तो क्या है ‘पंचेश्वर बाँध’ पर नेपाल का रुख?


रोहित जोशी
January 18, 2018

पंचेश्वर बांध पर नेपाल का क्या रुख है? भारत में पंचेश्वर बांध बनाने को लेकर तेज़ी से चल रही कार्रवाइयों के बीच यह प्रश्न बेहद अहम है क्योंकि महाकाली संधि के पिछले दो दशकों से नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता ही पंचेश्वर बांध के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा रही है। पढ़ें, नेपाल में हुए हालिया चुनावों में वाम गठबंधन (नेकपा एमाले और नेकपा माओवादी सेंटर) की भारी जीत के बाद अब क्या है नेपाल का रुख?

आज़ादी के बाद जब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बांधों और उद्योगों को आधुनिक भारत के नए मंदिर बताया था उसी दौर में उत्तर प्रदेश के पहाड़ी ज़िले अल्मोड़ा में नेपाल से जुड़ते सुदूर इलाके में बसे पंचेश्वर में भी एक विशाल बांध का सपना देखा गया था। बाद में यह क्षेत्र अल्मोड़ा ज़िले से टूट कर बने पिथौरागढ़ ज़िले में आया और नवंबर 2000 में यह इलाक़ा उत्तरप्रदेश से टूटकर बने उत्तराखंड राज्य का हिस्सा था।
हालांकि कई दशकों तक नेहरू के इस सपने की दिशा में कोई काम नहीं हुआ लेकिन फरवरी 1996 में भारत और नेपाल के बीच हुई महाकाली संधि में इस सपने को साकार करने की दिशा में कदम उठाए गए। इस संधि के तहत दोनों देशों के बीच बहने वाली महाकाली नदी पर पंचेश्वर में एक विशाल बांध बनाने की योजना तैयार की गई लेकिन नेपाल इस दौर में एक राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था जिसके चलते इस संधि पर कोई बात आगे नहीं बढ़ सकी।

नेपाल की अस्थिरता और पंचेश्वर बाँध

1990 के दशक में नेपाल में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी का जबरदस्त उभार हुआ और उसके भूमिगत् सशस्त्र संघर्ष ने राजशाही में जी रहे नेपाल को राजनीतिक तौर पर अस्थिर कर दिया। राजशाही का प्रभाव धीरे-धीरे घटता जा रहा था और नेपाली माओवादी पार्टी अपना प्रभाव बढ़ाती जा रही थी। हालांकि राजा की अपनी संसद में भी नेपाली कांग्रेस और नेकपा ‘एमाले’ दो ऐसे राजनीतिक दबाव समूह थे जो कि नेपाल की राजनीति में असरदार थे लेकिन भूमिगत् नेकपा माओवादी का उभार इतना जबरदस्त था कि इसने नेपाल में राजशाही को ख़तरे में डाल दिया। नेपाली राज्य और माओवादी आंदोलन के बीच के इस युद्ध ने नेपाल में एक स्थाई राजनीतिक स्थिरता को आकार दिया जो कि नेपाल में राजशाही के ख़ात्मे के साथ ही ख़त्म हुई।
28 मई 2008 का दिन नेपाल के ​इतिहास की कुछ एक निर्णायक तारीखों में से एक है। नेपाल की जनता, राजनीतिक पार्टियां और रा​जनीतिक विश्लेषक इसे नेपाल में क्रांति का दिन मानते हैं। इसी दिन राजशाही के अंत की घोषणा हुई और नेपाल को एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के तौर पर घोषित किया गया।
यहां से नेपाल ने एक नए युग में प्रवेश किया लेकिन राज​नीतिक अस्थिरता यहां ख़त्म नहीं हुई जबकि उसने भी एक नए दौर में प्रवेश किया और यह दौर था संविधान निर्माण की एक जटिल प्रक्रिया का। संविधान सभा के पहले चुनाव में नेपाली क्रांति में भूमिगत् रह कर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ​अदा ​करने वाली पार्टी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी ‘माओवादी’ को जबरदस्त जनसमर्थन मिला और वह 220 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। पार्टी के अध्यक्ष पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ नेपाल के प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री बनने के एक दिन पूर्व एक साक्षात्कार में बड़े बांधों के प्रति प्रचंड ने नकारात्मक रवैया दिखाया था। इससे कयास लगाए जा रहे थे कि नेपाल की माओवादी सरकार पंचेश्वर बांध को ख़ारिज़ कर देगी।

माओवादियों का बदला रुख़

 नेपाली क्रांति से पहले जब नेकपा माओवादी एक भूमिगत् पार्टी थी तो उस समय महाकाली संधि के बारे में पार्टी का आधिकारिक रुख़ था कि यह संधि भारत और यूएन के दबाव में कराई गई संधि थी जिसमें नेपाल के हितों की अनदेखी की गई थी इसलिए पार्टी इस संधि का विरोध करती थी।
लेकिन सत्तारूढ़ होने के सातवें महीने में ही 14 नवंबर 2008 को प्रचंड ने भारत में टिहरी बांध का दौरा किया। प्रचंड ने अपने टिहरी दौरे में कहा, ”नेपाल में एक ज़बरदस्त राजनीतिक बदलाव हुआ है और अब वहां इसी तरह एक और ज़बरदस्त बदलाव आएगा और वह बदलाव होगा विकास का।”
हालांकि प्रचंड ने यहां पंचेश्वर बांध पर कोई बयान नहीं दिया लेकिन इस दौरे को महाकाली संधि के तहत पंचेश्वर बांध की ओर नेपाल की तरफ से बढ़ाए गए कदम की तरह देखा गया। प्रचंड के बड़े बांधों के विरोध में कुछ न कहने से भी इस आशंका को बल मिला। टीवी चैनलों में उन्हें बांध भ्रमण के बाद गदगद देखा गया। प्रचंड का यह बदला रुख़ भूमिगत् नेकपा माओवादी के रुख़ का बिल्कुल विपरीत था।
इसे स्पष्ट करने के लिए मैंने उसी दौर में नेकपा माओवादी के अंतराष्ट्रीय मामलों के प्रवक्ता दीनानाथ शर्मा से दूरभाष पर बात की। उन्होंने इस बात की पुष्टि की। उन्होंने कहा ”हम इस बांध के पूर्णतया समर्थन में हैं। पार्टी विकास के विरोध में नहीं हो सकती। नेपाल एक हिमालयी राज्य है और पानी के अलावा हमारे पास कोई दूसरा प्राकृतिक संसाधन नहीं है। ऐसे में अगर हम पानी का विदोहन नहीं करते तो हमारा औद्योगिक विकास कैसे होगा? विकास हमारी प्राथमिकता है।” उन्होंने आगे कहा, ”लेकिन इस बात का पूरा ख़याल रखा जाएगा कि बांध से प्रभावित होने वाले क्षेत्र की जनता के पुनर्वास और मुआवज़े की पूरी व्यवस्था हो और उनके अधिकारों के साथ खिलवाड़ न हो।”

नए गतिरोध

नेपाली माओवादी पार्टी के रुख़ में आए इस बदलाव के बाद पंचेश्वर बांध के रास्ते की एक बड़ी अड़चन दूर हो गई थी। हालांकि भारत में यूपीए 2 सरकार में जब तक जयराम रमेश वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री के स्वतंत्र प्रभार में थे तो उनके पर्यावरण पक्षीय और पर्यावरण मंजूरियों के बारे में सख़्त रुझान के चलते पंचेश्वर बांध जैसी विशाल और पर्यावरण की दृष्टि से असम्मत परियोजना को हरी झंडी मिलना दुष्कर था। इसलिए पंचेश्वर बांध पर नेपाल की ओर से काफी सकारात्मक संकेतों के बावजूद भी पंचेश्वर बांध के बारे में कोई भी बात आगे बढ़ती नहीं दिख रही थी।​
साथ ही नेपाल, संविधान निर्माण की एक बड़ी जटिल प्रक्रिया में मशगूल था और उसकी राजनीतिक अस्थिरता दूर नहीं हो पाई थी क्यों​कि नेपाल की सभी राजनीतिक पार्टियां संविधान के किसी एक मसौदे पर सहमत नहीं हो पा रही थी। इस गतिरोध के चलते नेकपा माओवादी की लोकप्रियता में ज़रूर कमी आने लगी क्योंकि माओवादी पार्टी लोगों के विश्वास को पूरा नहीं कर पाई थी। 28 मई 2012 को पहली संविधान सभा को भंग कर दिया गया क्योंकि यह एक नया संविधान बनाने में नाकाम रही थी। इसके बाद 2013 में दूसरी संविधान सभा के चुनाव हुए और नेकपा माओवादी बुरी तरह हारी और पहली संविधान सभा में 220 सीटों के बजाय दूसरी संविधान सभा में यह 82 सीटों में आ सिमटी। शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस इन चुनावों में 207 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और वहीं नेकपा एमाले ने भी बढ़त बनाते हुए 181 सीटें पाई।
दूसरी संविधान सभा एक संविधान के मसौदे पर सहमत हुई जिसमें कुल 598 में से 538 सदस्यों ने पक्ष में मतदान किया जबकि 60 सदस्यों ने इसके विपक्ष में वोट डाला। और इसके साथ ही संविधान निर्माण का गतिरोध ख़त्म हुआ और नेपाल ने 20 सितंबर 2015 को एक नए संविधान को स्वीकारा।

2014 मोदी विजय और पंचेश्वर का ज़िन्न

इधर मई 2014 में भारत में सत्ता परिवर्तन हो चुका था और ‘विकास’ को प्रेरित नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी भारी बहुमत के साथ सरकार में आई। और इसके साथ ही दुनिया भर में अतीत की चीज़ मान लिए गए विशाल बांधों में से एक ‘पंचेश्वर बांध’ का ज़िन्न भी बाहर निकाला। भारतीय प्रधानमंत्री की 2014 में हुई दो नेपाल यात्राओं के बीच पंचेश्वर बांध पर बातचीत आगे बढ़ी।
इस पर ​मेरी नज़र तब गई जब प्रधानमंत्री द्वारा सार्क सम्मलेन के लिए किये गए नेपाल दौरे के बाद भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने काठमांडू में एक प्रेस कांफ्रेंस कर कहा, ”प्रधानमंत्री की 100 दिनों के भीतर हुई दो नेपाल यात्राओं के दौरान नेपाल के साथ 25-30 सालों से अटके कई महत्वपूर्ण मसले आगे बढ़े हैं।”
हालांकि इस प्रेस कांफ्रेंस में ‘पंचेश्वर बहुउद्दे​श्यीय परियोजना’ का सीधे ज़िक्र तो नहीं किया गया था लेकिन क्योंकि मैं उसी भूगोल से आता हूं ​जो इस बांध का प्रभावित क्षेत्र है तो मेरी स्वाभाविक रुचि यह जानने में थी कि प्रधानमंत्री की इन दो यात्राओं के दौरान ‘पंचेश्वर बहुउद्दे​श्यीय परियोजना’ पर क्या बात हो रही है।
मैंने भारत के जल संसाधन मंत्रालय और नेपाल के उर्जा मंत्रालयों की वेबसाइट्स खंगाली तो सब सामने था। दोनों देशों की ओर से 10-10 करोड़ रुपये मिलाकर ‘पंचेश्वर विकास प्राधिकरण’ बना दिया गया था जिसका काम परियोजना की डीपीआर बनाना और पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाना था।
इसके बाद प्रक्रियाएं काफी आगे बढ़ी हैं भारत में ईआईए और डीपीआर तैयार कर लिया गया है और प्रभावित क्षेत्रों में पर्याव​रणीय जन सुनवाइयां भी आयोजित की गई हैं। एनवायर्मेंट अप्रेजल कमेटी की दो बैठकों में पंचेश्वर बांध पर चर्चा भी हो चुकी है। और परियोजना, पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के काफी करीब है।

नेपाली राजनीति में पंचेश्वर बांध

लेकिन नेपाल में ये कवायद कहां तक बढ़ी है यह जानने में सबकी रुचि हो सकती है। नेपाल का संविधान बनने के बाद पिछले दिनों नेपाल में अपने संविधान के अनुसार पहले चुनाव सम्पन्न हुए जुसमें वाम गठबंधन की भारी जीत हुई। नेकपा एमाले सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और तीसरे नंबर पर रही नेकपा माओवादी सेंटर से उसका गठबंधन था। नेपाली कॉंग्रेस दूसरे पायदान पर रही।

नेपाल में हुए इन चुनावों के साथ—साथ ही भारत में पंचेश्वर बांध की कवायद भी काफी तेज़ है। ऐसे में इन चुनावों के परिणामों का असर पंचेश्वर बांध के लिए महत्वपूर्ण है। जैसा कि नेकपा माओवादियों के आधिकारिक रुख़ को इस आलेख में पहले ही बताया गया है कि वह इस बांध के पक्ष में है। इसके अलावा नेपाल के दो बड़े राजनीतिक दल हैं नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले। क्योंकि नेपाली कांग्रेस पहले भी कभी महाकाली संधि के विरोध में नहीं रही है और उसका पंचेश्वर बांध के बारे में रुख समर्थन का ही रहा है। नेपाल के निवर्तमान प्रधानमंत्री और नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा अगस्त के महीने में भारत के अपने दौरे में प्रधानमंत्री के साथ हुई मुलाक़ात में पंचेश्वर बांध को लेकर चर्चा की। दोनों देशों ने पंचेश्वर बांध को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। वहीं पिछले दिनों दार्चुला (बैतड़ी) की अपनी एक चुनावी सभा में भी देउबा ने इस बात को फिर से दोहराया कि वे सरकार में आते ही पंचेश्वर बांध बनाएंगे। उन्होंने पंचेश्वर बांध से पूरे क्षेत्र के विकास की उम्मीद जताई।

नेकपा एमाले का पंचेश्वर बाँध पर रुझान 

नेपाल की इन दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के पंचेश्वर बांध पर समर्थन के बाद अब नज़रें ​तीसरी सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी ‘एमाले’ पर आ कर टिकती हैं। क्योंकि नेकपा ‘एमाले’ अब नेपाल में सबसे बड़ी पार्टी है और ऐसे में अगर वाम गठबंधन नेपाल में सरकार बनाता है और जिसका नेतृत्व एमाले के हाथ में हो तो उसका पंचेश्वर बांध पर रुझान काफी महत्वपूर्ण हो सकता है। नेपाल और भारत के  राजनीति/कूटनीतिक संबंधों पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का मानना रहा है कि ‘एमाले’ नेपाली जनता में साश्वत रहे ‘भारत विरोध’ की भावना को पोषित करती है। पार्टी अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली की छवि भारत विरोध की रही है। ऐसे में यह माना जा रहा था कि सरकार बनाने की स्थिति में ‘एमाले’ पंचेश्वर बांध के ख़िलाफ जा सकती है।

लेकिन ऐसा है नहीं। नेकपा ‘एमाले’ के अंतराष्ट्रीय मामलों के विभाग के सदस्य और अब महेंद्र नगर सीट से प्रतिनिधि सभा के सदस्य सांसद डॉ. दीपक प्रकाश भट्ट से पिछले दिनों महेन्द्र नगर में हुई एक मुलाक़ात में उन्होंने मुझे अपनी पार्टी का पंचेश्वर बांध के बारे में रुझान स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, ”हमारी पार्टी पंचेश्वर बांध के पक्ष में है। हम इस परियोजना को बनाएंगे। सिर्फ पंचेश्वर ही नहीं ज​बकि हमें महाकाली संधि के दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा। महाकाली संधि सिर्फ पंचेश्वर बांध तक ही सीमित नहीं है।” पंचेश्वर बांध से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताओं पर पूछे गए सवाल पर डॉ भट्ट का कहना था, ”देखिए! नेपाल का डिस्कोर्स अलग है। हमारे यहां काठमांडू में तक कई बार 18 घंटे का शट डाउन रहता है। ऊर्जा हमारे विकास की प्राथमिक ज़रूरत है।” उन्होंने आगे कहा, ”नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक स्थिरता और विकास की है। हमारी पार्टी ने नेपाल की जनता को ये दोनों चीज़ें देने का वादा किया है। एक स्थिर सरकार देने के लिए हमने नेकपा ‘माओवा​दी’ के साथ गठबंधन किया है और विकास के लिए हमें देश भर में जल विद्युत परियोजनाएं ​स्थापित करनी हैं और पंचेश्वर बांध उनमें से एक है।”

तो नेकपा एमाले के इस आधिकारिक बयान से अब स्पष्ट है कि पंचेश्वर बांध को लेकर पार्टी का रुख इसे बनाए जाने के पक्ष में है। इसका अर्थ यह है कि नेपाल की तीनों ही बड़ी राजनीतिक पार्टियां पंचेश्वर बांध के समर्थन में हैं। ऐसे में नई सरकार भी पंचेश्वर बांध को आगे बढ़ाए जाने के प्रति प्रतिबद्ध होगी। इधर भारत में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना की कवायद को आगे बढ़ाया है और विपक्षी दल कांग्रेस अब तक पंचेश्वर बांध पर अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं कर पाया है (कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं से हुई बातचीत में उन्होंने कहा व्यक्तिगत् तौर पर तो वे बड़े बांधों के खिलाफ हैं लेकिन पार्टी पोजिशन क्या है यह उन्हें नहीं मालूम।) तो ऐसे में पंचेश्वर बांध के लिए दोनों देशों के राजनीतिक दल तकरीबन एकमत दिखाई दे रहे हैं।

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रोहित जोशी

स्वतंत्र पत्रकार, संपर्क : rohit.versatile@gmail.com