शराब को लेकर क्या नीति ?


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राजीव लोचन साह
February 20, 2019

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उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में जहरीली शराब से सौ के आसपास लोगों के हलाक हो जाने की घटना से जनता में दुःख और गुस्सा है। शराब को लेकर लोग अमूमन और महिलायें खास तौर से सरकार से नाराज रहते हैं। उत्तराखंड में शराब को लेकर लगातार आन्दोलन होते रहे हैं। पिछली सदी के साठ और सत्तर के दशकों में सर्वोदयी कार्यकर्ता शराब की बिक्री और प्रसार के खिलाफ लगातार जन जागरण और आन्दोलन करते थे। 1984 में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के नेतृत्व में जो ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आन्दोलन चला था, उसने सारे पहाड़ को अपने आगोश में ले लिया था और उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी को उत्तराखंड की सबसे बड़ी राजनैतिक ताकत के रूप में स्थापित कर दिया था। तब सैकड़ों ऐसे कार्यकर्ता तैयार हुए थे, जो आज भी विभिन्न राजनैतिक दलों में या समाज के अन्य क्षेत्रों में सक्रिय हैं। उत्तराखंड आन्दोलन में राजधानी गैरसैंण, मुजफ्फरनगर कांड के अपराधियों को सजा और कश्मीर की धारा 370 की तर्ज में उत्तराखंड में भू कानून बनाये जाने के साथ-साथ शराबबन्दी एक प्रमुख माँग थी। मगर राज्य बन गया और शराब की समस्या का तब भी कोई समाधान नहीं निकला। आज भी शराब के खिलाफ कोई संगठित आन्दोलन भले ही न हो रहा हो, लेकिन यत्र-तत्र स्त्रियाँ अक्सर स्वतःस्फूर्त ढंग से शराब के ठेकों का विरोध करते हुए देखी जा सकती हैं। मगर सरकारों को इस बात से कोई लेना देना नहीं। सरकार किसी भी पार्टी की हो, वह शराब व्यवसायियों के हाथों की कठपुतली होती है। हरीश रावत की कांग्रेस सरकार डेनिस शराब को लेकर चर्चा में आयी थी तो त्रिवेन्द्र रावत की भाजपा सरकार उससे भी एक कदम और आगे निकल गई। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय राजमार्गों के निकट शराब बेचने पर पाबन्दी लगाई गई तो इस सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों की परिभाषा बदल कर शराब के व्यापारियों के लिये रास्ता साफ कर दिया। कुल मिला कर शराब को लेकर एक बार फिर एक बड़ा आन्दोलन छेड़े जाने की जरूरत है।

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राजीव लोचन साह