सडवरी वैली स्कूल : जहाँ बच्चे खुद तय करते थे, कि क्या पढ़ना है!


नैनीताल समाचार
August 16, 2018

राजीव जोशी

(राजीव जोशी शैक्षि​​क दखल समिति के सचिव हैं। समान शिक्षा के पक्षधर ही नहीं उसके लिये संघर्षरत् भी हैं।)

बच्चे आजाद हों तो ही सीखते हैं। बचपन का विकास पूरी आजादी में ही संभव है। बच्चे आजादी पसंद होते भी हैं। शिक्षा की समान्य सी समझ रखने वाले लोगों में इस बात पर कोई दो राय नहीं। दुनियाभर के नवाचारी सफल स्कूलों की यह एक बुनियादी शर्त रही है। अपने बच्चों को आजादी देते समय मन में दो आशंकाएं मुख्यरूप से सामने आती हैं। पहला, उनकी सुरक्षा और दूसरा उनकी क्षमताओं पर हमारा विश्वास। यदि यह विश्वास हो जाय समाज में बच्चे सुरक्षित हैं तो फिर बच्चों की क्षमताओं पर भरोसा किया जा सकता है। शारीरिक रूप से बच्चे भले ही विकास की अवस्था में होते हैं किन्तु स्वाभाविक रूप से क्रियाशील होते हैं और आजादी का एहसास होते ही वे आत्मविश्वासी, साहसी व अपनी जिम्मेदारियों को उठाने में सक्षम बन जाते हैं। ंअभिभावकों और शिक्षकों के सामने यह सवाल तब भी बना रहेगा कि बच्चों को दी गयी इस पूर्ण आजादी का असर क्या हो सकता है। ये आशंकाएं भी कि बच्चे कहीं बिगड़ तो न जाएंगे? वे कहीं भी चल देंगे। हाथ ही न आएंगे। इन तमाम सवालों और शंकाओं के साथ हम एक ऐसे स्कूल को परखने की कोशिश करते हैं जिसका आदर्श ध्येय वाक्य है- अब हम आजाद हैं।

1968 में मैसाच्युसेट्स अमेरिका के फै्रंमिंग्हैम कस्बे में शिक्षकों और अभिभावकों ने एक अनोखा प्रायोगिक स्कूल स्थापित किया। जिसमें 4 वर्ष से 19 वर्ष के बच्चें प्रवेश ले सकते थे। स्कूल एक लोकतांत्रिक तरीके से एक बैठक द्वारा संचालित होता था। इसमें प्रत्येक छात्र और शिक्षक का एक वोट होता था। स्कूल का हर एक पक्ष- नियम, बजट, प्रशासन, नौकरी देना और बर्खास्त करना तथा अनुशासन, इसी व्यवस्था से संचालित होता था। यह स्कूल किसी न्यासी या सरकार की सहायता के बिना ऐसे शुल्क से संचालित किया जाता था जो सार्वजनिक शिक्षा में प्रति विद्यार्थी व्यय के लगभग आधा था। यहाँ बच्चों को अपनी गति से पढ़ने-सीखने के लिए छोड़ दिया जाता था। वे चाहें तो पढेें, चित्र बनाएं, कम्प्यूटर के आगे बैठें, पेड़ पर चढे़ं, वर्कशाॅप में बैठकर कुछ सीखें या बढ़ईगिरी करें, कोई वाद्य यंत्र बजाएं या फिर मछली पकड़ना सीखें। जहाँ कोई विषय अनिवार्य नहीं था किन्तु स्कूल से कोई छात्र ऐसा बाहर नहीं निकला जो किसी एक विषय का गम्भीर अध्ययन किए बिना बाहर गया हो।

स्कूल यह पोषित करता था कि लोग जिम्मेदारी को समूचे अर्थ का अनुभव करें। वे अपनी गठरी खुद उठा सकें। बच्चे अपने निर्णय स्वयं लें और उसके परिणामों का सामना भी स्वयं करंे। उन्हें यह एहसास हो कि इन परिणामों से हमें बचाने कोई नहीं आएगा। अपने व्यवहार से उपजे परिणामों का सामना उन्हें स्वयं ही करना होगा। एक जिम्मेदार व्यक्ति बनने की अवधारणा मुक्त और स्वतंत्र व्यक्ति बनने से जुड़ी होती है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी व जबाबदेही उसे स्वनिर्देशित बना देती है। इस प्रक्रिया में वे गलतियां कर सकते हैं किन्तु उन्हें यह भी एहसास होता है कि उनके द्वारा गलतियां उनकी अपनी हैं।

एक ऐसा स्कूल जहाँ कोई भयभीत न हो। स्कूल का वातावरण भयमुक्त, खुला, ईमानदार और विश्वसनीय हो। भय स्थापित करना उस शक्ति का काम है जो किसी को नियंत्रण में रखना चाहती है। शक्ति व सत्ता के भय को हटाना ही इस स्कूल का लक्ष्य था। एक लोकतांत्रिक सरकार के जरिए स्कूल के हर एक सदस्य को निर्णय लेने की प्रक्रिया का साझीदार बनाने से बच्चे महत्वपूर्ण हो जाते हैं। स्वाभाविक रूप से बच्चों को वहीं अच्छा लगता है जहाँ उनको महत्व मिलता है। सडवरी वैली स्कूल अपने ढाँचे से भी स्कूल जैसा नहीं लगता वो तो किसी घर जैसा ही दिखता था, जहाँ लोग अपने-अपने काम में संकल्पित, सहज किन्तु व्यस्त नजर आते थे। ग्रेनाइट के पत्थरों से निर्मित इमारत के चारों ओर दस एकड़ की जमीन में फैला लाॅन, फूल, पेड़, झाड़ियाँ, पनचक्की ताल आदि हैं।

इस स्कूल की एक खासियत यह भी थी कि बच्चों को वही सिखाया जाता था जिसे सीखने के लिए वे प्रवृत्त हों। सीखना जबरदस्ती हो ही नहीं सकता। जब सीखने में रूचि हो तो बच्चे चमात्करिक रूप से बहुत तेज सीखते हैं। इसका एक उदाहरण यह मिलता है कि दर्जन भर लड़के-लड़कियां जो स्वयं अंकगणित सीखने के लिए पहुँची उन्होंने बीस सप्ताह में, बीस सम्पर्क घंटों में छः साल के बराबर काम सीख लिया। जोड़, घटाना, गुणा, भाग, दीर्घ विभाजन, पहाड़े, भिन्न, दशमलव, प्रतिशत और वर्गमूल। रूचि के विपरीत यह सब सिखाने में हम अपने पारम्परिक स्कूलों में कक्षा-8 तक भी इतना सिखाने में असफल रहते हैं। सडवरी वैली स्कूल में बच्चे स्वयं तय करते हैं कि सीखना क्या है। कभी-कभी तो वे इसका तरीका भी स्वयं खोज लेेते हैं। इसके लिए बच्चे स्वयं कोई किताब ढूँढकर या कम्यूटर प्रोग्राम खोजकर सीख लेते हैं। शिक्षक की घुसपैठ तो तब होगी जब वे इसके लिए किसी को मदद के लिए ढूँढते हैं। तब सिखाने और सीखने वालों के बीच एक सौदा तय होता है कि सीखने वाले और सिखाने वाला क्या करेंगे, क्या नहीं करेंगें। एक जैसा सीखने वाले कहीं पर बैठकर ऐसा कुछ करने लगे तो कक्षा बन गयी वरना कक्षा जैसी किसी चीज के बिना भी सीखना होता रहता है। हमारे स्कूलों की तरह कक्षा के रूढ़ सांचे वहाँ नहीं मिल सकते। इस स्कूल में सीखना बिल्कुल सहज, ढीला-ढाला, बिना मेहनत का काम, निरूद्देश्य, अनुशासनहीन और अव्यवस्थित काम लगता। इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण था-सीखने के लिए बच्चों द्वारा स्वयं लिया गया निर्णय और उनकी लगन।

रिचर्ड किसी भी दशा में बहुत दूर से रोज स्कूल आता था और चार घंटे तुरही का रियाज करता था। बाद में एक ऐसे ही एक लड़के फे्रड का आगमन हुआ जिसे ढोल बजाने का सुर चढ़ा था। इन दोनों ने अपने रियाज से स्कूल को हिला दिया। तब स्कूल के मुख्य भवन से दूर चक्की भवन को संगीत कक्ष बना दिया गया। जहाँ ये रोज चार-पाँच घंटा रियाज करते। दो वर्ष बाद अठारह साल की उम्र में यह संगीतज्ञ बनकर बाहर निकला। बाॅब अपनी धुन का पक्का माना जाता था। वह जो शुरू करता छोडता न था। उसने असंख्य घंटे पियानो सीखने में लगाए। स्कूल की प्रेस चलाई। स्कूल की न्यायिक व्यवस्था पर पूरे शोध के साथ अपनी किताब प्रकाशित करवाई। अचानक उसे भौतिकशास्त्र पढ़ने की धुन सवार हो गयी। सौदा तय हुआ कि तय किताब के प्रत्येक अभ्यास को पूरा करना होगा। छोटी सी समस्या आते ही उसे दूर कर लेना होगा अन्यथा वह बड़ी समस्या बन जाएगी। बाॅब किताब के साथ ऐसा गायब हुआ कि अपने काम को अधूरा न छोड़ने की आदत की विपरीत पाँच महीने तक नहीं लौटा। जब लौटा तो पृष्ठ संख्या 252 की एक समस्या को लेकर आया। जिसका समाधान करने में मुश्किल से पाँच मिनट का समय लगा। उसने पूरी किताब खुद ही खत्म कर दी। बीजगणित और कलन में उसने कोई मदद नहीं ली। बाद में बाॅब एक गणितज्ञ बना।

ल्यूक अन्त्येष्टि घर का व्यवस्थापक बनना चाहता था। एक पन्द्रह साल के लड़के के लिए यह सामान्य बात नहीं थी। यह काम उसकी समझ में आता था। उसे यह ऐसी जगह लगती थी जहाँ वह अपने समाज के लोगों के काम आ सकता था और रोते-बिलखते लोगों को दिलासा दे सकता था। उसने अपने आप को रसायनशास्त्र, पशुशास्त्र और जीव विज्ञान के अध्ययन में झोंक दिया। सोलहवें साल के आते-आते वह इस गम्भीर काम के लिए तैयार था। एक प्रादेशिक अस्पताल के मुख्य रोग विज्ञानी ने इस उत्सुक, और मेहनती विद्यार्थी का बखूबी स्वागत किया। ल्यूक वहाँ तेजी से सीखने लगा। साल भर के अन्दर वह बिना किसी की मदद के शव-परीक्षण करने लगा। अस्पताल के इतिहास में यह पहली बार हुआ। पाँच साल में ल्यूक अन्येष्टि व्यवस्थापक भी बन गया। शिक्षा के अनौपचारिक ढाँचे में यह एक अनोखी बात लग सकती है।

चैदह साल के साॅल को फोटोग्राफी का शौक चढ़ गया। स्कूल में उसे कुछ मदद नहीं मिल सकती थी। उसे एक डार्करूम उपलब्ध कराया गया जो नाकाफी था। उसने स्कूल छोड़ने के बजाय उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग करने का मन बनाया। कठिन परिश्रम से उसने एक लैब बनाई। साल भर में उसने लैब का कायाकल्प कर दिया। उसके लिए स्कूल से कुछ उपकरण खरीदे गए। जब इससे आगे काम सीखने की गुंजाइस स्कूल में नहीं थी। वह जो के पास गया। उसने पूरी जिम्मेदारी के साथ व्यवहारिक प्रशिक्षण लिया। बाद मंे साॅल अपने क्षेत्र में दक्ष एक कला फोटोग्राफर बना। इन उदाहरणों में समान बात यह थी कि बच्चे सीख रहे थे उन्हें सिखाया नहीं जा रहा था। सडवरी वैली स्कूल का सिद्धान्त यही था कि बच्चे की ओर से पहले कदम के उठने की धैर्य से प्रतीक्षा करो और वही सिखाओ जो वह सीखना चाहता है। वैसे ही सिखाओ जैसे सीखने के लिए वह सहमत हो जाए।

पढ़ना-लिखना भी उन्हें तभी सिखाया जाता था कि जब उन्हें इसकी जरूरत महसूस हो। स्वयं डेनियल ग्रीनवर्ग की अपनी बेटी आठ साल की उम्र तक पढ़ना सीखे बिना स्कूल में घूम रही थी। किसी स्कूल पर यह सवाल उठाया जा सकता है कि वह स्कूल अच्छा कैसे हो सकता है जिस स्कूल की कोई बच्ची आठ साल की उम्र तक निरक्षर हो। नौ साल की उम्र में उसने तय किया कि उसे पढ़ना है। साढ़े नौ साल की उम्र में वह सब कुछ पढ़ सकने वाली पाठक बन गयी। इस स्कूल का ये भी अनुभव रहा कि देर से पढ़ना सीखने वाले बच्चे किताबी कीड़ा बन जाते हैं और जल्दी पढ़ना सीखने वाले बच्चे कोई भी किताब पूरा नहीं पढ़ पाते। यहाँ बच्चों के पढ़ना सीखने के अपने तरीके हैं। कुछ कहानियाँ सुनकर याद कर लेते हैं बाद में उन्हें पढ़ने लगते हैं। कुछ सड़क किनारे के बोर्डों से पढ़ना सीख जाते हैं। कुछ अक्षरों से शब्द ध्वनियाँ और मात्राएं बैठाना सीखते हैं। वहाँ यह समझ में ही नहीं आता कि बच्चे पढ़ना कैसे सीखते हैं। बच्चों के लिए यह काम बोलना सीखने जैसा ही आसान था। स्कूल में बच्चों को पढ़ने के लिए बाध्य नहीं किया गया, धकेला, उकसाया या फुसलाया नहीं गया। किसी ने आठ, किसी ने दस तो किसी ने बारह साल में भी पढ़ना सीखा। परन्तु निरक्षर कोई नहीं रहा। स्कूल से निकले बच्चों को देखकर यह नहीं बताया जा सकता कि किसने किस उम्र में पढ़ना सीखा।

डैन को आजादी मिली तो उसने सिर्फ मछली मारने का काम किया। उसका पिता जाॅन बड़ा चिन्तित रहता। स्कूल ने सीखने में अपने अहस्तक्षेप की नीति नहीं छोड़ी। वह मछली मारता रहा। पन्द्रह साल की उम्र में वह कम्प्यूटर प्रेम में पड़ गया। सोलह साल की उम्र में वह एक स्थानीय कम्पनी में सेवा विशेषज्ञ बन गया। सत्रह साल की उम्र में उसने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर कम्प्यूटर बेचने और सेवा देने की एक कम्पनी स्थापित की। खूब पैसा कमाया। काॅलेज जाकर खूब पढ़ाई की। इस दौरान हनीवैल में वह एक लोकप्रिय कम्प्यूटर विशेषज्ञ के तौर पर काम भी करता रहा। डैन ने मछली पकड़ने के दौरान जो सीखा उसे वह कभी नहीं भूला। शान्त प्राकृतिक वातावरण में सरसराते पेड़ों और कल-कल, छल-छल करती नहर के किनारे वर्षा, धूप या शीत में ध्यान मग्न खड़े होकर मछली पकड़ना क्या कुछ नहीं सिखा सकता है। स्कूल में कइयों ने मछली मारी और इस पर किताबें लिखी।

सडवरी वैली स्कूल का कोई तय पाठ्यक्रम नहीं था। बच्चों को जब जो सीखना की इच्छा होती वे बैठक में इसका प्रस्ताव रखते। हर बार अपने अकाट्य तर्कों से प्रस्ताव पास कर ले जाते। स्कूल की निर्णयन प्रक्रिया में हर बच्चे के पास शिक्षक के ही समान एक वोट का अधिकार होने से बच्चे अपनी बात मना ले जाते। यह एक बड़ा लोकतांत्रिक मूल्य है जिसमें बहस और असहमतियों के लिए स्थान था। पहले-पहल लोग स्कूल में कूड़ा-कचरा विखेर देते थे। स्कूल के कई लोग इस समस्या से जूझ रहे थे। ऐसा कोई जाहिर तरीका नहीं था जिससे ऐसे बेपरवाह लोगों में सौन्दर्यबोध विकसित किया जा सके। इस पर सभा में लम्बा विचार-विमर्श चला। जो आलसी कचरा विखेर देते हैं उन्हें जबरन कूड़ा उठाने को कैसे कहा जाय। लम्बी बहस के बाद जैक ने सुझाया कि जो कचरा फेंकते हैं उन्हें फेंकने दो जो उठाते हैं उन्हें उठाने दो। यह लाइन कई सालों तक किताब में लिखी रही। बाद में ऐसे आलसियों ने भी कचरा न फैलाना सीख लिया। स्कूल का अध्यक्ष दो साल के लिए चुना जाता था। प्रारम्भ के दो सालों में तो अध्यक्ष छात्र ही रहा।

स्कूल के अन्दर छोटे-छोटे निगम बने थे जो एक तरह के विभाग थे। जैसे पाक निगम, जिसमें एक नेवी आॅफीसर की पत्नी मार्गरेट ने काफी वक्त बिताया। कभी-कभार घोषणा हो जाती कि आगामी मंगलवार को फलां चीज पकाने वाली हैं। लोग उसमें हस्ताक्षर कर देते और जुट जाते। पकाई गयी सामग्री बेची जाती थी। आमदनी निगम को जाती थी। उम्र भले ही कुछ भी हो काम सब को करना पड़ता था। निगम से दक्ष होने का लाइसेंस मिलने पर ही कोई किचन में स्वतंत्रतापूर्वक काम कर सकता था।

आयु सडवरी वैली स्कूल का खुफिया अस्त्र था। बच्चे एक दूसरे की मदद करते हैं। उन्हें यह करना पड़ता है वरना पूरा समूह ही पिछड़ जाएगा। वे ऐसा करना भी चाहते हैं क्योंकि अंकों या सुनहरे सितारों के लिए कोई प्रतिस्पर्धा नहीं हो रही होती थी। स्कूल में एक सात साल का लड़का किसी पन्द्रह साल की लड़की के साथ नाचा और उन्होंने पुरूष्कार भी जीता। उम्र के ऐसे बेमेल जोड़े बनते रहे। आयु का अन्तर कभी महसूस ही नहीं होता। बच्चे स्वाभाविक रूप से एक दूसरे को मदद करना सीख जाते। बारह साल की कोई बच्ची किसी सत्रह वर्षीय किशोर को कम्यूटर की बारीकी सिखा रही होती तो उसका आत्मगौरव पुष्ट होता। सात साल की शेराॅन जब स्कूल में आई तो वह सबकी बच्ची बनी रही। सब उसे कहानियाँ सुना रहे होते। बच्चों को दूसरे बच्चों से सीखना बहुत अच्छा लगता है। इन बच्चों से वयस्क भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। हन्ना ग्रीनवर्ग को शेराॅन ने ही पेड़ पर चढ़ना सिखाया। बीचों-बीच स्थित इस बड़े पेड़ पर स्कूल के लगभग सभी बच्चे चढ़े। पहली बार जब बारह वर्ष का एक बच्चा जब बीच वृक्ष पर चढ़ा तो सबके दिल थम गए। सत्तर फुट ऊँचे पेड़ पर पत्तियों के झुरमुट में वह मुश्किल से दिखाई दे रहा था। लेकिन पूरे आत्मविश्वास से चिल्ला रहा था। इस घटना के बाद परिसर के खतरों पर चर्चा शुरू हो गयी। परन्तु बच्चे अलग ही नए खतरों से खेलते मिलते। एक दिन सडवरी वैली के दो आठ वर्षीय बच्चे मील भर दूर सड़क पर घूमते मिल गए। अन्त में सडवरी वैली स्कूल ने सारे ताला-चाबी फेंक दी। स्कूल का परिसर सचमुच खुला परिसर हो गया। खतरे कई थे। बच्चे नदी के किनारे फिसल सकते थे। किनारों के गड्ढों में गले-गले तक डूब सकते थे। ढलानों में पैर मुड़ सकते थे। परन्तु स्कूल का यह केन्द्रीय विचार यह था कि बच्चे समझदार निर्णय लेना तब सीखते हैं जब उन्हें अपने जीवन की समस्याओं से जूझना-निपटना पड़ता है। फिर यह जेल नहीं आजाद स्कूल भी था। तालाब के किनारे के खतरों में जहाँ गलतियों से सीखने का मौका नहीं मिलता वहाँ सभा में पर्याप्त बहस के बाद पाबन्दी लगा दी गयी। सभी ने इसका पालन किया।

खेल स्कूल का अहम हिस्सा थे और सीखने के अहम घटकों में से एक। इससे जो सीखा जाता है वह है हाथ में उठाए गए काम पर अपनी सीमाओं की उपेक्षा करते हुए एकाग्रता और ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता- कोई थकान नहीं, कोई जल्दबाजी नहीं, किसी गरमागरम विचार को कुछ दूसरा करने की विवशता में बीच में छोड़ देने की दरकार नहीं। यह पाठ आजीवन बना रहा। आम नर्सरी और किंडर गार्डन स्कूलों में उपलब्ध सामान बच्चों के लिए उपलब्ध कराया गया था। परन्तु यहाँ वह अनछुआ ही पड़ा रहा। बच्चे कुर्सी, मेज, अलमारी और अपनी कल्पनाओं से जनित खेल में किसी पेड़ या झाड़ी के किनारे किसी कोने में खेलते देखे गए। सीखते हुए बच्चे प्रायः यह तय कर चुके होते हैं कि उन्हें किस तरह की विशेषज्ञता हासिल करनी है।
स्कूल में सबकी अपनी दराजें होती थीं। अपनी दराज के अलावा किसी भी दराज में झाँकना वर्जित था। किसी भी दराज में ताला नहीं लगा होता था। यदाकदा कोई पकड़ा जाता तो उसे न्यायिक व्यवस्था के सामने पेश किया जाता। व्यक्तिगत दराज की निजता का सम्मान और विश्वास की ऐसी आदत पड़ गयी कि कभी कोई किसी के सामान की ओर देखता न था। पर्स, चेन और मंहगी वस्तुएं ऐसी ही पड़ी रहती कभी किसी का कोई सामान नहीं खोया। स्कूल में फैली यह सार्वजनिक निष्ठाप्रणाली विश्वास और व्यक्तिगत आत्मसम्मान के उस वातावरण को कायम रखती जो स्कूल में चारों ओर व्याप्त था। स्कूल में कोई नौकरशाही नहीं थी। स्कूल के रोजमर्रा के प्रशासन की बारीकियों को स्कूल बैठक उन लोगों को सौंप देती जो क्लर्क कहलाते और कभी-कभार यह काम समितियों को सौंप दिया जाता। इस काम को करने वाले लोग प्रायः स्कूल के ही छात्र-शिक्षकों में से कोई होते। स्कूल के परिसर, मैदान, भवन व फाइलों को रख-रखाव इसी प्रकार मिलजुलकर संभसव हो पाता था।

सडवरी वैली में बच्चों के मूल्यांकन करने के कोई निर्धारित मानक नहीं होते थे। स्कूल के लिए अपने सीखे हुए की अपने मानकों से तुलना करना बच्चे की निजता और आत्मनिर्धारण के मानक का उल्लंघन करने जैसा है। जिसने जितना सीखना उचित समझा सीखा जब उसे लगा कि अब उसे यहाँ से आगे सीखने के लिए स्कूल छोड़ना होगा, स्कूल छोड़ दिया। मूल्यांकन करते हुए वे न्यायाधीश नहीं बनते। कई बार उच्च शिक्षा में प्रवेश या नौकरी के आवेदन के लिए ऐसे किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता पड़ी तो सडवरी वैली की तरफ से अपने स्कूल की नीति स्पष्ट करते हुए एक पत्र जारी कर दिया गया और प्रायः छात्र को अपना पक्ष रखने की अनुमति दे दी जाती। मूल्यांकन और परीक्षा से मुक्त अधिगम का शायद यह भी असर था कि सडवरी वैली में सब एक-दूसरे की मदद करते थे। ऐसा न करने की उनके पास कोई वजह ही नहीं थी।
बाहर की दुनिया में बच्चे दो तरह के होते थे। एक ‘अच्छे बच्चे‘ और दूसरे ‘बिगड़ैल बच्चे‘। इस स्कूल में भी इन दोनों तरह के बच्चों का आगमन हुआ। पहली तरह के बच्चों को यहाँ अधिक परेशानी हुई। उन्हें अपने शिक्षकों और माता-पिता को खुश करने की आदत पड़ चुकी थी। यहाँ ऐसा कोई नहीं था जिसे खुश करने के लिए काम किया जाय? वे तय ही नहीं कर पाए कि उन्हें क्या करना चाहिए। यहाँ स्टाफ या शिक्षक कोई सपने-सितारे नहीं बाँटता। यह खुद ही तय करना पड़ता है। ऐसे बच्चों को भी उपचार की जरूरत पड़ती है और उपचार में वक्त लगता है। जो हमेशा सफल नहीं भी हो सकता। जो विनाश नहीं कर सकते वे निर्माण करना भी नहीं जान सकते। ऐसे बच्चों को सडवरी वैली जैसी जगह पर वक्त बिताने पर ही चीजें समझ में आ सकती हैं। यह तालमेल एक कष्टदायक काम हो सकता है। ये बच्चे शैतानी करने वाले नहीं, वास्तव में समाज के वास्तविक पीड़ित हैं। सडवरी वैली स्कूल में समाज के बिगड़ैल यानि शरारती बच्चों ने हमेशा अच्छा प्रदर्शन किया। इसका काफी आसान कारण समझ में आता है- ये तथाकथित बिगड़ैल इस बात के संकेत हैं कि समाज द्वारा उन्हें अपने समाज में ढाल देने, उन्हें तोड़ देने की तमाम कोशिशों के खिलाफ इन बच्चों का संघर्ष जारी है। उनका विद्रोह उन्हें आत्मविनाश की ओर ले जा सकता है किन्तु जैसे ही उन्हें इस दमन से मुक्ति मिलती है तो बाह्य जगत के खिलाफ लड़ने में लग रही उनकी ऊर्जा का उपयोग उनकी आन्तरिक संसाधनों और कौशलों के विकास में किया जा सकंता है।

सडवरी वैली स्कूल के स्टाफ के अपने बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते थे। किसी विरले के ही बच्चे स्कूल से बाहर पढ़ते थे। स्कूल में आने वाले बच्चों के अभिभावक सडवरी वैली स्कूल के स्टाफ में शामिल होने के लिए चुनाव लड़ते थे। स्कूल की न्याय व्यवस्था अत्यन्त विश्वसनीय थी। प्रत्येक बच्चे और स्टाफ के लिए वह समान और पारदर्शाी थी। न्याय समिति शिकायत से जुड़े प्रत्येक तथ्य की जांच करती थी। न्याय संबधी किसी भी निर्णय की आलोचना करता कोई नहीं दिखता था। डेनियल ग्रीनवर्ग अपनी किताब में बताते हैं कि बीस सालों में अनुशासन संबधी मामलों में सिर्फ एक बच्चे को स्कूल से निकाला गया। ये तथ्य न्याय व्यवस्था की सफलता को दर्शाते हैं। इसी किताब के अध्ययन के बाद सडवरी वैली स्कूल की इस तस्वीर को साभार प्रस्तुत किया गया है। पिछली शदी के इस महत्वपूर्ण प्रयोगधर्मी और नवाचारी स्कूल के बारे में सम्पूर्ण जानकारी के लिए एकलव्य प्रकाशन की किताब ‘हम आजाद हैं‘ पढ़ी जा सकती है।

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