरें भी तय कर दीं। इसके साथ ही वन विभाग ने अधिकांश अच्छे विश्राम भवनों पर एक चमकीली किताब भी प्रकाशित कर दी। उत्तराखण्ड के वन विभाग की वैबसाइट पर ईको पर्यटन शीर्षक के नीचे ऐसे तमाम विश्राम भवनों की सूची उपलब्ध है।
प्रसिद्ध छायाकार व प्रकृति मित्र अनूप साह बताते हैं कि कई विश्राम भवनों के जीर्णोद्धार के नाम पर इनका दुर्लभ पुरातन फर्नीचर गायब कर दिया गया है। उसके स्थान आज के चालू फर्नीचर ने ले लिया है। सीमेंट-कंक्रीट के बदसूरत निर्माण ने इन विश्राम भवनों की विरासत का गौरव कम कर दिया है। इनके साथ जुड़ी पुरानी स्मृतियां भी ऐसे नवनिर्माण से नष्ट हो गयी हैं।
वन विभाग ने कई बार इन विश्राम भवनों को ईको पर्यटन के नाम पर वन निगम को देने के प्रस्ताव बनाये। परन्तु कुछेक विश्राम भवनों को छोड़ कर अन्य के बारे में बात नहीं बन पायी। दूसरी तरफ उत्तराखंड सरकार ने 2017 में ‘ईको पर्यटन विकास निगम’ की स्थापना कर व्यावसायिक स्तर पर स्वयं ईको पर्यटन करने की योजना बना डाली। कंपनी एक्ट के अंर्तगत पंजीकृत यह निगम पूरी तरह सरकार के स्वामित्व की कंपनी है। हालांकि प्रदेश सरकार अब तक अपनी ईको पर्यटन नीति भी नहीं बना पायी है। मगर इस नये निगम ने प्रदेश के वन विश्राम भवनों को आधार बना कर कार्ययोजना बनाने का काम शुरू कर दिया है। कुछ समय से वन विभाग पर्यटन को ध्यान में रख कर कुछ चुनिन्दा विश्राम भवनों में अतिरिक्त आवास की सुविधाएँ बढ़ाने में लगा है। थाणो, रसियाबगड़, महेशखान, विनायक आदि विश्राम भवनों का ईको पर्यटन के लिये उपयोग लगभग तय हो गया है। रसियाबगड़ चिड़ियापुर के निकट झिलमिल झील के पास है, जहां दुर्लभ पक्षी व बारहसिंघा प्रवास करते हैं। भारत सरकार के ‘स्वदेश दर्शन’ कार्यक्रम में भी उत्तराखंड के अनेक वन विश्राम गृहों का उपयोग प्रस्तावित था। विश्व प्रसिद्ध काॅर्बेट नेशनल पार्क में तो अधिकांश आवासीय सुविधा वन विश्राम भवनों में ही है।
सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद अब वन विभाग न स्वयं और न किसी अन्य के साथ मिल कर ईको पर्यटन या किसी अन्य नाम से इन वन विश्राम गृहों का उपयोग कर पायेगा। न्यायालय ने आदेश में यह भी कहा है कि जिला प्रशासन भी अब इन विश्राम गृहों का उपयोग वन विभाग की अनुमति से ही करेगा। इस वक्त जिला प्रशासन या राजनीतिक नेता जब चाहंे, अपनी मनमर्जी से वन विश्राम भवनों को अपने नियंत्रण में ले लेते थे।
उत्तराखंड के वन विभाग के मुखिया जयराज ने इस निर्णय का स्वागत किया है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एन.सी.टी.ए.) के इस प्रस्ताव, कि बाघ के नाम पर किये जा रहे पर्यटन को धीरे-धीरे कम किया जाये और अन्ततः टाइगर रिजर्वों में रा़ित्र विश्राम को पूर्णतः समाप्त कर दिया जाये, को इस निर्णय से बल मिला है। काॅर्बेट पार्क में सन् 2023 तक रात्रि विश्राम पूरी तरह बंद कर देना प्रस्तावित किया जा चुका है। काॅर्बेट के सूत्र बताते हैं कि उन्हें मिलने वाले लगभग 9 करोड़ रुपये प्रति वर्ष के राजस्व में रात्रि विश्राम से केवल 15 प्रतिशत ही प्राप्त होता है।
यदि इस निर्णय का सरकार और पार्कों से जुड़े कारोबारियों ने कोई तोड़ न निकाला तो काॅबेट नेशनल पार्क व अन्य अभयारण्यों व पार्कों में पर्यटन वर्तमान स्वरूप निश्चित रूप से बदलेगा। हो सकता है कि वहां पर्यटन काफी हद तक पर्यावरण सम्मत हो जाये। अब देखना है कि सरकार इस निर्णय को ईमानदारी से लागू करती है या फिर इसके पर कुतरने का प्रयास करती है। इस मौके पर एक बार फिर दयाल सिंह पटवाल याद आते हैं जो बेदिनी बुग्याल व उसके आसपास वन विभाग के इसी प्रकार के तथाकथित ईको पर्यटन के विरुद्ध तमाम मोर्चो पर लड़ते रहे और अंत में हाईकोर्ट की शरण में आये। पर अपने मामले का निर्णय सुनने से पहले ही वे इस दुनिया को से अलविदा कह गये।

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विनोद पाण्डे

प्रकृति और पर्यावरण में विशेष रुचि रखने वाले विनोद पांडे नैनीताल समाचार के प्रबन्ध सम्पादक हैं.