श्रीनगर से रानीखेत वाया देघाट


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अरुण कुकसाल
May 7, 2018

उत्तराखंड के जननायक स्वर्गीय वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली जी ने दूधातोली को स्वीजरलैंड से भी खूबसूरत मानते हुए भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का प्रस्ताव भारत सरकार को सन् 1960 में दिया था। कहते हैं कि उनकी इस मांग पर सर्वे भी हुआ था। गढ़वाल-कुमाऊं विश्वविद्यालय यहीं खोलने की बात उन्होने कही थी। और तो और गढ़वाली जी ने थलीसैंण तक रेल मार्ग की योजना बना कर भारत सरकार को भेजी थी।

 

यात्रा के साथी- अजय मोहन नेगी, सीताराम बहुगुणा और ललित मोहन कोठियाल

श्रीनगर से सुबह 4 बजे चल कर खण्डाह के पहले ही बीच सड़क पर चहलकदमी करते गुलदार को देख सीताराम बहुगुणा ने हड़बडी में गाड़ी रोकी तो गुलदार ने एक नजर भर हमको देखा जैसे कह रहा हो ’इतनी भोर में कहां को’ और फिर आराम से नीचे गधेरे की ओर चल दिया। उसके लिए यह सामान्य बात थी पर हमारे लिए जीने-मरने की बात हो गई थी। थोड़ी देर ही सही पर कपंकपी तो आ ही गयी थी हमारे चेहरे पर। चलो, यात्रा की बौंणी (शुभारंभ) अच्छी हो गई, मैने कहा तो ‘किसकी बौंणी अपनी तो सूख गई थी गौलि (गला)श्, सीताराम ने गाड़ी की स्पीड़ बड़ा ली। मुझे याद आया कि पौड़ी से वर्षों पहले पैदल श्रीनगर आते हुए ठीक इसी जगह पर बाघ से ऐसे ही मुलाकात हुई थी। पौड़ी पहुंचे तो ललित कोठियाल और अजय मोहन नेगी को साथ लेने के इंतजार में लगा कि पहाड़ियों के पांच मिनट का इंतजार पचास मिनट में भी पूरा हो जाय तो गनीमत समझो।

हम श्रीनगरवासियों के लिए साफ मौसम में ‘सुबह का पौड़ी’ जन्नत ही समझो, नजरें है कि हिमालय की चोटियों से हटती नहीं। और फिर सुबह-सुबह पौड़ी से बुवाखाल हाते हुए खिर्सू वाली सड़क पर जाना हो तो सुहानअल्लाह ! क्या कहने। पौड़ी से 10 किमी. मांडाखाल मेें खिर्सू वाली सड़क छोड़कर दायीं ओर की पाबो वाली राह हमको पकड़नी है। मांडाखाल कभी राजशाही और अंग्रेजी हुकूमत के दौर में श्रीनगर से कुमाऊं की ओर जाने वाले पैदल राजपथ का प्रमुख पड़ाव हुआ करता था। आजकल तो स्थानीय उत्पादोें पर आधारित उद्यम चलाने वाले उद्यमी पंत जी के कारण चर्चाओं में है। यहीं से गढ़वाल की एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान वाला राठ क्षेत्र शुरू होने को होता है। कहते हैं राष्ट्र से राठ बना। बलशाली, कर्मठ, निड़र और संगठित राठ के राठी लोग । राठ क्षेत्र की सांस्कृतिक सीमाओं में पूर्वी और पश्चिमी नयार नदी के आस-पास के इलाके जिसमें पाबो और थलीसैंण का इलाका प्रमुखता शामिल है। कभी वीरोंखाल और घूमाकोट भी राठी पहचान लिए हुए थे। वर्तमान में चोपड़ाकोट, चैथान, ढाइज्यूली और बाली कंडारस्यूं राठ की प्रमुख पट्टियां है। बचपन में सबसे पहले मैने मां से मेहनती और बहादुर राठी लोगों के बारे में सुना था जो कि उस समय कोटद्वार से आने-जाने वाले ढ़ाकरियों (पैदल घरेलू जरूरतों का सामान ढ़ोने वाले) के लिए रास्ते के पड़ावों में रहने और खाने-पीने में व्यावसायिक रूप में मदद करते थे।

मांडाखाल की धार से चैपड़्यूं गांव तक 12 किमी. नीचे उतरती हुई सड़क पर चलते हुए लगा कि गुमखाल से सतपुली की ओर जा रहे हों। चैंपड्यूं से पाबो 5 किमी. है। आप गढ़वाली हो और महीनों बाद पाबो बाजार से गुजर रहे हों तो गढ़वाली के मशहूर गीतकार और गायक अनिल बिष्ट के ‘आ-जा ऐ ! भानुमती पाबौ बाजारा’ गाने की याद तो आयेगी ही। पाबो एक बहुत बड़े ग्रामीण इलाके का बाजार है। लिहाजा सुबह से ही चहल-पहल होना लाजिमी है। सुबह के 7 बजे हैं और पाबो बाजार के एक छोर से दूसरे छोर तक छोटी-बड़ी खड़ी गाडियों की लम्बी लाईन पसरी है। दोपहर होते ये सब अपने-अपने मोटर लाईनों पर दौड़ती नजर आयेगीं। पहाड़ी युवाओं के लिए सबसे सरल और मनपंसद रोजगार जीप चलाना ही है और कोई दूसरा उद्यम सूझता भी तो नहीं। अब जब ज्यादातर युवा गाड़ी चलाने का ही काम करेंगे तो आपसी खींचतानी वाला कम्पटीशन होना लाजिघ्मी है। लिहाजा पहाड़ में केवल जीप चलाने से गूजर-बसर करना कठिन होता जा रहा है। पाबौ से 8 किमी. पर मूसागली है। बिट्रिश शासन में बना डाक बंगला यहां है। मूसागली नाम क्यों पड़ा होगा ? मैने पूछा तो अजय का कहना है कि यहां कभी मूसों (चूहओं) की भरमार थी। चलो मान लेते हैं। बहरहाल, हम अब फैली घाटी से एक संकरे क्षेत्र की ओर मुखातिब हैं। चिपलघाट, चपलोड़ी के बाद आया सैंजी गांव। सैंजी उत्तराखंड के लोकप्रिय नेता स्वर्गीय डाॅ. शिवानंद नौटियाल जी का पैतृक गांव है। सड़क से लगा ही उनका पुश्तैनी घर है, जिसके बाहर उनकी मूर्ति स्वागतार्थ लगी है। बेहतर होता मूर्ति के निचले हिस्से में उद्घाटनकर्ताओं की जगह नौटियाल जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में उल्लेखित होता। डाॅ. शिवानंद नौटियाल ने उप्र में शिक्षा एवं पर्वतीय विकास मंत्री रहते हुए राठ क्षेत्र में शिक्षा और रोजगार को बड़ावा दिया था। उनका गढ़वाल के लोक सहित्य को संकलित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान है। हमारी कोशिश है कि उनके घर के आस-पास के किसी व्यक्ति से बातचीत हो जाय। पर आवाज पर आवाज देने पर भी सुनसानी ही हाथ आयी। लगा जैसे भगवान मूर्तियों में जगह -जगह विराजमान हैं, उसी तरह मानवीय समाज के नायक भी मूर्तियों में ढ़लकर मौन हैं। आम समाज में अब उनका वजूद दिखता नहीं है।

सैंजी से नौठा 3 किमी. पर है। चैपड्घ्यूं से समतल और लदां-लदां (हल्की चढ़ाई) के बाद नौठा मोड़ से तीखी चढ़ाई शुरू हुई है। भरसार यहां से 8 किमी. हैै। भरसार की अब पहचान औद्योनिकी विश्वविद्यालय से होने लगी है। अजय बताते हैं कि पहले यहां पंतनगर विश्वविद्यालय का एक्सटैंशन सैंटर था। वर्ष 2011 में पंतनगर विश्वविद्यालय के रानीचैरी और भरसार परिसरों को मिलाकर श्वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली औद्योनिकी विश्वविद्यालयश् बनाया गया है। वर्तमान में देश भर के 400 से अधिक छात्र-छात्रायें यहां औद्योनिकी विषय की उच्च शिक्षा ले रहे हैं। भरसार से आगे की ओर जंगल की गहनता बड़ती जा रही है। चीड़ की बजाय बांज और बुरांस से जंगल भरे-भरे से हैं। पहाड़ों में बुरांस अब जल्दी फूलने लगा है। क्लामेट चैंज, ग्लोबल वार्मिगं जैसे शब्द अक्सर अब इसीलिए सेमीनारों में बोले जाते हैं। ललित बताते हैं कि यह सारा इलाका दूधातोली वन रेंज के अन्तर्गत आता है।

उत्तराखंड का ‘पामीर’ कहा जाने वाला ‘दूधातोली क्षेत्र’ चमोली, पौड़ी और अल्मोड़ा जनपद की सीमाओं का सम्मलित भू-भाग है। दूधातोली का भावार्थ है कि ‘दूध से भरी तोली’ (एक बर्तन)। घने और हरे-भरे जंगलों की उपस्थिति ने जनसामान्य में इसे ‘हरियाली का समुद्र’ की उपमा भी मिली है। दूधातोली के उत्तरी दिशा में अधिक घना जंगल होने से उसे ‘हरियाली डांडा’ कहा जाता है जहां इस इलाके की ईष्ट देवीध्कुल देवी ‘हरियाली देवी’ रहती है। वन, जल, खनिज, धन-धान्य से भरपूर इस इलाके में कई हिम शिखर श्वेत मुकटों की तरह शोभायमान हैं। दूधातोली क्षेत्र से 5 नदियां यथा- पश्चिमी रामगंगा, पूर्वी नयार, पश्चिमी नयार, बीनौ और आटागाड़ का उदगम क्षेत्र है। साल भर पानी से भरपूर ये नदियां गढ़वाल-कुमाऊं के हजारों गावों की जीवनदायनी है। इन नदियों की मछलियां बहुत प्रसिद्व हैं। औषधीय वनस्पति, बांज, देवदार, कैल, बुरांस, चीता, गुलदार, हिरण, काकड के साथ अनेकों पक्षियों का यहां डेरा रहता है। कभी दूधातोली लोहा और तांबे के लिए बहुत प्रसिद्ध था।

उत्तराखंड के जननायक स्वर्गीय वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली जी ने दूधातोली को स्वीजरलैंड से भी खूबसूरत मानते हुए भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का प्रस्ताव भारत सरकार को सन् 1960 में दिया था। कहते हैं कि उनकी इस मांग पर सर्वे भी हुआ था। गढ़वाल-कुमाऊं विश्वविद्यालय यहीं खोलने की बात उन्होने कही थी। और तो और गढ़वाली जी ने थलीसैंण तक रेल मार्ग की योजना बना कर भारत सरकार को भेजी थी।

भरसार से चैंरीखाल 12 किमी. है। ड्रायवर साहब का हुक्म हुआ नाश्ता यहीं पर करेंगे। अब कैसे कहूं कि श्रीमती जी ने मुझे भोर में ही 4 रोटी का नाश्ता खिला दिया था। अपने को तो पत्नी जी का आदेश श्घर से भूखा नहीं जाना हैश् के अनुपालन में कभी चूक नहीं हुई है। फिर भी यात्रा के दौरान मित्रों का नाश्ते में साथ देना तो फर्ज बनता है। समतल और ऊंची धार पर स्थित चैंरीखाल (समुद्रतल से ऊंचाई 2200 मीटर) में सुबह नाश्ता, दोपहर खाना और रात खाना-पीना और रहने की व्यवस्था वाली पांच दुकानें हैं। सामने हिमालय की कतारबद्ध सावधान की मुद्रा में बंदरपूंछ, गंगोत्री, त्रिशूल, धौलागिरी, चैखम्भा, नंदादेवी, नंदाखाट, केदारनाथ के हिम शिखर हैं। सामने की पहाड़ी पर इस इलाके की इष्टदेवी श्दीवा देवीश् का मंदिर कुछ-कुछ दिखता है। यह पहाड़ी श्दीवा डांडाश् के नाम से जानी जाती है। श्दीवा देवीश् का एक मंदिर चैंरीखाल में भी है। सड़क के इधर-उधर कुछ दौड़ते और कुछ अलसाये से लेटे-पसरे खूबसूरत और तंदुरुस्त कई कुत्ते हैं। अजय गिनता है एक, दो, तीन…. चैदह और कुल पंद्रह। नाश्ता बनाते हुए दुकानदार कहता है श्दो-चार ले जाओ सहाब। हम तो परेशान हैं इनसेश्। कारण पूछा तो श्कहां से खिलायें इनको फिर रोज देर रात बार-बार जो भूंकते हैं एक साथ हम- सबकी नींद उचक जाती हैश्। श्रात को बाघ भगा कर आप लोगों की ही सुरक्षा करते हैं येश् लघ्लित ने कहा। श्बाघ तो दोस्त हुआ हमारा। बाघ अपने रस्ते और हम अपने रस्ते पर चलते हैं, बाघ से कोई बैर नहीं। हमारे लिए काल तो ये कुत्ते हैंश्। मुझे लगा सड़क के दूसरी ओर अभी-अभी हमारे पास से भागा एक पहाड़ी मुर्गा चित्त लेटे कुत्ते के कान में दुकानदार की बातें दोहरा रहा है, पर कुत्ता मुर्गे से मुखातिब श्अरे बोलने वाले बोलते ही हैं, हमें क्या मतलब। अब तू परेशान न कर, मुझे सोने दे, रात भर जाग कर भौंकना जो है हमने, तेरा क्या, तड़के जब हमारा सोने का टैम होता है तो तू ऊंची आवाज में बांक लगा कर हमारी नींद खराब कर देता है…..

 

चैंरीखाल से चलें तो तकरीबन 5 किमी. आगे पैठाणी से आने वाली सड़क हमारी सड़क से जुड़ गयी है। ललित बताते हैं कि पैठाणी वाली सड़क भी बिट्रिश कालीन ऐतिहासिक मार्ग पौड़ी-रामनगर का ही हिस्सा है। कैन्यूर बैंड पर नीचे की ओर दिख रहे थलीसैंण के लिए सड़क मुड रही है। थलीसैंण यहां से 10 किमी है। कैन्यूर बैंड के पास वाला कैन्यूर गांव कत्यूरी राजाओं का प्राचीन गांव माना जाता है। भरा-पूरा और जीवन्त गांव। इस इलाके की सम्पन्नता और खुशहाली इसी बात से दृष्टिगौचर होती है कि पौड़ी से चलते-चलते करीबन 100 किमी. हो गए हैं और हमें न तो कोई टूटाध्खंडहर घरध्इमारत मिली और न ही कहीं बंजर जमीन या छूटे हुए खेत। पुरुष हों या स्त्रियां अपने-अपने काम-धन्धों में है। सड़क के किनारे मिट्टीतेल के ड्रम के ऊपर कैरम खेलते युवा और चाय की दुकान के पिछवाड़े ताश खेलते सयाने यहां सिरे से नदारत हैं। इस पूरे परिदृश्य पर ‘ये तो पहाड़ी पहचान के बिल्कुल विपरीत बात हो गयी’ सीताराम बहुगुणा का जुमला था। जंगलों में लगी आग के निशान जरूर जगह-जगह पर हैं। पर उस भयावहता में नहीं है जैसा अन्य पहाड़ी इलाकों में देखने को मिलते हैं। ललित का कहना है कि ‘जंगल और लोगों के रिश्ते यहां अभी उतने दूर नहीं हुए हैं जितना कि शहरी इलाकों के आस-पास हो गए हैं। जंगलों की भरपूरता ने यहां के लोगों के पुश्तैनी कार्यों को कमजोर नहीं होने दिया है। जगलों में जंगली जानवरों का आधिपत्य है तो खेत-खलिहानों में मानवों का। दोनों अपनी-अपनी जगह अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ बेफिक्र हैं। जंगली जानवरों को अपनी जरूरतों का भोजन जंगल में आसानी से मिल जाता है। फिर क्यों वो मानव आबादी में आने का जोखिम उठायेंगे। दूसरी तरफ सभी गांव लोगों से आबाद हैं तो जंगली जानवरों के कभी-कभार के हमलों पर नियंत्रण रखना उनके लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होता है। चैंरीखाल में दुकानदार का यह कहना कि बाघ हमारा दोस्त है इसी बात की पुष्टि करता है, क्योंकि बाघ और स्थानीय आदमी के रास्ते तथा जरूरतों में टकराहट की गुजांइश दूधातोली इलाके में बहुत कम है’।

कैन्यूर बैंड से 20 किमी. चलकर हम पीठसैंण पहुंचे हैं। पीठसैंण (समुद्रतल से 2250 मीटर ऊंचाई) एक ऊंची धार पर एकदम पसरा है, ग्वाले की तरह। जैसे कोई ग्वाला ऊंचे टीले पर अधलेटा आराम फरमाते हुए नीचे घाटी में चरते अपने जानवरों पर भी नजर रख रहा हो। ‘पहाड़ी भाषा में ‘सैंण’ का मतलब ‘मैदान’ होता है और ‘सैंण’ में श्ईश् की मात्रा लगा दो तो पहाड़ी में ‘सैंणी’ ‘महिला’ को कहते हैं’। अब तक बिल्कुल चुप रहने वाले अजय ने अपनी चुप्पी इस ज्ञानी बात को कहकर तोड़ी है। सपकपाया अजय कहता है पीठसैंण नाम पर उसे यह याद आया। अजय की इस बात पर केवल मुस्कराया ही जा सकता है। पीठसैंण की वर्तमान पहचान उत्तराखंड के जननायक स्वर्गीय वीर चंन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’ जी से है। (ज्ञातव्य है कि चन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’, सेना में 2ध्18 रायल गढ़वाल में हवलदार थे और 23 अप्रैल, 1930 को पेशावर में देश की स्वाधीनता के लिए शान्तिपूर्वक प्रर्दशन कर रहे निहत्थे पठानों पर कम्पनी कमाण्डर के ‘गढ़वाली तीन राउण्ड गोली चलाओ’ के आदेश को उन्होने ‘गढ़वाली गोली मत चलाओ’ कह कर मानने से मना कर दिया था। तब यह घटना विश्व चर्चा का विषय बनी और इसको भारतीय सेना का विद्रोह माना गया था। चन्द्रसिंह और उनके साथियों को तकरीबन 11 साल कालापानी की सजा हुई। सजा से छूटने के बाद चन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’ एक कम्यूनिष्ट नेता के रूप विख्यात हुए)।

सड़क के एक किनारे पर टीन शैड़ से ढ़के चबूतरे पर चन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’ जी की मूर्ति खड़ी है। पास ही उनके साथियों के नाम और पेशावर घटना के विवरण का शिलापट्ट है। गढ़वाली जी की मूर्ति देखकर एक तो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का उसमें कहीं साम्य नजर नहीं आता, फिर लोगों के कुसंस्कारों ने जिस तरह से उसे जगह-जगह पर खंरोचा है, उससे तो अच्छा था कि यहां पर यह मूर्ति लगती ही नहीं। ये मूर्तियों का प्रचलन भी अजीब है। जीवन में अब तक हजारों मूर्तियां देख ली होगीं पर उनको देखकर उन जैसा बनने की कभी प्रेरणा मिली हो मुझे ऐसा तो याद नहीं आता है। पास ही एक जेसीबी पहाड़ी टीले को उधाड़ने में लगा है। पता चला कि एक भव्य स्मारक बनाने के लिए इस मैदान को और लम्बा-चैड़ा किया जा रहा है। मन में आया कि चन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’ जी के जीते-जी तो कभी कद्र की नहीं की न समाज ने और न ही तत्कालीन सरकार ने अब उनके नाम पर जो कर लो, उनकी बला से।

 

पीठसैंण की उत्तर दिशा में 30 किमी. पर प्रसिद्ध तीर्थ ‘विनसर महादेव, समुद्रतल से 2480 मीटर ऊंचाई) है। ऐसी मान्यता है कि मन्दिर के पास एक प्राचीन नगर भूमिगत है। पीठसैंण से श्विनसर महादेवश् होते हुए गैरसैण जाने का पैदल मार्ग है। पीठसैंण से उडियार खरक 6 किमी. वहां से कोदियाबगड़ 6 किमी. और वहां से 15 किमी. गैरसैंण है। पीठसैंण पर 3 चाय-पानी की दुकानें हैं। चाय की दुकान हो और सामने साक्षात हिमालय का परिदृश्य हो, तो चाय पीने के बहाने कुछ देर और रुकने मन है। दुकानदार सज्जन सिंह जी हैं, नाम से ही नहीं स्वभाव से भी। बताऊं कैसे ? चाय बनाने के लिए बोला भी नहीं था कि चाय से पक्क (लबालब) भरा लम्बा पीतल का गिलास मेरी खिदमत में पेश कर दिया, उन्होने। भाई, पूछ तो लेते कि मैं चाय पीता हूं कि नहीं ? मैने कहा तो मुस्कराते हुए बोले, श्साहब इस जगह पर तो चाय न पीने वाले भी दो गिलास पी जाते हैं।श् सज्जन सिंह बताते हैं कि वो बर्फीली चोटी मूसाकोठ (समुद्रतल से 10,217 फिट ऊंचाई) और वो कोदियाबगड़ (समुद्रतल से 10,183 फीट ऊंचाई) का क्षेत्र है। कोदियाबगड़ में चन्द्रसिंह जी की छः फीट की समाधि सरकार ने बनाई है। ललित ने पूछा श्इधर कोई नेता लोग भी आते हैंश् तो श्हां साब, आते ही रहते हैं। पर हमारी चाय तो आप जैसे लोगों से बिकती है। नेता मंत्री आते हैं और बड़-बड़ करके चले जाते हैं। पर साब, 23 अप्रैल, 2005 को मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी आये थे यहां। भौत, बड़ा कार्यक्रम हुआ था तब। गजब का किस्सा हुआ साहब, उस दिन। स्कूल के बच्चों ने उस समारोह में नाचना-गाना किया। नाटक करते हुए एक बच्चे पर चन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’ पहाड़ी देवता के रूप में अवतरित हो गया। फिर तो नाचते-नाचते देवता बनकर बोलते हुए उसने सरकार की जो पोल खोली उसको देखकर नेता तो भुनभुना रहे थे पर पब्लिक खूब मजे ले-ले कर हंस कर लोट-पोट हो रही थी। नाटक मेें उस देवता ने धै (जोर की आवाज) लगा कर सबसे पूछा ‘क्यों नहीं बनाई उत्तराखंड की राजधानी ‘गैरसैंण’ में, शराब और खनन से बरबाद कर रहे हो पहाड़ को, बच्चे बेरोजगार हैं, उनका रोजगार कहां गया, लोग बीमार हैं और तुम मजे कर रहे हो, शर्म नहीं आती तुम सबको और भी साब भौत भौंकुछ (कुछभी) बोला उस देवता ने। पर साब, उस दौरान सारा सरकारी अमला हकड़क (स्तब्ध) हो गया। क्या जो करें, उस समय तो वो बच्चा देवता हुआ, उसे रोक भी नहीं सकते थे। बड़ी मुश्किल से धूप-पिठाई देकर उस देवता को शांत किया गया’। ‘बाद में मुख्यमंत्री तिवाड़ी जी ने क्या कहा’ ? अजय ने पूछा। ‘अरे साब, नारायण दत्त तिवारी जी हुए वो बहुत होशियार, पूरे टैम उस देवता की ओर नतमस्तक रहे और कहते रहे ‘सब्ब है जलि, सब्ब है जलि, ( सब हो जायेगा, सब हो जायेगा)।

पीठसैंण से अब सड़क ढ़लान पर हो गयी है। पूर्वी नयार के इस पार (किनारे) वाले क्षेत्र के 80 गांव चैथान पट्टी में शामिल हैं। चार गाड़ों (छोटी नदी) का सम्मलित भू-भाग चैथान कहलाया। ये गाड़ हैं मासों गाड़, अंगगाड़, बसौली गाड़ और डड़ौली गाड़। चैथान क्षेत्र जड़ीबूटी और चारागाहों के लिए प्रसिद्ध है। जड़ीबूटी संग्रहण और दूध उत्पादन में यह इलाका अग्रणी है। चन्द्रसिंह ‘गढवाली’ जी के पुस्तैनी गांव मासों पीठसैंण से 10 किमी. पर है।

चैथान पट्टी के रौणींसेरा मासों गांव में जाथली सिंह भण्डारी के घर 25 दिसम्बर, 1891 को चन्द्रसिंह का जन्म हुआ था। वे नजदीकी स्कूल बूगींधार से प्राइमरी में पढ़ने के बाद घर से भागकर गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए थे। अब उनके परिवार का तो कोई गांव में रहता नहीं है। लिहाजा पास के ही गांव की दिक्खा देवी जो भागवत कथा सुनने की जल्दी मेें है से चलते-चलते बात होती है। वे बताती हैं कि मासों भण्डारियों का गांव है। खेती सिंचित और ऊपजाऊ है। इसीलिए चारों ओर आबाद खेत नजर आते हैं। गांव के ऊपरी छोर पर बांज-बुरांस का घना जंगल है। आलू बहुत होता है। गढ़वाली जी के पैतृक घर के पास ही गुलबहार का मोटा ताजा पेड है जिसे गढ़वाली जी कोटद्वार से लाकर लगाया था। बताया गया कि उत्तराखंड में चकबंदी के शुरुवाती प्रयास मासों ग्राम में भी हुए थे। आज तो उत्तराखंड में चकबंदी का चक्रचाल बस बातों में ही सांसे ले रहा है।

मासों से जगतपुरी है 8 किमी.। यहां से हमें मेन सड़क छोड़कर देघाट वाली सड़क की ओर जाना है। मेरा मानना है कि जहां पर दो सड़कें जुड़ रही हो वहां, पर अपनी मंजिल वाली सड़क की पुख्ता जानकारी लेने में ही अक्लमंदी होती है। और जब अक्ल का इस्तेमाल करोगे तो परेशानी होगी ही। परेशानी यह है कि थोड़ा आगे आने के बाद मैंने कहा चलो किसी से पूछ लेते हैं कि हम सही सड़क पर चल रहे हैं कि नहीं। तुरंत ललित ने कहा कि गाड़ी से उतर कर ये नेक काम आप ही कर लीजिए। क्योंकि बताने वाले तो दुकानों के अन्दर हैं। चल खुसरो, पूछ आते हैं के भाव से एक सज्जन से पूछा तो उसने छूटते ही कहा ‘आप सामने के बोर्ड में देघाट का ऐरो नहीं देख रहे हैं क्या ? ओह, सचमुच, खिसयाया सा मैं अब अपनी गाड़ी में थोड़ी देर में जाना चाहता था। सोचा और क्या जो पूंछू इनसे, मुहं से निकला ‘वाह ! भाई सहाब, जगतपुरी के सारे घर नये और चमचमाते हैं। बड़ा खूबसूरत गांव है यह। हां भाई सहाब ‘नई बसावत वाला गांव है यह। हमारे दादा जी का नाम था श्जगत सिंहश् उन्होने सबसे पहले यहां पर घर बनाया और रास्ते में बड़ा सा लिख दिया ‘जगतपुरी’। बस, पहले लोगों ने मजाक में इस जगह को ‘जगतपुरी’ कहा अब नाम ही पड़ गया ‘जगतपुरी’।’ मैने कहा ‘भाई अगर उनका नाम जगन्नाथ होता तो जगन्नाथपुरी हो जाती ये जगह’। उस पर क्या प्रतिक्रिया हुई ये देखे बगैर मैं तेजी से अपनी गाड़ी में बैठते ही बोला, चलो हम ठीक रास्ते पर हैं।

‘जगतपुरी से आगे 5 किमी. के बाद देघाट के लिए एक शार्टकट है, उसमें 2 किमी. की सड़क कच्ची है लेकिन उसके बाद तो सड़क पर गाड़ी सायं-सायं करती आगे बढ़ती है, ऐसा पीठसैंण में किसी मार्गदर्शक ने बताया था। यात्रा में शार्टकट का लालच तो होता ही है। ‘उसी सड़क से चलो चलते हैं’ की राय के बाद चलती गाड़ी में हिचकोले खाना जो शुरू हुआ वो श्पाठक बन्धुओंश् 10 किमी. तक जारी रहा। मुश्किल ये कि पीछे भी नहीं जा सकते। सड़क के ऊपर की ओर चट्टान जैसे बड़े-बड़े पत्थर ऐसे लगते कि बस, सड़क पर जैसे लुडकने के समय के लिए हमारे आने का ही इंतजार कर रहे हों। सीताराम बहुगुणा का ये विचार कि सरकार को नदी किनारे खनन कार्य कराने के बजाय सड़क के आस-पास के चट्टानी पत्थरों को तोड़ने की इजाजत दी जानी चाहिए। इन पत्थरों का कहीं कोई उपयोग तो होता नजर आता नहीं। विचार तो विचारणीय है पर फिलहाल समस्या यह है कि इन चट्टानी पत्थरों के आस-पास तक कोई गांव तो क्या आदमी भी नजर नहीं आ रहा है। हां, पहली बार इस ओर बंदरों के उछलते-कूदते झुंड जरूर हैं। मुसीबत में जब आदमी होता है तो उसको दूसरे सभी उस पर हंसते हुए नजर आते हैं। चाहे वो जानवर ही क्यों न हो। ऐसी हालात में बंदरों को भी मैं इसी नजर से खुश देख रहा हूं। संयोग यह कि गाड़ी मित्र सीताराम चला रहे हैं और मैं किसी अनहोनी से बचने और माहौल को हल्का करने के लिए सीताराम-सीताराम जपने लगा हूं। अजय सबसे छोटा है लिहाजा बार-बार सड़क के पत्थरों को हटाने का जिम्मा उसी का है। ललित ने कहा कि ‘ये बात समझ में नहीं आती कि लोग अक्सर अच्छी खासी लम्बी दूरी को भी ‘यहीं पर बस एक लतड़ाग (कदम)’ क्यों जो कहते होंगेश् ? ‘यही तो आनंद है जीवन का, वरना फिर नपी-तुली जिन्दगी तो केवल चलने वाली हुयी जीवंत जीने वाली जिन्दगी तो ऐसी ही ऊबड़-खाबड़ होती है। मैने जो ये कहा ‘तो फिर जाओ गाड़ी के आगे की सड़क के पत्थर उठाओ, जीवंत जिदंगी जीने के लिए’ ललित ने मुस्कराते हुए आदेश दिया है।……

सड़क किनारे ‘समैया’ लिखा बोर्ड देखा तो सचमुच ‘मैय्या’ याद आ गई। लगभग 10 किमी. के बीहड़ से बाहर आकर अब आयी हमारी जान पर जान। खुशी इतनी कि बोर्ड के साथ फोटो खिंचाने का मन हो रहा है। मैने कहा, गाड़ी थोड़ा रोको ! बहुगुणा जी, पर सब चुपचाप, मतलब मेरी ओर इशारा है कि चुपचाप बैठे रहो। मुसीबत से बाहर निकलने पर जरा रुक कर जश्न मनाना ही चाहिए, मैं फिर कहता हूं। पर मेरी बात मित्रों से खारिज ही समझो, चलो कोई बात नहीं। हल्के से मोड़ को पार करते ही सड़क के दोनों ओर ‘नीचे दुकान ऊपर मकान’ वाले स्टाइल के कुछ घर दिखाई दे रहे हैं। ऊबड़-खाबड़ सड़क के टेंशन से बाहर निकले तो अब भूख का अहसास भी हो रहा है। खाने को तो क्या मिलेगा, बस चबाने को मिल सकता है, याने नमकीन और बिस्कुट। पर भूख तो मुझे दाल-भात वाली लग रही है। अपन की विचारों की तरंग जारी है, अब तक रास्ते की घबराहट में भूख-प्यास नदारत थी, अब सब ठीक-ठाक दिखा तो पेट कुलबुलाने लगा है। आदमी को चैन किसी भी हालत में नहीं होता है। सड़क के ऊपरी छोर की दुकान बुर्जुग गंगादत्त पपनोई जी की है। पपनोई जी दुकान के एक कोने में रखी पटखाट पर आराम फरमा रहे हैं। दुकान के काउंटर पर उनकी पोती रुचि बैठी है। रुचि ने देघाट से इंटर की परीक्षा दी है और बीएससी वह अल्मोड़ा से करेगी। आपसी रामा-रामी होने के बाद बातों का सिलसिला चल पड़ा है। मित्रों की मांग है कि ठंडा पियेगें, और दुकान पर ‘ठंडा माने कोकोकोला’ ही है।

मजेदार बात यह है कि अभी हम गढ़वाल क्षेत्र में है परन्तु पपनोई जी की बोल-चाल पूरी तरह कुमाऊंनी है। यद्यपि उसमें गढ़वाली भाषा की लटक भी खूब है। अपने को कुमाऊंनी बोलने में भी महारथ है, इसलिए उनके और मेरे बीच ही मुख्य बातचीत हो पा रही है। बाकी साथियों का उसमें हां-हूं का ही योगदान है, बेचारे। पपनोई जी ने बताया कि यह क्षेत्र दोसान्त कहलाता है। (अब आप मन ही मन पूछ रहे होगें कि दोसान्त क्या है ? मैं बताता हूं। गढ़वाल-कुमाऊं की अलग-अलग जगहों की सीमा पर स्थित आर-पार बसे गांवों की सामुहिक पहचान का नाम ही दोसान्त है। रोजी-रोटी और बेटी के आपसी नजदीकी पारिवारिक रिश्तों के कारण दोसान्त इलाकों की बोली में ध्वनि, शब्द और व्याकरण का एक जैसा साम्य होना स्वाभाविक है। प्रसिद्ध भाषाविद गिर्यसन ने गढ़वाल-कुमाऊं के दोसान्त इलाके की इस साझी विरासत की भाषा को ‘मध्य पहाड़ी’ का नाम दिया था।)

पपनोई जी कहना है कि प्रशासनिक रूप में वे गढ़वाल क्षेत्र में हैं पर पौड़ी गढ़वाल तो उनके पीठ पीछे है। लिहाजा उनके सामने वाले जनपद अल्मोड़ा से ही उनका सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दोस्ताना है। ललित पूछते हैं कि उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण बनती है तो यह इलाका तरक्की करेगा। परन्तु पपनोई जी का मानना हैं कि राजधानी बनने और क्षेत्र के विकास का कोई सीधा सबंध नहीं है। राजधानी में तो चतुर और चालाक ही रह सकता है। मेरी मानो तो राजधानी को देहरादून से ले जाकर दिल्ली में पटक दो। क्या फर्क पड़ता है ? क्योंकि जब सब दिल्ली की हुकूमत ने ही कहना और करना है तो फिर देहरादून राजधानी का क्या औचित्य है। साहब, पहाड़ देखने में सुन्दर लगते हैं, परन्तु उनमें रहना उतना ही विकट होता है। बाहर से यहां रहने आने वाला हमेशा भिड़-भिड़ाहट ही करेगा। यहां हम जैसे लोग ही पहाड़ की विकटता के साथ-साथ खुश होकर रह सकते हैं। पपनोई जी ने बात तो पते की कही है।

पीठसैंण की पहाड़ी धार से लगभग 30 किमी. ढ़लकती-ढ़लकती यह सड़क अब समैया गांव से कुछ सीधी हुई लगती है। समैया से देघाट 9 किमी. है। गढ़वाल के इस दोसान्त इलाके से कुमाऊं क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रथम ग्रामीण कस्बा है देघाट। पहाड़ की तलहटी में बसा देघाट क्षेत्र एक लम्बी-चैड़ी समतल घाटी है। पीछे छोड़ आये गढ़वाल में जहां कई किमी. तक आबादी नजर नहीं आ रही थी। वहां देघाट घाटी के चारों ओर पहाड़ियों में पास-पास चम-चम चमकते गांवों की झालर चहुंओर है। आज चैत्र मास की अष्टमी का मेला है। देघाट बाजार मेले से सजा-धजा है। रंग-बिरगें परिधानों में ग्रामीण महिलायें और बच्चे देवी मंदिर की ओर हैं। लगभग हर बच्चे के हाथ या मुहं में पिपरी बाजा है। आखों में रंगीन चश्मा और हाथ में बंदूक लिए नन्हें सलमान खान भी दिख रहे हैं। मेले में जगह-जगह लगे जलेबी के थालों का अपना जलवा जरूर है पर मेले को जीवंत तो बच्चों के पूं-पूं बाजे की इकहरी लम्बी आवाजें ही कर रही है। कम ही सही पर कई महिलायें पहाड़ी आभूषणों को पहन के आयी है। जेवर पहन कर बेफिक्री से बाजार में घूमने का साहसिक आनंद पहाड़ में ही संभव है।

देघाट से आगे की ओर अब अष्टमी के मेले की ही सर्वत्र धूम-धाम है। मुझे पिपरी बाजा खरीदना है पर हमारे ड्राईवर साहब हैं कि गाड़ी रोकते ही नहीं। पत्थरखोला, उरमरा, भकौड़ा के बाद आया स्यालदे। स्यालदे ब्लाक मुख्यालय है। देघाट से भी ज्यादा भीड़ मेले में यहां जुटी है। जहां देखो वहां जीपनुमा टैक्सी ही टैक्सी। उन दुष्टों और निर्दयी टैक्सियों के हार्न की ऊंची कर्कश पौं-पौं की आवाज के बीच मेले में आये बच्चों के पिपरी बाजे की पूं-पूं की आवाज के आंनद का बजूद कम होता नजर आ रहा है। घक्का-मुक्की वाली भीड़ से आगे और बाहर निकलने की सबकी कोशिश है। प्रशासन की ओर से मेले में व्यवस्था बनाये रखने के लिए कुछ होम गार्ड के जवान हैं। पर वो भाई लोग भी भीड़ को व्यवस्थित करने से ज्यादा खुद मेले का आनंद लेते दिख रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में पुलिस के जवानों जैसा तनाव उनके चेहरों में लेशमात्र भी नहीं है। सड़क की मुंडेर पर आराम से बैठे होम गार्ड से चलते-चलते पूछा श्भाई आप लोग मेला देखने आये हो या उसमें व्यवस्था बनानेश्। उसका जबाब सटीक था कि ‘दाज्यू (बडेघ् भाई), ये मेले की भीड़ अपनी व्यवस्था खुुद ज्यादा आसानी से बना लेगी। कोई बड़ा नेता और अधिकारी तो आ नहीं रहा है मेले में। उनके आने से ही तो अव्यवस्था होती है।’ अब यह बात सुनकर तो मन खुश ही हो सकता है।

स्यालदे के बाद सतरोटी और उसके बाद रामगंगा के तट पर है जैनल। देघाट से जैनल 21 किमी. है। हमारी ओर से आने वाली सड़क और उसके दांई ओर डोटियाल (मानिला के पास) से आने वाली सड़क जैनल पुल के किनारे आपस में मिलती है। रामगंगा नदी के ऊपर बने पुल को पार करने के बाद तिराहे के आस-पास खाने-पीने की दुकानें हैं। यहां से बांया वाला सीधा रास्ता चैखुटिया की ओर और दांये वाला भिकियासैंण की ओर है। दोपहर का खाना यहीं पर खाना है। रामगंगा नदी का फाट (किनारा) काफी चैड़ा है। लोग रामगंगा में नहाने तो कुछ-एक चोरी-छिपे मछली मारने में भी अपना हुनर दिखाते नजर आ रहे हैं।

जैनल से 5 किमी. चले तो भिकियासैंण पहुंचे। भिकियासैंण कुमांयूं के पाली पछाऊं वाले सांस्कृतिक क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण जगह है। गगास और रामगंगा के संगम पर बसा भिकियासैंण शताब्दी पूर्व कुमाऊं से बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने वाले रास्ते का प्रमुख पड़ाव था। यहां से रामनगर व्यावसायिक मंडी जाने का पैदल ऐतिहासिक पैदल मार्ग है। साल भर की चहल-पहल वाले इस स्थल पर कभी एक विख्यात औषधालय भी संचालित होता था।। संगम तट पर नीलेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। कभी कुमांयू का यह प्रमुख व्यवसायिक स्थल मिर्च और पशुओं के कारोबार के लिए भी जाना जाता था। कुमाऊं के सल्ट इलाके की मिर्च देश-दुनिया में मशहूर है। आज भी भिकियासैंण में मिर्च का लाखों में कारोबार करने वाले कई आढ़ती मौजूद हैं। भिकियासैंण से अब तीखी चढ़ाई वाली सड़क पर चलते हुए बटिया, सिनौड़ा, ह्वली गांव होते हुए 18 किमी. के बाद चनौलिया गांव है। चनौलिया में अल्मोड़ा जनपद का राजीव गांधी नवोदय विद्यालय है। चनौलिया के ठीक सामने मोहनरी गांव है। मोहनरी गांव विशेष इसलिए है कि यह उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री हरीश रावत जी का पैतृक गांव है।

चनौलिया से 4 किमी. पर भतरौंजखान और उसके 20 किमी. आगे ताड़ीखेत है। ताड़ीखेत से रानीखेत 10 किमी. पर है। एकदम पहाड़ की चोटी पर बसे ताड़ीखेत में कभी ताड़ी (कच्चीध्देसी दारू) बनती रही होगी क्या ? मुझे नहीं मालूम। इसे तो इस विषय के अनुभवी और विद्वत लोग ही बता पायेगें। जो इस समय मेरे साथ नहीं है। पर ताड़ीखेत है बड़ा खूबसूरत और हवादार। चीड़ के पेडों से आती शाम की फर-फर हवा में अच्छी-खासी ठंड है। गाड़ी की खिड़की खोलता हूं तो ‘सर्दी लग जायेगी’ की मित्रवत टोका-टोकी में रानीखेत की धार दिखाई देने लग गयी है।

सुभाष चैक के पास बनी पार्किंग की ओर मुड़ते ही आनंद बेलवाल सामने अपनी रिश्तेदारी वाली चाय की दुकान के बाहर खड़ा मुस्करा रहा है। तपाक से उससे जोे गले मिलना हुआ तो तीस साल बाद की मुलाकात का अतंराल न जाने कहां छूमंतर हो गया। चल यार, तेरी इसी दुकान से कालेज के दिनों वाली एक गिलास की दो हाफ चाय पीते हैं। अरे, तेरे को अभी तक याद है, आंनद हंसता है। सुभाष चैक पर नरेन्द्र रौतेला, गोविंद पंत, महेश पांडे, राजेन्द्र बिष्ट, हरीश साह, विमल सती और भी मित्रों का जमघट सजने लगा है। बताता चलूं कि ‘28वां उमेश डोभाल स्मृति समारोह’ रानीखेत में भाग लिए ये मित्र लोग आये हैं। (ज्ञातव्य है कि मार्च, 1988 को पत्रकार उमेश डोभाल की पौड़ी में शराब के कारोबारियों ने हत्या कर दी थी। तब हत्यारों को सजा दिलाने हेतु देश भर में आंदोलन हुए थे। उमेश डोभाल को याद करते हुए वर्ष 1991 से लगातार हर साल 25 मार्च को विविध विधाओं के रचनाकर्मी निर्धारित स्थल पर सम-सामायिक विषयों पर विचार-विर्मश के लिए एकत्रित होते हैं।)
सुभाष चैक से कार्यक्रम स्थल तक जलूस की शक्ल में जाना है। जलूस है तो फिर नारे भी लगने हैं पर शुरूवात कौन करे। बुर्जगियत का संकोच जवानी के जोशीले नारों को दुहराने से रोक रहा है। अनुसूया प्रसाद ‘घायल’ हममें अभी कमत्तर बुर्जग है, वही नारा बुलंद करता है, ‘उमेश डोभाल अमर रहे’, ‘उमेश डोभाल एक व्यक्ति नहीं, एक धारा थी एक धारा है’। प्रत्युत्तर में बाकी साथी नारे लगाते नहीं वरन बुदबुदाते हैं। अनुसूया के एकहरे नारों और कई लोगों की सामुहिक बुद-बुदी आवाज से राह चलते लोग थोड़ा ठिठकते जरूर हैं, पर उनकी चाल की गति पहले जैसी ही बनी रहती है। मेन बाजार के दोनों तरफ के दुकानों के आस-पास लोगों की सरसरी नजरों में ‘मामला क्या है’ को जानने भर तक की उत्सुकुता है। ‘उमेश डोभाल वाले पत्रकारों का जलूस है’ एक सज्जन ने साथ खड़े अपने मित्र को जानकारी दी है। जलूस के शराब की दुकान के पास से गुजरते ही मित्र अनुसूया ने नारा बुलंद किया ‘शराब माफिया हो बरबाद-हो बरबाद’, ‘शराब माफिया तेरी कब्र बनेगी, उत्तराखंड की धरती पर’। जलूसवासी मित्रगणों की नजरें ये नारा दोहराने के साथ-साथ शराब की दुकान के बाहर लटकी लिस्ट में ‘शराब के दामों में भारी कमी’ पर फिसलती हुई टिकने भी लगी हैं। ‘रात रुकने की पता नहीं कहां व्यवस्था है, फिर दुबारा इधर कौन आये, अभी व्यवस्था बना लेते हैं’ के विचार पर अमल करते हुए कुछ मित्र इधर-उधर होने लगे हैं। रानीखेत में गांधी चैक और सुभाष चैक के आपसी लगभग 100 मीटर की दूरी के ठीक मध्य में अंग्रेजी शराब की दुकान है। वैसे भी गांधी और सुभाष से बराबर दूरी बनाते हुए शराब की बिक्री उत्तराखंड सरकार के आय का प्रमुख जरिया है। शराब के पैगों पर तो सरकार सरक रही है। वही उसका प्राण तत्व है। मार्च का महीना ढ़लकने को है और शराब से मिलने वाली धनराशि के वार्षिक लक्ष्य को हासिल न कर पाने से उपजी शिकन आजकल उत्तराखंड सरकार के चेहरे पर है।


रानीखेत नगर मुझे हर बार कड़े अनुशासन की परम्परा को निभाते हुए सावधान की मुद्रा में ही दिखाई देता है। जैसा वर्षों पहले वैसे ही आज भी ‘चुपचाप ताकता हुआ’ रानीखेत। छावनी परिषद् होने के कारण नये निर्माण कार्यों से वंचित इस नगर की नियति भी गमलों में उगते पेड़-पौंधों जैसी है जिनके सांस-प्राण मालिक की मर्जी ही है। बाजार की दुकानें वही चालीस साल पहले जैसे ही हैं, बस बदलाव उसमें काम करने वाले किरदारों में हुआ लगता है। मेन बाजार से खड़ी बाजार दिखा तो वहां की रामलीला की याद तुरंत आ गई है। जलूस में नये आने वाले मित्रों का समागम होता जा रहा है। नारों की जगह आपसी बातचीत में ही चलायमान जलूस कल के कार्यक्रम स्थल ‘होटल रतन पैलेस’ में विराम लेता है। रोड़वेज बस स्टेशन के ऊपरी छोर पर 30 साल पहले तक श्नोवाल्टिक सिनेमा हालश् था, वही अब श्रतन पैलेस होटलश् है। वर्ष 1977-78 में केवल नई फिल्मों के पोस्टर देखने मैं और आनंद बेलवाल कई बार माल रोड से कालेज के बाद यहां आते थे। कभी-कभी हम पैसे की कमी चलते लोअर क्लास का एक टिकट लेकर हाफ टाइम तक एक देखता फिर हाफ टाइम के बाद दूसरा देखता। पिक्चर खत्म होने के बाद दोनों चल पड़ते घर जाने को चैबटिया की ओर। चलते-चलते इटंरबल से पहले देखने वाला पहले फिल्म की शुरुवाती कहानी सुनाता फिर दूसरा इंटरबल के बाद की। 15 पैसे की दो गोल्डन सिगरेट को एक-एक कर पीते हुए मजे से हमारा रानीखेत से चैबटिया का 10 किमी. का पैदल रास्ता कट जाता था।
25 मार्च, 2018
समुद्रतल से लगभग 1835 मीटर ऊंचाई पर स्थित रानीखेत की बसावत बांज, बुरांस, चीड़ और देवदार के पेडों के आस-पास है। यहां से पंचचूली, नंदादेवी, चैखम्बा आदि हिमालयी चोटियां नजर आती हैं। रानीखेत का गोल्फ मैदान एशिया में सर्वोत्तम माना गया है। शताब्दियों पहले राजशाही के दौर में कुमाऊं के राजा-रानियों के आमोद-प्रमोद की मनपंसद जगह रानीखेत थी। रानीखेत नाम को इसी संदर्भ से जोड़ा जाता है। वाइसराय लार्ड मिंटो ने सन् 1869 में कुमाऊं रेजीमेंट का मुख्यालय रानीखेत में स्थापित करके इसे आधुनिक पहचान दी थी। वर्तमान में इस क्षेत्र में रानीखेत के अलावा 10 किमी. दूर चैबटिया (समुद्रतल से 2016 मीटर की ऊंचाई) में भी सैनिक छावनी है। अंग्रेजों की मनपंसद जगह होने के कारण रानीखेत में 9 विशाल चर्च बनाये गये थे। इसी कारण रानीखेत को तब ‘सिटी आॅफ चर्चेज’ भी कहा जाता था। रानीखेत से अल्मोड़ा 50 किमी. और नैनीताल 60 किमी. पर स्थित है। अंग्रेजी राज में एक बार इसे शिमला के स्थान पर भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी के प्रस्ताव पर विचार किया गया था। उत्तराखंड सरकार ने सन् 2012 में रानीखेत को जिला बनाने की घोषणा की थी पर वह सरकार की अन्य घोषणाओं की तरह हवाई फायर ही साबित हुई है।


जब आप हल्द्वानी-नैनीताल से रानीखेत आते हैं तो शुरूवात में ही पीडब्लूडी आफिस के नीचे की ओर एक खूबसूरत बंगला दिखता है। अब ये तो आप भी मानते हैं कि हमारे देश में खूबसूरती के साथ मजबूती भी होगी तो वो भवन अंग्रेजों ने ही बनाया होगा। हम भारतीय तो उनके बनाये भवनों को जितना बदसूरत कर सकते हैं उसमें कोई कसर नहीं छोड़ते। ऐसा ही यह बंगला कभी डाकबंगला हुआ करता था। आजादी के बाद यह जिला पंचायत का डाकबंगला रहा। फिर 1973 इसमें राजकीय महाविद्यालय बनाया गया, जहां मैं और आनंद बेलवाल 1977-78 के दौरान बीए के विद्यार्थी रहे थे। सन् 1980 में महाविद्यालय चिनियानौला में जाने के बाद से इसे राजकीय खाद्यान भंडार बनाया गया है। गेहूं-चावल की ठुंसी बोरियों के बीच हम अपनी अंग्रेजी-अर्थशास्त्र की कक्षाओं को ढूंड रहे हैं। देखकर मन उदास तो दिमाग अशांत।
मालरोड से चैबटिया की ओर 3 किमी. पर है, झूलादेवी मंदिर और उसके पास ऊपरी पहाड़ी पर है राम मंदिर। किवंदति है कि 13वीं सदी में एक चरवाहे ने इसी स्थल में झूले के पालने में देवी को प्रतिष्ठापित किया था। इसी कारण यह मंदिर झूलादेवी के नाम से विख्यात हुआ। मन की मुराद को पूरा होने पर घंटियां लगाने की यहां सदियों से प्रथा चली आ रही है। चालीस साल पहले चैबटिया क्षेत्र से कालेज आने और जाने वाले हम साथियों का इंतजार और मिलने का कभी यह मुख्य स्थल था। इसके तब के पुजारी बड़े भाई नारायण दत्त पंत की कवितायें सुन कर वाह-वाह करनी ही होती थी। मंदिर से चढ़ावे का प्रसाद खाने को जो मिलता था हमें। झूलादेवी से बांयी ओर की लिंक रोड़ पर 4 किमी. के बाद है आंनद का गांव भड़गांव। आंनद गांव की सड़क से ही अपने वीरान पुस्तैनी घर को सीताराम बहुगुणा को दिखाता है। भावों का उद्देग उसके चेहरे पर साफ नजर आता है। कभी सेब, आडू, प्लम के बागान इस गांव में थे। आज केवल भव्य भवनों की कतार नजर आती है। कभी देश-दुनिया में सेब के लिए मशहूर चैबटिया गार्डन अब बीते दिनों की बात हो गया है। उद्यान विकास को प्रमुख आर्थिकी मानने वाली उत्तराखंड सरकार इस उजड़े चमन को देखने का साहस करेगी भी कैसे ? हकीकत यही है कि सरकारी नालायकी ने हमारे परंपरागत हुनर और हौसले को रसातल ही पहुंचाया है।


रानीखेत के रतन पैलेस होटल में भाषणवीरों के भाषण जारी हैं। उनके तथ्य और तर्क बस उनके बोलने और हमारे सुनने तक ही प्रभावी और सीमित हैं। सार्वजनिक कार्यक्रम कोई-कैसा भी हो वह आयोजकों और दर्शकोंध्श्रोत्राओं के लिए शुरू होते ही खत्म होने के इंतजार में ही बीतता है। उसमें मित्रों का मिलना और साथ रहना-खाना ही महत्वपूर्ण और आनंददायी होता है। रतन पैलेस होटल के इस हाल को अभी भी मैं 40 साल पुराना नोवाल्टिक पिक्चर हाल ही मान रहा हूं। अचानक मुझे ध्यान आता है कि पहले जिस ओर पिक्चर हाल की बालकनी थी उसमें आज का स्टेज है और जिधर फिल्म का पर्दा था उस ओर हमारे पीठ है। अब समझ में आया कि समय अंतराल हमें कब-किस ओर बिठा दे ये वक्त ही जानता है।…….
यात्रा के साथी- अजय मोहन नेगी, सीताराम बहुगुणा और ललित मोहन कोठियाल
यात्रा जारी है………

 

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अरुण कुकसाल

अरुण कुकसाल विभिन्न क्षेत्रों में सेवाएँ देने के बाद स्वैच्छिक सेवा निवृति लेकर अब स्थायी रूप से श्रीनगर में रहते हैं और सामाजिक कार्यों व स्फुट लेखन में व्यस्त हैं.