संगीत के साज पर मौसम की कविता 


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भास्कर उप्रेती
February 12, 2018

कोई भी क्लासिकल कहलाने वाला घराना किसी न किसी समय लोक का ही हिस्सा था. लोक सभी प्रकार की कलाओं और संगीत का स्रोत रहा है. जहाँ लोक से रिश्ता टूट जाता है, कला एक खास वर्ग के मनोरंजन का माध्यम भर बनकर रह जाती है.

‘क से कविता’ की 15वीं बैठक अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के पीली कोठी रोड स्थित पुस्तकालय में आयोजित की गयी. इस बार की बैठक में ‘कुमाउंनी बैठकी होली की परंपरा’ को केंद्र में रखते हुए की गयी. बैठक के पहले हिस्से में विशेष मेहमान और संगीतकार प्रो. पंकज उप्रेती ने विस्तार ने बताया कि कुमाउंनी होली बाकी होलियों से किस तरह भिन्न है, बैठकी और खड़ी होली का अंतर क्या है, अलग-अलग राग क्यों हैं, कब कौन सा राग गाया जाता है, कैसे कुमाउंनी होली ने और खासकर बैठकी होली ने अपनी अलग पहचान बनायी है, संगीत कहाँ शिक्षा है और कहाँ शिक्षा में संगीत है.

प्रो. पंकज उप्रेती ‘हिमालयन संगीत शोध समिति’ के संयोजक हैं और टनकपुर डिग्री कॉलेज में संगीत के शिक्षक हैं. वह ‘पिघलता हिमालय’ के संपादक (स्व.) आनंद वल्लभ उप्रेती के बड़े पुत्र हैं. उनके छोटे पुत्र और अब ‘पिघलता हिमालय’ का काम देख रहे संगीतकार धीरज उप्रेती ने प्रो. पंकज के साथ तबले पर संगत दी. आनंद वल्लभ जी का जिक्र इसलिए जरूरी है क्यूंकि उन्होंने ही हल्द्वानी नगर की संस्कृति में संगीत को एक जरूरी विषय के रूप में प्रतिस्थापित करने का काम किया. उत्तर प्रदेश के किसी मैदानी स्कूल से अंग्रेजी प्रवक्ता की नौकरी छोड़कर जब वह हल्द्वानी आये तो उन्होंने देखा कि यहाँ का विकास आधा-अधूरा है. एक तरह उन्होंने जहाँ पत्रकारिता से इसे सींचना शुरू किया, दूसरी तरफ रामलीला आदि मंचों के माध्यम से संगीत को महत्व प्रदान करने का प्रयास किया. वह पर्वतीय उत्थान मंच के संस्थापकों में से एक थे. ‘नंदा राजजात’ यात्रा पर लिखी उनकी पुस्तक को संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार ने नवाजा. हल्द्वानी नगर के बनने की कहानी भी उन्होंने लिखी है और उत्तराखंड आन्दोलन का व्यंग्यात्मक इतिहास भी लिखा है.

पंकज उप्रेती ने बताया कि कोई भी क्लासिकल कहलाने वाला घराना किसी न किसी समय लोक का ही हिस्सा था. लोक सभी प्रकार की कलाओं और संगीत का स्रोत रहा है. जहाँ लोक से रिश्ता टूट जाता है, कला एक खास वर्ग के मनोरंजन का माध्यम भर बनकर रह जाती है. उन्होंने बताया कि कुमाउंनी होली अब एक अलग पहचान बना चुकी है, क्यूंकि इसमें लोक का गहरा पुट है. मगर, कई बार इसे कुछ कलाकारों तक सीमित मान लिया जाता है. वह गाते हैं और बाकी सुनते हैं. जबकि, इसकी खासियत यह थी कि यह पहले सबके द्वारा गाई जाती थी, यही इसकी ताकत थी.

उन्होंने राग बागेश्वरी, जयजयवन्ती, देशकार, मियां मल्हार, गौड़ मल्हार, बहार, शुद्ध कल्याण, विभास, परज, पीलू आदि में कुछ रचनाओं के टुकड़े भी पेश किये. रागालाप को उन्होंने बड़े ही सरल तरीके से समझाने की कोशिश करते हुए बताया कि किस तरह हमारे मूड के अनुसार राग तय किये गए हैं. हम जब उठते हैं तब हमारा मूड, दिन के समय का मूड, शाम के समय का मूड अलग-अलग रागों को अपनाते हैं. यह नैसर्गिक प्रक्रिया है. इसी से बाद में शास्त्र बना दिया गया. इस बात को काल का प्रमाण भी कहा जाता है. उन्होंने बताया कि ध्रुपद गायन के लिए अधिक मेहनत और लगन की जरूरत होती है और इसके जानकर कम ही पाए जाते हैं. जबकि, ख़याल गायकी ज्यादा प्रचलन में है. राग नियमों का आलाप करते हुए अपनी कल्पना से आलाप करना और किसी ताल में इसे साधना. ख़याल को दो रूपों में देखा जाता है- विलंबित ख़याल और द्रुत ख़याल. संक्षेप में उन्होंने बताया कि संगीत मनुष्य के जीवन में उस गैप को भरता है जो शब्द, भाषा, विचार या कला के अन्य रूप व्यक्त नहीं कर सकते. संगीत सरल मनों से भले ही उत्पन्न हुआ हो लेकिन यह जटिलताओं में अधिक सुहाता है.

उन्होंने बताया कि कुमाऊं में होली और रामलीला की शुरुआत तो शास्त्रीय तरीके से हुई लेकिन यह शीघ्र ही लोक में गुंथ गयी. शास्त्रीय ज्ञान का ज्ञान न होने पर भी समूह शिक्षा से आम जन इसे अपना सकते हैं. इसलिए ठेठ गांवों में भी एक बड़े समूह को राग में आलाप करते हैं और लोकताल में थिरकते देखा जा सकता है. होली और रामलीला की लंबी परंपरा स्थापित होने की वजह से अब आम जन को भी रागों के नाम, गायन का समय, तालों की जानकारी रहती है. अल्मोड़ा नगर के संगीतप्रेमियों से शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत के मिश्रण को लेकर भांति-भांति के प्रयोग किये. बाद में अन्य क्षेत्रों में भी लोगों ने इस तरह के प्रयोग किये. कुमाउंनी शैली की होली गायन का इतिहास दो शदी के भी अधिक पुराना है.

आजादी की लड़ाई के दिनों में गौर्दा और उनके शिष्य चारु चंद्र पांडेय ने कुमाउंनी होली में नए आयाम जोड़ दिए. होली गायन आज़ादी के संदेश प्रसारित करने का औजार बन गयी ‘क से कविता’ कार्यक्रम में इस बार जगदीश जोशी जी ने गौरी दत्त पांडेय ‘गौर्दा’ की कविता ‘वृक्षन को विलाप’ का सस्वर पाठ किया. पूरन बिष्ट ने दुष्यंत कुमार की गजल गाकर सुनाई. रोहित जोशी ने नरेश सक्सेना की एक कविता सुनाई और गिर्दा की कविता ‘ओ दिगो लालि’ गाकर सुनाई. रुद्रपुर से आये हेम पंत ने नरेंद्र सिंह नेगी की कविता ‘मुट्ठ बोटी की रख’ सुनाई. हर्षिता रौतेला ने जगदीश गुप्त की कविता ‘होली आई’ और सहज मोहन फुलारा ने रामधारी सिंह दिनकर की ‘मिर्ची’ बाल कविताएँ सुनायी.

इस मौके पर डॉ. महेश बवाड़ी, दीपक नौगाई, मनीषा जोशी, रवि मोहन, जगदीश जोशी, मोहन सिंह नेगी, प्रो. प्रभात उप्रेती, जगमोहन रौतेला, विनोद जीना, पूरन सिंह बिष्ट, मनोज पाण्डेय, ओ.पी. पाण्डेय, हेम पंत, कौशल पांडेय, लोकेश कुमार, पंकज जोशी, भानु प्रकाश पाण्डे, धीरज उप्रेती आदि मौजूद थे. कार्यक्रम में रुद्रपुर से आये हेम पन्त ने उनकी टीम द्वारा संचालित ‘सृजन पुस्तकालय’ उसमें आयोजित होने वाली गतिविधियों की जानकारी भी दी. साथ ही नैनीताल में अप्रैल में प्रस्तावित ‘क से कविता’ के वार्षिक सम्मेलन की भी जानकारी दी गयी. यह भी बताया गया कि उत्तराखंड में ‘क से कविता’ का काफिला कुछ और जगहों पर पहुँच गया है. आज पौड़ी में ‘क से कविता’ की पहली बैठक हुई है, कल अगस्त्यमुनि में पहली बैठक होगी. कुछ दिन पहले रुड़की में पहली बैठक आयोजित हुई थी. वार्षिक सम्मेलन में प्रदेश के कोने-कोने से कविताओं के प्रतिनिधि शामिल होंगे. साथ ही देश के कई हिस्सों का भी प्रतिनिधित्व देखने को मिलेगा.

 

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भास्कर उप्रेती

दैनिक जागरण, हिंदुस्तान और कई दूसरे संस्थानों के साथ पत्रकारिता। इन दिनों अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथ शिक्षा के क्षेत्र में काम।