क्या फर्क है कांग्रेस-भाजपा में ?


नैनीताल समाचार
January 1, 2019

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‘दि एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फिल्म को लेकर कांग्रेस द्वारा किये जा रह बबाल से साबित होता है कि कांग्रेस भी भाजपा से कम असहिष्णु नहीं है या फिर अब वह नेहरू के जमाने की कांग्रेस कतई नहीं रही। जब उसके युवा अध्यक्ष राहुल गांधी जनेऊ पहन कर मंदिरों के चक्कर लगाने की घटनाओं को बाकायदा प्रचारित करते हैं, तो ताज्जुब होता है कि क्या वे उन्हीं इन्दिरा गांधी के पोते हैं, जिन्होंने चेतावनी पाने के बाद भी धर्म निरपेक्षता पर पूरी निष्ठा रखते हुए अपने सिख अंगरक्षकों को हटाने से इन्कार कर दिया था। नेहरू के बारे में तो कहा जाता है कि जब कार्टून पत्रिका ‘शंकर्स वीकली’ में उनके बारे में छपे कार्टूनों को लेकर उनके सहयोगी उनसे शिकायत करते थे तो नेहरू का जवाब होता था कि यह तो कार्टूनिस्ट की जिम्मेदारी होती है। उपरोक्त विवादास्पद फिल्म एक पुस्तक पर आधारित है और यदि कोई विवाद था तो उसे उसके प्रकाशित होते समय सामने आ जाना चाहिये था। फिल्म बनने के बाद शिकायत सिर्फ लेखक को हो सकती है कि उनकी किताब के साथ छेड़छाड़ की गई है। यह सम्भव है कि इस फिल्म का निर्माण एक षड़यंत्र के तहत किया गया हो। झूठ की फैक्ट्रियों से अफवाहें पैदा कर मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से जनसाधारण में बेहिसाब घृणा फैलाने का माद्दा रखने वाली भाजपा के लिये ऐसा करना कतई नामुमकिन नहीं है। मगर इस प्रकरण में कांग्रेस की प्रतिक्रिया भाजपा से अलग कैसे रही ? जो लोग राम मन्दिर मामले को लेकर भाजपा द्वारा तूफान खड़ा करने से बहुत अधिक चिन्तित हैं, उन्हें याद रखना चाहिये कि देश को यह लाइलाज बीमारी राजीव गांधी द्वारा ही दी गई थी, जब शाहबानो मामले में कठमुल्लाओं के सामने घुटने टेकने के बाद संतुलन साधने की कवायद के तहत उन्होंने राम जन्मभूमि का ताला खुलवा दिया था। कांग्रेस से आप इतनी ही उम्मीद रखिये कि वह आज के खतरों के बीच देश के टूटने के खतरों पर फौरी तौर पर थोड़ा सा ब्रेक लगा दे। इससे ज्यादा नहीं।

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