शमशेर बिष्ट का जाना


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राजीव लोचन साह
September 29, 2018

शमशेर सिंह बिष्ट का जाना एक बहुत बड़ी दुर्घटना है। आजादी के बाद सक्रियता शुरू करने वाले लोगों में शमशेर सिंह बिष्ट अपने ढंग के अकेले राजनीतिक कार्यकर्ता थे और जिस तरह की परिस्थितियाँ फिलहाल हैं, लगता नहीं कि उनके द्वारा खाली किये गये स्थान की पूर्ति जल्दी हो पायेगी। 1972 में अल्मोड़ा छात्रसंघ के अध्यक्ष के रूप में उनका सामाजिक जीवन शुरू हुआ और अगले 45 सालों तक वे लगातार सक्रिय रहे। उनकी सक्रियता अल्मोड़ा, कुमाऊँ या उत्तराखंड तक ही सीमित नहीं थी। देश भर के लोग उन्हें एक जुझारू आन्दोलनकारी के रूप में जानते थे, क्योंकि देश भर में कहीं भी चल रहे जनान्दोलनों में वे तत्काल पहुँच जाते थे। उनकी इसी सक्रियता के कारण देश के अन्य क्षेत्रों के प्रबुद्ध लोग और आन्दोलनकारी भी उत्तराखंड से लगातार सम्पर्क बनाये रखते थे। उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी, जिसके वे लगभग आजीवन अध्यक्ष रहे (यह संगठन बाद में उत्तराखंड लोक वाहिनी में रूपान्तरित हो गया), एक पूरी पीढ़ी को जनान्दोलनों में दीक्षित करने की पाठशाला थी और इसके झंडे तले उन्होंने उत्तराखंड के तमाम तेजस्वी नौजवानों को संगठित किया। यह तथ्य है कि उत्तराखंड की पहली निर्वाचित विधानसभा के 70 में से 45 सदस्य ऐसे थे, जो राजनीति का ककहरा संघर्ष वाहिनी से सीख कर आये थे। 71 वर्ष की उम्र कुछ भी नहीं होती, मगर जैसा संघर्षशील और अनियमित जीवन शमशेर बिष्ट का रहा, उसकी स्वाभाविक परिणति थी कि वे कम उम्र में ही रोगों में घिर जाते। पांच साल पहले गुर्दे की बीमारी के कारण उनकी हालत लाइलाज ही हो गई थी। मगर उनके प्रशंसकों को उम्मीद थी कि वे घर चहारदीवारी में कैद हो जाने के बावजूद समाज को मार्गदर्शन देते रहेंगे। अपने अन्तिम दिनों तक वे मानसिक रूप से काफी सक्रिय रहे और समसामयिक घटनाओं पर अखबारी बयान के रूप में अपनी प्रतिक्रियायें देते रहे।

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राजीव लोचन साह