उत्तराखंड में बोफोर्स तोप से डराया जा रहा है सीमान्त गांव वालों को


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July 27, 2018

-इस्लाम हुसैन

जी हां…गांव वालों को डराया जा रहा है…यह काम भारती फौज नहीं कर रही है, विकास करने का दावा करने वाली सरकार और उसके नुमाइंदे बोफोर्स तोप को आगे करके उत्तराखंड में गंगा के उद्गम सीमान्त क्षेत्र के सुक्खी, जसपुर, पुराली और झाला के ग्रामीणों को डरा रहे हैं….।

उन ग्रामीणों को जिन्होने 1962 के युद्ध के दौरान भारतीय फौजों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दुश्मनों से लोहा लिया था…। उन ग्रामीणों को जिन्होंने अपनी उपजाऊ ज़मीन मिलिट्री सप्लाई और पहुंच के लिए बनाई जाने वाली सड़क के लिए बिना मुआवजा खुशी ख़ुशी सरकार को सौंप दी….उन ग्रामीणों को दबाने की कोशिश की जारही है जिन्होने बर्फ में फंसे फौजियों के पिट्ठू ढोकर अपने गांव में फौजियों को टिकाया और खाना खिलाया…।

इस अजब विरोधाभासी कहानी के दृश्य विकास के नाम पर तिब्बती सीमान्त क्षेत्र और विख्यात तीर्थ स्थल गंगोत्री मार्ग पर घटित हो रहे हैं….। जहां सरकार आल वेदर रोड के नाम पर गंगा के उद्गम और ग्लेशियर क्षेत्र में हजारों देवदार के पेड़ काटकर, ग्रामीणों को रोजी रोटी से बेदखल करके 24 मीटर की फोर लेन, यानी चार गाड़ियों के एक साथ चलने वाली सड़क बनाने जा रही है…..।

तर्क दिया जा रहा है कि बोफोर्स तोप को तिब्बत सीमा तक पहुंचाने के लिए बहुत चौड़ी सड़क होना ज़रूरी है।
ग्रामीणों का कहना है कि 6 मीटर के मौजूदा सड़क को 1-2 मीटर चौड़ा करके और अंधे मोड़ों को सीधा करके बड़ी से बड़ी तोप गाड़ी आसानी से ले जाई जा सकती है…। जब दूरस्थ सियाचिन जैसे सड़क रहित क्षेत्र में युद्ध सामग्री पहुंचाई जा सकती है , यहां तो अपेक्षाकृत काफी चौड़ी सड़क है…।

लेकिन सरकारी ज़िद है कि सुक्खी जसपुर पराली व झाला गांवों से होकर जाने वाली रोड हरिद्वार/उत्तरकाशी गंगोत्री रोड चूंकि ऊंचाई पर है, और जिससे आवागमन सुचारु नहीं रहता इसलिए सुक्खी गांव से पहले सुक्खी मोड़ से गंगा के इस पार से होकर उसपार से नई सड़क बनाई जाए जो झाला में मिल जाए। भले ही ऊंचाई के चार गांव छूट जाएं….। इस खतरनाक सोच का ग्रामीण विरोध कर रहे हैं जिन गावों ने देश रक्षा के लिए रोड बनाने व फौजी स्टेशन बनाने के वास्ते अपनी उपजाऊ और समतल जमीन मुफ्त में बिना मुआवजे के दे दी हो, उन गांवों को सड़क से काट कर छोड़कर उन्हे बर्बाद करने की कोशिश को किसी भी तरह उचित नहीं कहा जाएगा।

यहां बताना ज़रूरी है कि गंगोत्री मार्ग में ऊंचाई पर बसे चार गांव की लगभग ढाई तीन हजार की आबादी में इक्का दुक्का ही सरकारी नौकरी या फौज में हैं। ज़्यादातर अपने सेब के बगीचों और नगदी फसलों रागी, लोबिया राजमा को उगाकर स्वरोजगार में लगे हैं…। यदि यह गांव सड़क से कट गए तो यह उत्तराखंड में बढ़ रहे पलायन का एक और कारण बनेगा तथा यह सरकार की स्वरोजगार की योजना पर भी एक प्रहार होगा। यह प्रश्न उत्तराखंड में पलायन की बड़ी समस्या से भी जुड़ा है, सरकार ने उसके कारण और निवारण के लिए आयोग तक गठित कर दिया है , तो दूसरी ओर सरकार उत्तराखंड के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त फोर लेन बनाने के निर्णय से नैसर्गिक संसाधनों को बर्बाद करके पलायन को प्रश्रय दे रही है। होना तो यह चाहिए था कि पहाड़ी कृषि और बागबानी के बल पर इस बीहड़ और सीमान्त क्षेत्र में जमें हुए ग्रामीणों को प्रोत्साहित करके सीमाओं को आबादी विहीन होने से बचाया जाता, परन्तु सरकार ही यहां के ग्रामीणों को बेदखल करने जा रही है।

इस कहानी एक पेंच और भी है ईको सेंसेटिव अर्थात पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इन कच्चे पहाड़ों पर फोर लेन बनाने की आत्मघाती योजना के लिए ऊंचाई पर अवस्थित चार गांवों को तो छोड़ा जा ही रहा है..भूगर्भीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील 80-90 डिगरी की खड़ी चट्टानों को काट कर 24मीटर की फोर लेन बनाकर पहाड़ी की चोटी तक के ग्लेशियर को खतरे में डाला जा रहा है, और उन पर लगे बचे हरे देवदार के पेड़ों को काटने का मंसूबा बनाया जा रहा है । जिससे घाटी में बह रही गंगा में मलवा आने और झील बनकर उसकी अविरलता खत्म होने की आशंका हो गई है ।

सुक्खी बैंड से गंगा के इस पार से होकर उस पार तक जिस क्षेत्र में सड़क प्रस्तावित है । वह क्षेत्र पिछले अनेक वर्षों से मानव उपस्थिति से शून्य व उच्च हिमालयी पशु पक्षियों का प्रवास स्थल रहा है। सड़क बनने से..जैसा की विश्वास है उन मूक पशु-पक्षियों का प्रवास ख़तरे में पड़ जाएगा..जो कि इस नैसर्गिक क्षेत्र के लिए बहुत घातक होगा। अब इस पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र में मूक पशु पक्षियों की अभिभावक सरकार उनके सफाए की योजना बना रही है।

प्रसिद्ध गंगोत्री धाम से पहले धार्मिक स्थल भैरव घाटी और धराली व हरसिल के विख्यात पर्यटन स्थलों की सुंदरता और शीतलता भी ख़तरे में पड़ गई है वहां 24 मीटर की फोर लेन  ऑल वेदर रोड (जिसका मूल नाम चारधाम यात्रा मार्ग था) बनाने के लिए लगभग 10 हजार देवदार के पेड़ो को काटने के लिए पेड़ों पर छापे लगा दिए हैं…पेड़ काटकर रोड के आधार पर पर्यटन बढाने का विचार कितना घातक है यह वक़्त बताएगा।

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