कला का बड़ा उद्देश्य समाज को बेहतरीन बनाना है : बंजारा


रोहित जोशी
November 28, 2017
यूं तो एक चित्रकार को समझने बूझने के लिए उसके कैनवास के भीतर ही झांकना होगा लेकिन एक चित्रकार के भीतर के कलाकार की समग्र गहराई को सिर्फ कुछ कैनवास देखकर समझ पाना मुश्किल है। इसकी दो वजहें हैं एक तो ये कि चित्रकला विचार के संप्रेषण का बहुत सहज माध्यम नहीं है और दूसरा कि चित्रकार एक कैनवास में एक ही विषय को छू रहा होता है। इससे समग्र रूप में चित्रकार की कलात्मक गहराइयों को पकड़ पाना असंभव तो नहीं पर मुश्किल जरूर हो जाता है। अल्मोड़ा के चित्रकार नवीन वर्मा ‘बंजारा’ से जब मुलाकात हुई तो उनकी पेंटिंग्स को देखते हुए यही मुश्किल मेरे सामने भी थी लेकिन यहीं जब उनसे बातें हुई तो इस मुश्किल का समाधान भी मुझे मिल गया। बातें करना सबसे सहज माध्यम है संप्रेषण का। और एक चित्रकार से, उसे समझने के लिए बातें भी की जा सकती हैं। तो जो बातें बंजारा जी से मेरी हुई हैं उनसे मैं उन्हें जितना समझा वो रहा मेरी समझदारी पर। बहरहाल जो बातें हुई उनकी कुछ कतरनें यहां पेश  हैं…
 -रोहित जोशी
प्र0ः-कला के प्रति आपकी अभिरूचि कहां से जन्मीं?
बंजारा जीः- हमारा पारिवारिक माहौल कला का ही रहा है। मेरे मामा जी चित्रकार एम0 एल0 वर्मा जी चित्रकार आर0एस0 बिष्ट जी के समकालीन रहे हैं। एल0 एम0 सेन के शिष्य रहे हैं। चित्रकार राम लाल वर्मा जी हमारे रिलेटिव रहे हैं। मैं भी इनके माहौल में ही चित्रकला की ओर आकर्षित हुआ।
प्र0ः- आपकी चित्रकला सम्बन्धी शिक्षा कहां से रही? 
बंजारा जीः-लखनऊ आर्टस् कालेज से मेरी शिक्षा रही है। मैं चित्रकार आर0 एस0 बिष्ट, बद्री आर्या, और शिरखण्डी आदि का शिष्य रहा हूं।
प्र0ः- आपने किन-किन विधाओं और विषयों पर काम किया है?
बंजारा जीः- मैंने चित्रकला के अतिरिक्त मूर्तिकला में भी काम किया है। मेरी बनाई हुई विवेकानन्द की एक बड़ी मूर्ति अल्मोड़ा कालेज में लगी हुई है। इसके अतिरिक्त क्ले माडलिंग में भी मैंने काम किया है। चित्रकला में लैण्डस्केप. ऐबस्ट्रैक्ट, पोट्रेट, आदि पर भी काम किया है।
प्र0ः- एक सवाल आपसे लोक कला के संदर्भ में करना चाहुंगा कि लोक कला कहां से जन्मती है। 
बंजारा जीः- ये तो सर्वमान्य प्रचलित धारणा है कि-मानवीय सभ्यताओं में रेखाओं द्वारा प्रकृति को अनुकृत करने का एक जज़्बा रहा है। यहीं लोककला भी जन्मती है, यहीं लोकचित्रकला भी जन्मती है। लोक बड़ा ही गूढ़ शब्द है। लोक सीधे ही जन मानस से जुड़ा होता है। तो, जमीन से जुड़े होने की अपनी अभिव्यक्ति के लिए वह विभिन्न सहज माध्यम ढूंढता है और प्रस्फुटित होता है। कुमाऊॅ के परिप्रेक्ष में हम इस लोक कला की परम्परा को देखें तो प्रतिनिधि रूप में ‘ऐपण’ को पाते हैं। जिसमें रेखाओं से द्विआयामी आकार बने हैं। आप आदिकालीन मानव द्वारा चित्रित चित्रों को देखेंगे तो वहां भी रेखाऐं ही हैं। चित्रण की स्टाइल कैलियोग्राफिक है। उसके विकासक्रम में आप ‘ऐपण’ सरीखी लोक कलाओं का विकासक्रम भी समझ सकते हैं। लोक कला की इस विधा पर कई कलाकर्मियों ने काम किया है। तिलकपुर की हरिप्रिया बुआ, नाथूराम उप्रेती, डा0 बिन्दु, लक्की बुआ, रेवती वर्मा, आदि ने बहुत काम किया है।
प्र0ः- गढ़वाल में जो मौलाराम की चित्रकला परम्परा, भारतीय चित्रकला की एक कलम के रूप में विकसित हुई ऐसी कोई कला परम्परा कुमाऊॅ में क्यों नहीं दिखाई देती है? इसके पीछे आप किन कारणों को उत्तरदाई मानते हैं? क्या कुमाऊॅ में ऐसे चित्रकार नहीं रहे हैं!
बंजारा जीः- देखिए कुमाऊॅ में चित्रकारों की तो एक बड़ी परम्परा रही है। लेकिन सवाल है कि वे कलाकार उस रूप में स्थापित नहीं हो पाए जैसे कि मौलाराम। लेकिन लोककलाओं का जो मूल चरित्र है वह है सामूहिकता। इसके चलते परम्पराऐं तो स्थापित होती ही हैं, व्यक्ति विशेष की नहीं अपितु समूह विशेष की। तो, यहां की ‘ऐपण’ परम्परा वहां मौलाराम की कलम के समकक्ष ही है।
 
प्र0ः लोककला से चित्रकला के समग्र जगत की ओर लौटें तो कला को समाज के परिप्रेक्ष्य में प्रारम्भ से ही कहां पाते हैं? 
बंजारा जीः सामान्य आदमी कला के प्रतीकात्मक प्रतिमानों को नहीं समझता। उसके लिए समाज का राजनैतिक व सामाजिक माहौल जिम्मेदार रहता है। यूरोपीय पुनर्जागरण के दौर में देखिए राजनैतिक सामाजिक समझदारी ने ही कला को सर्वोत्तम स्थान पर पहुचाया। सामान्य व्यक्ति भी गम्भीर कला के प्रति आकृष्ट था। भारतीय परिप्रेक्ष में देखिए तो अकबर, शाहजहां आदि बादशाहों के समय में कला को प्रश्रय मिलने से ही इन बादशाहों का दौर स्वर्णिम काल कहलाया। इसके अतिरिक्त भारतीय पुनर्जागरण भी इसका उदाहरण है।
प्र0ः- कला का उद्देश्य क्या होना चाहिए? उसके सामाजिक सरोकार क्या होने चाहिए?
बंजारा जीः- देखिए कला निरन्तर राजनैतिक हथियार के रूप में भी प्रयोग होती आई है। जैसे माइकोवस्की की पोएट्री को आप ले लीजिए,डा0 जीवागो जैसी कृतियां, महान लेखक मक्सिम गोर्की और भी अन्य सृजनकार रहे हैं जिन्होंने अपने सृजन से समाज को दिशा दी है। कला के उद्देश्य को निर्धारित अगर किया जाय तो स्पष्ट है कि जहां कला उत्कृष्ट के सृजन की खोज है, वहीं उसका बड़ा उद्देश्य समाज को बेहतरीन बनाना भी होना चाहिए।
(बंजारा जी से संपर्क का पता – 
नवीन वर्मा ‘बंजारा’
निकट अल्मोड़ा किताबघर,
मालरोड अल्मोड़ा उत्तराखण्ड। )
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रोहित जोशी

स्वतंत्र पत्रकार, संपर्क : rohit.versatile@gmail.com