संविधान को आत्मसात करें


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राजीव लोचन साह
January 26, 2018

‘पद्मावत’ फिल्म के परिप्रेक्ष्य में देखें तो 68वें गणतंत्र दिवस पर एक ऐसी भीड़ इस देश को चलाती दिख रही है, जिसे अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ ही पता नहीं है। ऐसी भीड़ आज से दो हजार साल पहले होती तो ‘कुमारसंभव’ लिखने पर कालिदास को सूली पर चढ़ा देती।

‘‘हम, भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित कराने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’ यह भारतीय संविधान की वह उद्देशिका अथवा प्रिएम्बल है, जिसे हम हर गणतंत्र दिवस को संकल्प के रूप में पढ़ते हैं। मगर लगता हैं कि सिर्फ पढ़ते हैं, उसमें लिखित शब्दों की गहराई में जाकर उसे आत्मसात करने की कभी ईमानदारी से कोशिश नहीं करते। यदि करते होते तो गैट समझौते पर हस्ताक्षर करने और आर्थिक उदारीकरण लागू कर अपनी संसद को अप्रासंगिक बना कर देश की संप्रभुता के आगे प्रश्नचिन्ह खड़ा न करते; ‘समाजवाद’ और ‘पंथ निरपेक्षता’ का इस तरह मजाक न बनाया जाता और ऊपर लिखी गईं तमाम तरह की स्वतंत्रतायें महज कागजों में ही न रह जातीं। ‘पद्मावत’ फिल्म के परिप्रेक्ष्य में देखें तो 68वें गणतंत्र दिवस पर एक ऐसी भीड़ इस देश को चलाती दिख रही है, जिसे अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ ही पता नहीं है। ऐसी भीड़ आज से दो हजार साल पहले होती तो ‘कुमारसंभव’ लिखने पर कालिदास को सूली पर चढ़ा देती। इस भीड़ को इसके अज्ञान पर एकबारगी माफ भी किया जा सकता है। मगर खतरनाक बात यह है कि संविधान की कसम खाकर अपने पदों पर आये राजनेता इस भीड़ का मार्गदर्शन करते और इसे उकसाते दिख रहे हैं। यदि हमें देश को आगे ले जाना है तो संविधान की मूल भावना को पूरी तरह आत्मसात करना पड़ेगा। आइये, इस पवित्र अवसर पर हम संविधान  को नये सिरे से पढ़ें और उसे पूरी तरह जमीन पर उतारने के लिये कमर कस लें।

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राजीव लोचन साह