शराब की पौबहार


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April 16, 2018

पिघलता हिमालय  ब्यूरो 

सरकार द्वारा पहले जारी आबकारी नीति में 20 किमी. के भीतर चार दुकानों के समूहों का आबंटन एक व्यक्ति या फर्म को दिया जा  सकता था लेकिन इसमें विवाद उत्पन्न होने के बाद सरकार को अपनी जुबान बदलनी पड़ी। इसके अलावा बीस कमरों तक के होटल में दिए गये बार की लाइसेंस फीस को पांच लाख से घटाकर तीन लाख कर दिया गया है…

 

उत्तराखंड की शराब नीति पर एक दृष्टि यह भी है

नीलक्रान्ति, श्वेतक्रान्ति, हरितक्रान्ति और भी न जाने कितनी क्रान्तियों की चर्चा होती रहती है। उत्तराखण्ड में इस समय मदिराक्रान्ति पर चर्चा होती रहती है। सरकार द्वारा आबकारी नीति में ताजा संशोधन के बाद से हलचल है। कहा गया है कि अब परचून की दुकान में भी शराब आसानी से उपलब्ध होगी। शराब के विरोध में नारे लगाने वाली ताकतें और विपक्ष जरूर चिल्ला रहा है लेकिन यह सच्चाई सब जान चुके हैं कि ‘शराब की पौबहार‘ पहाड़ में पहले से है। इसी पौबहार को राजस्व में बदलने के लिये सरकारें नित नये प्रयोग करती रही हंै। उत्तराखड में ‘शराब को लेकर बड़ी राजनीति होती रहेगी यह तय है। शराब के वैध कारोबार, अवैध कारेबार के साथ ही मिलीभगत की बू इसमें है। यहाँ होने वाले चुनावों में शराब कारोबार में लिप्त लोगों का प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप भी खूब चर्चा में रहा है।

इस बार प्रदेश सरकार ने आबकारी नीति में संशोधन को कैबिनेट में मंजूरी दी जिस कारण अब विदेशी शराब और वाइन परचून की दुकान में भी उपलब्ध हो सकेगी। इसके लिये शर्त है कि दुकानदार का सालाना टर्नओवर पचास लाख हो और वह लाइसंेस फीस के एवज में पांच लाख रुपये जमा कर सके। इसके साथ ही बार लाइसेंस भी अब एक के बजाए तीन साल के लिये मिल सकेगा। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अध्यक्षता में हुई बैठक में तय किया गया कि शराब की दुकानों के समूहों के आबंटन की व्यवस्था नहीं चलेगी। उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा पहले जारी आबकारी नीति में 20 किमी. के भीतर चार दुकानों के समूहों का आबंटन एक व्यक्ति या फर्म को दिया जा  सकता था लेकिन इसमें विवाद उत्पन्न होने के बाद सरकार को अपनी जुबान बदलनी पड़ी। इसके अलावा बीस कमरों तक के होटल में दिए गये बार की लाइसेंस फीस को पांच लाख से घटाकर तीन लाख कर दिया गया है। साथ ही इनका रिन्यूअल हर साल के बजाए तीन साल में एक बार किया जायेगा। तीन साल की फीस एक साथ जमा करने पर लाइसेंस फीस में दस फीसदी की छूट दी जायेगी। डिपार्टमेंटल स्टोर के लिये अनुज्ञापन शुल्क तीन लाख से बढ़ाकर पांच लाख कर दिया गया है। जबकि इसके लिये टर्नओवर की सीमा घटाकर पांच करोड़ से सीधे पचास लाख कर दी है। बार लाइसेंस धारकों के लिये पके भोजन की ब्रिक्री की सीमा 12 लाख से घटाकर 10 लाख कर दी गई है। सीधी सी बात है जिस प्रदेश में शराब को लेकर गोरखधन्धे हो रहे हों, वहाँ खुली किताब जैसा हो तो कौन सा गलत होगा ? स्काटलैंड का उदाहरण लेना चाहिये और पहाड़ में बर्बाद होते माल्टा व अन्य फलों को खपाने का इन्तजाम किया जा सकता है। शराब तस्करी में मर रहे युवाओं को बचाया जा सकता है। कुछ प्रतिशत पलायन भी रुकेगा।

शराब के बारे में हमारी सरकारें क्या सोचती हैं यह भी सोचने लायक है। दरअसल चाहे जो भी सरकार रही हो उसने राजस्व से आगे कुछ नहीं सोचा। साथ ही शराब कारोबारियों के साथ जुगलबन्दी के आरोप लगाते रहे हैं। शराब खोलने और न खोलने के बड़े आन्दोलनों के पीछे भी राजनीति रही है। सत्ता में रहने पर शराब कारोबारियों की ओर से और विपक्ष में रहने पर सरकार को कोसने को काम होता रहा है। इस बार भी ऐसा हो रहा है। विपक्ष को भरपूर मौका है कि वह शराब की बात करते हुए बयान दे। ‘डबल इन्जन सरकार’ और ‘अच्छे दिन आ गये‘ कहते हुए आन्दोलनकारी ताकतें भी चटखारे ले रही हैं। लेकिन उत्तराखण्ड में शराब की हकीकत को कोई नहीं कह रहा है। देखने में आया है कि शराबबन्दी आन्दोलन की अगुवाई करने वाले पेट भरकर पीने में परहेज नहीं करते हंै। शराब के लिये तांका-झांकी करते रहते हैं। शराब को जहर बताने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भी इससे बच नहीं पाये हैं। ऐसे में कौन मान ले कि शराब बन्द करना ही समाज सुधार का असल तरीका है।

ईमानदारी से देखें तो समझ में आता है कि शराब की खुली बिक्री से दिक्कत नहीं होगी। सरकार की नीयत क्या है, यह तो वहीं जाने। लेकिन यदि शराब को लेकर शहर बसाने और शहर बचाने की ईमानदार कोशिश है तो वह सफल हो सकती हैं क्योंकि नम्बर दो की जहरीली शराब पहाड़ों के दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचाने वाले सफेदपोश तस्करी में सक्रिय हैं। इस तस्करी में बड़ी संख्या में युवा बर्बाद हो चुके हैं। इन हालातों को काबू में पाने के लिये आबकारी नीति में अभी और भी परिवर्तन की जरूरत है। परचून की दुकान में शराब उपलब्ध करवाने के अलावा इससे जुडे़ अन्य बिन्दुओं पर भी विचार कर लेना चाहिये ताकि शराब नाम से बदनियती, बदमिजाजी को रोका जा सके।

यह लेख ‘पिघलता हिमालय’ साप्ताहिक से साभार लिया गया है.

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