उत्तराखंड की सरहद पर फिर तनाव


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हरिश्चन्द्र चंदोला
August 1, 2018

अब उसी तरह की स्थिति भारत के मध्य सीमा क्षेत्र में बनती दिखाई दे रही है। यहां सरहद पर घास का एक लंबा-चौड़ा मैदान, बड़ा होती है, जिसे लेकर भारत और चीन के बीच विवाद है। आसपास के कुछ अन्य सीमा क्षेत्रों पर भी विवाद बना रहता है और वहां समझौता करने की कोई बातचीत भारत और चीन के बीच अभी शुरू नहीं हुई है…

 

चीनी सैनिकों के उत्तराखंड की सरहद में घुस आने की खबरें एक बार फिर अखबारों की सुर्खियां बनी हैं। बरसात के मौसम में कुछ वर्षों से लगातार ऐसी खबरें प्रकाशित हो रही हैं। इस सरहद पर भारतीय फौज तथा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की अच्छी खासी संख्या में तैनाती है। लेकिन उनके किसी भी अधिकारी ने इन खबरों की पुष्टि नहीं कीे।

दो वर्ष पूर्व इस सीमा क्षेत्र में चीन का एक हवाई जहाज उड़ता दिखाई दिया था। उसके बाद भारतीय हवाई सेना के कई जहाज इस क्षेत्र का लगातार चक्कर काटते कई दिनों तक यहां के लोगों ने देखे। तब भी भारतीय सेना तथा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के अफसरों ने यह नहीं कहा कि सीमा का अतिक्रमण हुआ है। एक अफसर ने पूछे जाने पर केवल इतना कहा कि उसे मालूम है कि सीमा पर क्या हो रहा है, किन्तु वह उस विषय पर कुछ बतला नहीं पाएगा।

इस सीमा पर तनाव न बने, इससे बचने के लिए भारतीय रक्षा तंत्र यहां घटित होने के सरहदी अतिक्रमण की खबरों को दबाने के प्रयास में लगा रहता है। इस क्षेत्र के भारतीय सरहदी रक्षकों को शायद आदेश दिये गये हैं कि सीमा का उल्लंघन किये जाने पर वे सार्वजनिक रूप से कभी कुछ न बोलें।

यही स्थिति उत्तर-पूर्व के अरुणाचल प्रदेश में 1960 के दशक के सरहदी युद्ध के पूर्व थी। चीनी सेना द्वारा भारतीय सीमा के अतिक्रमण की तब जो भी खबरें आतीं, उन सबको दबा दिया जाता था। खबरें तब तक दबाई जाती रहीं, जब तक चीनी फौज ने भारतीय शिविर लोंगज़ू पर आक्रमण कर हमारी सेना को चार मील पीछे तक खदेड़ नहीं दिया। मैं उस समय एक प्रमुख भारतीय दैनिक का शिलांग में उत्तर पूर्व संवाददाता था और मैंने ही यह खबर सबसे पहले अपने अखबार को प्रकाशनार्थ भेजी थी। उसके बाद चीनी सेना भारतीय सरहद के अंदर दो सौ किलोमीटर तक आ गई और सीमा पर युद्ध छिड़ गया। फिर चीनी सेना स्वयं ही अपने तिब्बती अड्डे पर वापस जाने लगी और वह युद्ध समाप्त है गया। हालांकि सरहद पर विवाद तब भी जारी रहा।

अब उसी तरह की स्थिति भारत के मध्य सीमा क्षेत्र में बनती दिखाई दे रही है। यहां सरहद पर घास का एक लंबा-चौड़ा मैदान, बड़ा होती है, जिसे लेकर भारत और चीन के बीच विवाद है। आसपास के कुछ अन्य सीमा क्षेत्रों पर भी विवाद बना रहता है और वहां समझौता करने की कोई बातचीत भारत और चीन के बीच अभी शुरू नहीं हुई है।

वर्षा काल से पूर्व ज्ब बड़ा होती में घास अच्छी उगती है तो सरहदी तिब्बती गांव वाले शीतकाल में कृषकाय हुए अपने याक तथा बकरियों को चराने वहां में ले आते हैं और महीनों वहीं रहते हैं। भारतीय सरहदी गावों के भेड़पालक भी अपने पशुओं को चराने के लिये वहां कुछ महींनों के लिए जाते हैं। इस पर दोनों देशों में कोई तनाव नहीं होता। तिब्बती पशुचारक कभी भारतीयों को धमकी देते हैं कि वह चरागाह उनका है और भारतीयों को वपस चला जाना चाहिए। चीनी सेना की कुछ चौकियां तिब्बती सरहदी गांव, दापा के पास हैं किन्तु भारत-चीन के बीच उस पर कोई विवाद नहीं होता। लेकिन इस सीमा का अभी तक स्पष्ट विभाजन नहीं हुआ है।

दापा एक पूरा तिब्बती गांव है। चीन के दावे के अनुसार सारा तिब्बत उसका है। इस दावे के अनुसार चीन कभी भी यह कह सकता है कि यह सारा सीमा क्षेत्र उसका है। भारतीय भेड़-बकरी पालकों का प्रवेश वह प्रतिबंधित कर सकता है।

भारत-चीन की इस मध्य क्षेत्र की सीमा पर समझौता होना अभी बाकी है। दोनों देशों में इस विषय पर दस्तावेज़ों का आदान-प्रदान है चुका है। लेकिन उन पर वार्ता होना अभी बाकी है, जिसके बाद ही इस सीमा का निर्धारण किया जाएगा।

इस सरहदी क्षेत्र पर अपना दावा बनाए रखने चीन कभी अपने सैनिक भारत के अधीन क्षेत्र में गश्त लगाने भेज देता है, जो उसे पूरा करने के बाद वापस चले जाते हैं। गश्त पर आए चीनी सैनिक कभी-कभी अपने खाने के खाली डिब्बे तथा कागज़ छोड़ जाते हैं, जिन्हें भारत-तिब्बत सरहदी पुलिस के सिपाही उठा कर भारत ले आते हैं। इस पुलिस दल के पास एक बड़े सफेद कपडे़ पर चीनी अक्षरों में लिखा संदेश होता है, जो कहता है कि यह भारत की भूमि है और चीनियों को यहां से वापस चला जाना चाहिए। किन्तु चीनी सैनिक उसकी परवाह न कर, अपनी गश्त पूरी करने के बाद ही वापस लौटते हैं। वे उस विवादित क्षेत्र में स्थायी रूप से रहते नहीं हैं और अपने ठिकानों को लौट जाते हैं।

भारतीय फौज का जोशीमठ में स्थापित ब्रिगेड यहां चीनी भाषा सिखाने का एक स्कूल चलाता था, जिसे दस वर्ष से अधिक चलाने के बाद बिना कारण बताये अचानक पिछले वर्ष बंद कर दिया गया। कुछ सैनिकों को चीनी भाषा सिखाने के अलावा वह चीनी भाषा में लिखे, सरहद पर छूटे कागज़ों तथा अन्य जगहों में मिली चीनी भाषा में लिखी सामग्री का अनुवाद भी करता था। यहां स्थानीय लोगों की समझ में यह नहीं आया कि इस भाषा केन्द्र को फौज ने अचानक क्यों बंद कर दिया, जबकि वह अपने इस प्रकार के केन्द्र अन्य स्थानों में चला रहा है ? यह सीमा पर अच्छा साधन था, जिसेके अचानक बंद करने का कोई कारण नहीं बताया गया।

इस सरहद पर जब चीनी सैनिकों की गश्त की खबर मिलती है तब कहा जाने लगता है कि चीनियों ने भारत की सीमा का अतिक्रमण किया है। किन्तु, जैसे कहा गया है कि चीनी सैनिक भारत की भूमि में घुस कर, गश्त लगा अपने स्थानों को वापस चले जाते हैं। भारत के पशुचारक उन्हें देख कर संदेश देते हैं कि चीनियों ने सरहद पर अतिक्रमण किया है।

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हरिश्चन्द्र चंदोला

1950 में हिन्दुस्तान टाइम्स से पत्रकारिता शुरू करने वाले हरिश्चन्द्र चंदोला 50 वर्ष तक देश के शीर्षस्थ अंग्रेजी दैनिक अखबारों में काम करते हुए विश्व के अनेक देशों में तैनात रहे। 89 वर्षीय चंदोला जी अब जोशीमठ में रहते हैं तथा हिन्दी में लिखना पसन्द करते हैं।