रिस्पना नदी की खोज में


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जगदम्बा प्रसाद मैठाणी
February 10, 2018

शिव मंदिर में असामान्य रूप से अलग प्रकार के पत्थरों से बना शिवलिंग रखा गया है। हास्यास्पद तो ये लगा कि  इसके ठीक ऊपर चट्टानों का सीना फोड़कर बाहर आती साफ पानी की तीव्र जलधारा को तार और सरिया से बांध कर स्टील के सिंक के सहारे प्लास्टिक के पाईप से शिवलिंग पर गिराया जा रहा है। यहाँ भी धार्मिक मंदिरों के नाम पर जमीन कब्जाने और उसे श्रद्धा का लबादा ओढ़ाया जा रहा है।

ये जनवरी की बेहद सर्द सुबह है. कल रात सोने से पहले मिशन रिस्पना के व्हाट्सएप ग्रुप पर एक मैसेज आता है कि कल सुबह यानी 3 जनवरी 2018 को प्रातः पौने छः बजे मसूरी डाइवर्जन पर इकट्ठा होना है। बहुत ज्यादा तैयारी नहीं थी। लेकिन मैड के साथियों ने इस बार रिस्पना नदी की प्रमुख सहायक नदी, जो मसूरी से आती है को एक्सप्लोर करने के लिए मासी फाल से ऊपर जहाँ तक संभव हो यानी वुडस्टॉक स्कूल के घने बांज, बुरांस, के जंगल के पास तक जाने का निर्णय लिया था। मैं भी इसी उत्साह हो मन में रखते हुए आखिरकार अचानक प्लानिंग कर रात को अपना बैग पैक कर लेता हूँ। कैमरे की बैटरी, ग्लव्स, पैन, डायरी, एक एक्सट्रा लोअर अपने कैमरा बैग में फिट कर सो जाता हूँ। सोने से पहले सोच रहा हूँ कि जून 2016 के बाद संभवतः यह एक टफ ट्रैक होगा, क्योंकि मुझे बताया गया कि रिस्पना की प्रमुख जलधारायें वुडस्टाक स्कूल के सघन बांज जंगलों से पानी समेटते हुए नीचे आती है। अनीता को अलार्म लगा देने की गुजारिश के साथ न जाने कब सो गया।

सुबह चाय की दस्तक के साथ थोड़ी देर बाद तैयार होकर निकलता हूँ। कैमरा बैग के पीछे नी-कैप, कुछ दवाईयां, पानी की बोतल लेकर घर से निकला हूँ। कॉलोनी की पीली नियोन लाईट कोहरे की धुंध में हल्की हो गयी है। गढ़ी कैन्ट से राजपुर रोड तक लोग अलग-अलग दिशाओं में जॉगिंग, मॉर्निंग वाक कर रहे हैं। अचानक एक्टिव में तेल के मीटर की सुई पर ध्यान जाता है। ओह! तेल तो कम है. पर मुझे ध्यान था कि मैं मसूरी तो पहुँच ही जाऊँगा। बार-बार सोच रहा हूँ मिलने का समय 5.45 का दे रखा है, सब लोग पहुँच गए होंगे। कहीं वो लोग सीधे आगे न चले जाएं। जाखन में पहुँचते ही देखता हूँ कि दाहिने हाथ पर पेट्रोल पम्प चालू है। दो सौ रुपये का पेट्रोल भरवा कर बिल लेता हूँ और मसूरी डाइवर्जन पर 1-2 साल पहले बनी विशालकाय पैसिफिक हिल्स के मार्केट के आगे खड़ा हो गया हूँ। अंधेरा अभी घटाटोप है। आते-जाते वाहनों की लाईट में सुबह का कोहरा भाप सा बनकर उड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। पांच मिनट रूकने के बाद मैड के अभिजय को फोन करता हूँ. पता चलता है कि वे अभी तक आए ही नहीं। पौने सात बजे मैंने पेट्रोल पम्प पर तेल भरवाया जिसका प्रमाण बिल की पर्ची है। आजकल ये अच्छा है पेट्रोल पम्प के बिल कम्प्यूटराईज्ड होने की वजह से समय भी दर्ज कर लेता है। 10 मिनट के बाद दो मोटरसाईकिल पर मैड के 4 युवा साथी अभिजय नेगी, शार्दुल असवाल, हृदयेश शाही और विजय प्रताप सिंह पहुँचते हैं। वे जोर से चिल्लाकर कहते हैं कि सामने देखो कॉफ़ी की दुकान खुल गयी है। मैंने उन्हें बताया ये अभी 5 मिनट पहले खुली है। इसका मतलब कॉफ़ी  काफी देर में मिलेगी। तो समय बर्बाद न किया जाए।

इन चारों साथियों को देखकर लग रहा है, ये अजीब पागलपन है। मैं पूरी तरह ग्लव्स, इनर, जैकेट, मफलर, टोपी, हैलमेट पहन के आया हूँ। और एक ये हैं कि मुंह पर रूमाल बांधा है, हाथ में ग्लव्स नहीं, लोअर के नीचे शायद थर्मल भी नहीं। सोच रहा हूँ पुराने दिनों के बारे में जब हम भी ऐसे बिना किसी अच्छी तैयारी के कहीं भी घूमने ट्रैकिंग या मेले-त्यौहारों में चल देते थे। अंधेरा धीरे-धीरे छंट रहा है। रास्ते भर सड़क के किनारे ढाबे, मैगी पॉइंट्स ठंड में सिकुड़े हुए और बंद हैं। मसूरी की सर्पीली सड़कों से देहरादून अभी साफ नहीं दिखाई दे रहा है। आसमान में चाँद चमक रहा है। पूरब की तरफ से कुछ उजाला घाटी में फैलने को बेताब है। पानीवाला मोड़ से आगे मसूरी झील, चुंगी और चूना खान पर हम दायीं ओर झड़ीपानी वाली सड़क पर निकल जाते है। यहाँ पहुँचने तक अंधेरा छंटने लगा है झड़ीपानी में कमल कॉटेज से आगे बढ़ते हैं। रास्ता पतला हो गया है। बार्लोगंज में पहुँचते ही विजय प्रताप, जो टीम को लीड कर रहे हैं, कहते हैं सामने सीधी चढ़ाई वाली सीमेन्ट रोड पर जाना है। मुझे तो लगा यहाँ एक्टिवा चढ़ ही नहीं सकती। एक-दो तीखे मोड़ों के बाद आखिर बात सच हो गयी। मोटरसाईकिल आसानी से आगे बढ़ चुकी है। जब एक्टिवा रूक ही गयी तो मैं उतर कर एक्टिवा को तीव्र चढ़ाई पर दौड़ाने लगा। देखा सामने से शार्दुल असवाल मुझे लेने वापस पीछे आ रहा है। उन्हें पहले से शायद पता था यहाँ एक्टिवा नहीं चढ़ सकती। वाईनबर्ग एलन स्कूल स्टेट से पहले सेंट जेओर्जेस, जे पी होटल और जास डी रिसोर्ट (जहाँ मैं और अनीता 2003 में शादी के बाद दो दिन रूके थे) से आगे बढ़ते हुए सड़क के उस पार अचानक देखते हैं. शानदार सूर्योदय हो रहा है। यहाँ हम कुछ देर रूकते हैं. उजाला हो गया है। पर सड़कों पर चहल-पहल अभी भी कम है। अब अचानक टीम और पतली सीमेन्ट की सड़क पर जो सड़क कम पगडंडी ज्यादा दिखाई देती है पर मौसी फॉल जाने के रास्ते में आगे ढाल पर अपनी-अपनी गाड़ियां खड़ी कर देते हैं। यहाँ से सीधे डेढ़ किमी की ढलान उतरने के बाद फॉल पहुँचा जा सकता है। इस ढलान पर उतरना बहुत मुश्किल सा लग रहा है, क्योंकि देहरादून से यहाँ आने तक शायद घुटने अकड़ गये हैं। रास्ते में आते एक ग्रामीण से मासी नदी के पार पूरब में बसे गाँव का नाम पता चला कि वो खेतवाल गाँव है।

खेतवाल गाँव की ये तेज ढलान वाली सीमेन्ट की सड़क पर उतरते ही मन में सोचा इस तीखी ढलान पर पहाड़ी काट-काट कर सरिया और सीमेन्ट के पिल्लरों पर घर टिकाए गये हैं। बार्लोगंज के आस पास का पूरा एरिया बहुत घनी बसासत वाला है। लेकिन घरों की नेम प्लेट पढ़ने पर अजीब-अजीब से नाम और एस्टेट जान पड़ते हैं। इस सीधी ढाल वाली सड़क पर नीचे जाकर देखता हूँ रिस्पना की सहायक इस नदी जिसको मासी कह रहे हैं के दाहिने तट पर कारें खड़ी हैं। इतनी ढाल वाली सड़कें जो मैंने पहली बार देखीं मैं सोचता रहा इन सड़कों पर पूरा सीमेन्ट लगाने पर तो ये सड़कें बरसात और बर्फबारी के दौरान तो स्कींइग स्लोप जैसे बन जाती होंगी। बुजुर्ग और बच्चों के लिए इन सड़कों पर चलना बेहद चुनौतीपूर्ण रहता होगा। अब सड़क काफी पतली हो गयी है। मेरे दाहिनी ओर से एक पुल खेतवाल गाँव जाने के लिए बना है। और ठीक बांयी ओर मुझे पीले फूल वाली रात की रानी जैसे पत्तों वाली झाड़ियां खूब उगी है। यहाँ भी लैन्टाना, यूपेटोरयम फैला हुआ है हालांकि गाजर घास बिल्कुल नहीं दिखाई दी। झाड़ियों में रेड वेन्टेड बुलबुल, येलो वेन्टेड बुलबुल और कॉमन मैना, स्पॉटेड डव (घुघुति), इंडियन ग्रे हार्नबिल चिड़िया माॅसी फाॅल तक पहुँचने पर ही दिखाई दे गयी थी। यानि ये इस बात का प्रमाण था कि इस घाटी में हिमालयी क्षेत्रों के काफी पक्षी वास करते होंगे। ये सब देखते हुए अब हम माॅसी फाॅल पहुँच गये हैं। नदी में काफी पानी है जो बिल्कुल साफ दिख रहा है। हमारा मुंह लाल टिब्बा की ओर है। दाहिनी ओर सामने शिवालय बना हुआ है। उसके बगल में टिन के छत वाली सफेद लम्बी सी कुटिया है। कुटिया के बगल से एक जलधारा आ रही है जिसमें 12 से 14 इंच पानी होगा। उस पानी से भाप उठ रही है। इस नदी के बायीं ओर यानी पूरब की दिशा में शिव भक्तों ने या आधुनिक पुजारियों ने शिव मंदिर का निर्माण किया हुआ है। मंदिर के आगे से पत्थरों से बने हुए लगभग 2-2 फीट के मोटे तीन पिल्लर खड़े हैं जिनके ऊपर से लगभग 5 इंच मोटे पाईपों की बनी पानी की सप्लाई नीचे को जा रही है। इन पाईपों पर 1986 लिखा हुआ है। जिससे यह जान पड़ता है कि इन पाईपों का निर्माण 1986 में हुआ होगा। लेकिन ये पेयजल लाईन बनी कब होगी, इसके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं हो पायी। शिव मंदिर में या बगल की कुटिया में कोई नहीं दिखा। शिव मंदिर में असामान्य रूप से अलग प्रकार के पत्थरों से बना शिवलिंग रखा गया है। हास्यास्पद तो ये लगा कि  इसके ठीक ऊपर चट्टानों का सीना फोड़कर बाहर आती साफ पानी की तीव्र जलधारा को तार और सरिया से बांध कर स्टील के सिंक के सहारे प्लास्टिक के पाईप से शिवलिंग पर गिराया जा रहा है। यहाँ भी धार्मिक मंदिरों के नाम पर जमीन कब्जाने और उसे श्रद्धा का लबादा ओढ़ाया जा रहा है। नदी में उतरकर देखते हैं, रेत बजरी के लिए मुख्य धारा पर बनाये गये सीमेन्ट के चैकडैम के बीच खनन जारी है और बजरी-रोड़ी इकट्ठी की गयी है। यहाँ से भी शायद आसपास के निर्माण कार्यों के लिए रेत बजरी खोदी या निकाली जाती होगी। माॅसी फाॅल के इस दृश्य को देखकर मन में बहुत उदासी हुई. धारा के ऊपर की ओर जहाँ से वो बहकर आ रही है, शायद 15-16 फीट का एक झरना होगा, जिसमें दाहिनी ओर का मुख्य झरना सूखा हुआ था। पानी का स्तर काफी कम है। यहाँ पहले बरसात में आ चुके विजय प्रताप के पुराने फोटो की तुलना में आज का दृश्य बिल्कुल अलग और बेकार सा लगा। लेकिन क्योंकि हम घर से इन नदियों की थाह या जानकारी लेने आए थे और हमको अभी काफी आगे तक जाना था।

अभी धूप का कहीं नामोनिशान नहीं है। यह जगह लगभग 1200 मीटर के आसपास की ऊँचाई पर होगी। लेकिन यहाँ मुझे बांज के पेड़, जलधारा के साथ शैवाल, इक्विसीटम, श्यांरू, औंस घास, लैन्टाना, किंगोड़, हिंसोल और कुछ ऐसे पेड़-पौधे भी थे जिनके मुझे नाम पता नहीं हैं। हम नदी की जलधारा के दाहिनी तट पर ऊपर को बढ़ रहे हैं। नदी हमारे साथ-साथ बाई ओर से देहरादून की ओर बिना शोर मचाए चली जा रही है। लगभग 3-4 सौ मीटर जाने के बाद अचानक जंगल में एक पगडंडी सी उभर गयी है। आगे हमारी बायीं ओर देखते हैं. हरे रंग से पुता एक बड़ा आलीशान सा लोहे का गेट दिखाई दे रहा है। इसके पीछे बायीं ओर 6-7 फीट चौड़ी  एक सड़क ऊपर को निकल गयी है। हमने सोचा ये वन विभाग द्वारा बनाया गया होगा। लेकिन इसके बारे में आपको आगे बतायेंगे। नदी में रास्ता स्पष्ट नहीं है। एक जगह इस बड़ी जलधारा को पार करते हैं तो देखते हैं सारी नदी में प्लास्टिक, पॉलिथीन, मिनरल वाटर की बोतलें, थेर्मोकोल, पूजा सामग्री नदी में बहकर आयी है और ये सारा कूड़ा कचरा पुरानी टहनियों, झााड़ियों की जड़ों में अटकी हुई है। यहाँ यह कहना अनुचित नहीं होगा कि ये नदी यहाँ भी मर रही है। जहाँ ऊपर हमने एक्टिवा और मोटरसाईकिल खड़ी की है, वहाँ से उतरते वक्त मुझे बताया गया है जिसका हमारे ग्रुप में किसी को नाम पता नहीं था, इसकी नदी ही माॅसी है। मैंने यह अनुमान लगा लिया था कि इस गदेरे या नदी की पूर्वी दिशा मे छोटी छोटी पहाड़ियां हैं। और एक लम्बा विस्तार घने हरे जंगल का है जो ऊपर टाॅप में शायद टी0वी0 टावर तक जा रहा है। इसका आशय यह है कि नदी में जाते वक्त हमको ऊपर चढ़ते समय अपने दायीं ओर लेकिन नदी के बायीं ओर चलना है। यही बात मन में सोचकर हम नदी में घुस गये।

यहाँ जहाँ नदी का पानी बेहद साफ है लेकिन नदी ने अपने बरसाती बहाव के समय जलधारा में छोटी-छोटी गहरी खाल यानि तलाइयां बना दी हैं, वहाँ लकड़ी के टुकड़े और थर्माकोल जो घूम घूम कर काले पड़ गये हैं; भरे हुए हैं। पूजा की मौली के धागे, पैकिंग के प्लास्टिक यहाँ बहुतायत हैं। अभी हम आपस में बात कर रहे थे और फोटाग्राफी में व्यस्त थे कि तभी एक ग्रामीण ऊपर से आते हुए दिखाई देते हैं। उसने नदी पार की है, हमने उसे ऊपर की तरफ जाने का रास्ता पूछा। उसने कहा कि- ये रास्ता सीधा जा रहा है.  नदी के साथ-साथ ही जाना ज्यादा इधर-उधर मत जाना। ऊपर आगे पानी के टैंक हैं और श्मशान घाट भी है। 7-8 किमी0 चलोगे तो मसूरी आ जाएगा। उससे विदा लेकर हम नदी के दायीं ओर से आगे बढ़ने लग गये हैं। घनी घाड़ियों के बाद अचानक फिर तकरीबन डेढ सौ मीटर तक पगडंडी दिखाई दे रही है जिसके किनारों पर सफेद कटे हुए पत्थर और बीच-बीच में एक निश्चित दूरी पर सीमेन्ट के पाईप दिखाई दे रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे कोई पुराना ट्रैकिंग रूट हो। अचानक वो पगडंडी गायब हो जाती है। झाड़ियों के बीच से घुसते हुए हम देखते हैं कि नदी के पार जी0आई0 पाईप लाईन नदी के साथ-साथ चल रही है। मेरे साथ जो साथी हैं उन्होंने अपने मोटरसाईकिल के हैल्मेट भी साथ लिए हुए हैं जिससे उनके हाथ खाली नहीं है।

झाड़ियों में चलते वक्त परेशानी हो रही है। मैं ट्रैकिंग शूज़ पहन कर गया था। अचानक एक जगह हमको तीव्र ढाल पर उतरना होता है। यहीं पर मैंने पहली रिंगाल की झाड़ी देखी। ढाल से फिसलते हुए नीचे उतर जाते हैं। सामने देखते हैं। नदी के दायीं ओर एक बड़ा पानी का टैंक बना है जिसमें 5 अलग-अलग जगहों से पानी के पाईपों को जोड़कर पानी भरने की व्यवस्था की गयी है। लेकिन आजकल 3 छोटे जलस्रोत, जहाँ से टैंक तक की लाईन जोड़ी गयी है सूखे हुए हैं। लेकिन नदी से जोड़े गये दो बड़े पाईप उस टैंक में पानी भर रहे हैं। ये शायद इस नदी पर बना हुआ पहला वाटर स्टोरेज टैंक है। इसी से निकली हुई पाईप लाईन माॅसी फाॅल में शिव मंदिर के आगे से गुजर रही है, ऐसा मुझे लगता है। इस बड़े टैंक के साथ एक-दो और छोटे वाटर स्टोरेज चैम्बर बने हैं। इससे आगे बढ़ते हुए हमने देखा कि इस नदी में छोटी-छोटी जलधारायें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर आकर इसमें मिल रही हैं। नदी के दोनों ओर बहुत ही घने जंगल है, जहाँ सूरज की किरणें जमीन तक नहीं पहुँच पा रही हैं। पानी यहाँ भी बिल्कुल साफ है। माॅसी फाॅल से ऊपर जो ग्रामीण हमें मिले थे उन्होंने बताया था कि; जब आप ऊपर जाओगे तो आपको आगे कुछ स्कूलों के वाटर पम्प स्टेशन दिखाई देंगे। जहाँ उनके स्टाफ भी रहते हैं। अभी हम आधा किमी0 आगे आ गये हैं। यहाँ मुझे किंगोड़ की पत्तियों जैसा लेकिन सीधी टहनी वाला जिस टहनी पर कांटे नहीं है, एक नया पौधा दिखाई दिया। साथ ही गहरी हरे रंग की चैड़ी लम्बी पत्ती वाले पेड़ बहुतायत में है। इन पर गुच्छों में काले फल लगे हैं। हमसे थोड़ी दूरी पर नीचे जो जलधारा बह रही है, उसमें प्लास्टिक का कचरा मौजूद है। नदी की जलधारा के बायीं ओर कुछ-कुछ दूरी पर सीमेन्ट के लगभग एक मीटर ऊँचे और ढाई फीट चैड़े बाउण्ड्री पिल्लर लगे हैं जिन पर डबल्यू.एस. लिखा है। मैंने अपने साथियों को बताया कि शायद ये वन विभाग या वाटरशैड वालों के हैं। कहीं -कहीं पर हम झाड़ियों और चट्टानों को पकड़ते हुए रास्ता तय कर रहे हैं। नदी को दो-तीन बार आर-पार करना पड़ता है। पानी इतना ज्यादा नहीं कि जूते गीले हो जायें। क्योंकि आप पत्थरों में कूदते-फांदते नदी को आर पार कर सकते हैं।

अचानक हमें ऐसा लगता है कि गाड़ी की जैसी आवाज आ रही है। नदी के पानी को जहाँ हम सबने अभिजय के कहने पर छुआ तो पाया कि इस पानी में कुछ चिकनाई सी है। ऐसा लग रहा था जैसे कि पानी में तेल जैसा कुछ हो। आगे हमें अचानक टिन शैड दिखाई देते हैं, जो कि नदी के दायीं ओर बड़े बड़े पुश्तों पर टिकाकर बनाये गये है। इससे पहले जंगल में पतली पाईप लाईन के साथ हमें बिजली की (ह्वेल्स कम्पनी) मोटी केबल दिखाई दी। तो हमने सोचा जल संस्थान वाले जो टैंक बना रहे हैं उनकी मशीनों को चलाने के लिए बिजली की ये लाईन लायी गयी होगी। पूरी घाटी में कहीं भी बिजली के पोल हमें नहीं दिखाई दिए। ये बाद में पता चला कि एक प्राइवेट स्कूल के वाटर पम्प सिस्टम की मोटरों को चलाने के लिए ये बिजली की केबल जंगल में नदी के साथ-साथ डाली गयी है। हम आगे देखते हैं एक विशाल वाटर पम्प स्टेशन बना है जिसमें दो दर्जन से अधिक पाईपों का जाल बिछा है। यहाँ रहने वाले मजदूरों से और स्कूल के कर्मचारियों से पता चला कि ये लगभग सौ साल से भी ज्यादा पुराना वाटर पम्प स्टेशन है जो नदी से स्कूल के लिए पानी की सप्लाई के लिए बनाया गया है। इसी की मोटरों की आवाज को हमने गाड़ी की आवाज समझ लिया था। इस घनघोर जंगल में ये लोग बरसात में कैसे रहते होंगे यह सोचकर अजीब सा एहसास हो रहा था। इनके टीम लीडर ने बताया कि आगे आपको नदी के दायीं ओर ही चलते जाना है। एक डेढ़ किमी0 ऊपर आपको एक और स्कूल का वाटर पम्प मिलेगा. उसी से आगे नदी के दायीं ओर मसूरी के लोगों का श्मशान घाट भी है। वहाँ से आगे आप लोगों को बहुत ही खतरनाक रास्ता तय करना होगा। और हो सकता है आपको वापस आना पड़े।
इस वाटर टैंक के थोड़ा आगे मैंने देखा पूरब की दिशा से एक छोटी जलधारा आ रही है. मैं और हृदयेश शाही इस जलधारा में जाते हैं तो देखते हैं 60-70 मीटर के बाद आगे पानी नहीं है। यहाँ पर भी सीमेन्ट का एक छोटा चैम्बर बना है जिसके आउटलेट पर लगभग 3 फीट का मोटा प्लास्टिक के पाईप का टुकड़ा लगाया गया है। उसमें लगभग ढाई तीन इंच पानी होगा। लेकिन वो पानी वापस मुख्य जलधारा में जा रहा है। वाटर पम्प को देखने के बाद हम आगे बढ़ते है। शायद अब तक हम 6-7 किमी0 की चढ़ाई नदी के साथ-साथ चढ़ चुके हैं। अब नदी के बायीं ओर और हमारे दाहिनी ओर कंटीले तारों की बाड़ तथा डबल्यू.एस. लिखे सीमेन्ट के बाउण्ड्री पिल्लर लगातार दिखाई देने लगते हैं।

कंटीले तार की बाड़ कहीं-कहीं नदी के बहाव से पिल्लरों के टूट जाने से नदी में गिर गयी हैं। जिन पर बहुत सारे कपड़े, प्लास्टिक, पॉलिथीन अटका हुआ है। ऐसा लग रहा था मानो कंटीले तारों पर कपड़े सुखाने डाले गए हों। अब हमें बहुतायत में रिंगाल, काफल, बांज, बुरांस नीचे घाटी में काफी विशाल फर्न (लेंगुड़ा) कुछ जगहों पर किंगोड़, हिसोल की झाड़ियां भी काफी उगी थी। हैरानी की बात यह थी कि ऊपर मसूरी के कचरे में आए टमाटर नदी की धारा के बीच के खाली स्थानों में अब पानी कम होने की वजह से पौध के रूप में जमे हुए थे। हमारे दाहिनी ओर से एक और जलधारा इसमें मिल रही है। यहाँ हम निर्णय लेते हैं कि हमें अपने दायीं ओर चलना होगा !

पीछे जो वाटर पम्प मिला था उससे थोड़ा आगे एक बड़ी जल धारा का बहाव क्षेत्र हमें दिखा था, जिसमें आजकल बिल्कुल पानी नहीं है। लेकिन हमें यहाँ तक छोड़ने आए व्यक्ति ने बताया कि बरसात में इसमें बहुत पानी रहता है, इसलिए ये पक्की पुलिया बनायी गयी है। इस घाटी में अभी तक धूप का नामोनिशान नहीं है। सुबह के लगभग 11 बज चुके हैं। हाथ में घड़ी थी नहीं, मोबाइल में टाइम देखा नहीं। ये तो घर पहुँचकर अनुमान से समय लिख रहा हूँ। यहाँ नदी ने अपने दोनों ओर काफी जमीन को काटा हुआ है। कटाव से पेड़ों की जड़ें दिखाई दे रही है। अचानक मुझे लगता है नदी के बहाव की चट्टानें बिल्कुल डार्क काले रंग की है जो कि पट्टियों में आड़ी-तिरछी फैली दिखाई दे रही हैं। ऐसा लग रहा था मानों काले रंग का कच्चा कोयला हो। इन चट्टानों के एक-दो टुकड़े हमने इकट्ठे कर लिये। यहाँ घाटी थोड़ी चैड़ी हो गयी है। अब हल्की गर्मी लगने लगी थी। तकरीबन आधा किमी0 चलने पर नीचे घाटी से देखते हैं हमारे बायीं ओर सीमेन्ट की बड़ी दीवार और एक टिन शेड सा बना है। हृदयेश और शार्दुल सबसे पहले भाग कर ऊपर चढ़ जाते हैं और चिल्लाते हैं- ये श्मशान घाट है, ये श्मशान घाट है। लेकिन अभिजय सीधे जाने से हिचकिचा रहे हैं। अब मैं भी ऊपर पहुँच गया हूँ। तो विजय प्रताप पुणे में अपने बैंक की नौकरी के बारे में बताते हैं। कहते हैं- मैठाणी सर, ऐसी जगह मुझे बहुत पसंद है जहाँ शांति हो। जब मैं पुणे में नौकरी करता था, प्राइवेट बैंक साल के आखिरी में टारगेट पूरा करने के लिए बहुत अधिक प्रेशर डाल देते हैं तो उनसे मुक्ति पाने के लिए मैं पुणे में भी ऐसी जगहों पर बिना डरे चले जाता था। यहाँ काफी झाड़ियाँ उगी हुई हैं। मनुष्य के पंचतत्व में विलीन होने का प्रमाण देती राख मौजूद है लेकिन आसपास लकड़ियां दिखाई नहीं दी। अभिजय कह रहा है हड्डियां दिखाई दे रही है। मैं शार्दुल को वहाँ जाने से रोकता हूँ और कहता हूँ ऐसे स्थानों पर शांति रखनी चाहिए। नीचे नदी में काफी मात्रा में कपड़े फेंके गये हैं, शायद यहाँ अंतिम संस्कारों को सम्पन्न करने के बाद कपड़े नदी में फेंक दिए जा रहे हों। लेकिन ये गलत है, इन कपड़ों से भी नदी में प्रदूषण हो रहा है।

पिछले वाटर पम्प से यहाँ तक पहुँचने के बीच कुछ मशरूम जिसे गढ़वाली में च्यूं कहते हैं दिखाई दिए। साथ ही घाटी में जंगल बबलर, रेड वेन्टेड बुलबुल, पैराडाईज फ्लाईकैचर, व्हाइट कैब्ड वाटर रैड स्टार्ट, ओरियन्टल मैग्पाई रोबिन, ब्लू व्हिसलिंग थ्रश पक्षी दिखाई दिये। अभिजय का कहना है जल्दी चलो, जल्दी चलो देर हो जाएगी। उसे 3 बजे देहरादून किसी बैठक में पहुंचना है। हम आगे बढ़ते हैं, यहाँ घाटी काफी पतली हो गयी है। ऊपर दूर आसमान की तरफ मसूरी के पिछले हिस्से में बने मकानों की दीवार दिख रही है। लगभग आधा किमी. चलने पर हमने देखा नदी फिर दो हिस्सों में बंट गयी है। यहाँ थोड़ी देर रूकते हैं, अभिजय एक वीडियो बना रहे हैं और बारी-बारी से सभी साथियों से नदी की सेहत और अनुभव के बारे में अपना इंटरव्यू दे रहे हैं। यही वीडियो उन्होंने फेसबुक पर लाइव किया। सूचना क्रान्ति के इस दौर में कम से कम मोबाइल और विभिन्न प्रकार के नेटवर्क कनैक्शन जो ज्यादातर स्पीड की बात बताते हैं। उनको मन में रखते हुए मैं सोच रहा हूँ इस बीहड़ घाटी में हमारे चलने की स्पीड काफी कम है। यहीं पर टीम यह सोच रही है अब दायें जाया जाए या बाएं जाया जाए। बायीं तरफ जो घाटी है वो चैड़ी जरूर है लेकिन उसमें कचरा ज्यादा है और पानी का स्तर कम है। जो धारा हमारे दाहिनी ओर है उसमें अब कचरा ना के बराबर है लेकिन पानी अधिक है। थोड़ा पीछे की एक बात बताना भूल गया- अभिजय परेशानी में फंस गये हैं, चट्टानों पर कूदते हुए वो डिसफंक्शन ऑफ़ वार्डरोब का शिकार हो गये। उनकी पैंट धोखा दे गयी। शार्दुल, हुदयेश और विजय प्रताप मजे ले रहे हैं। सब थके हुए हैं लेकिन हंस रहे हैं। अब क्या किया जाए। मैंने कहा चिन्ता मत करो मेरे पास कैमरा बैग में एक स्पेयर लोअर है। (आज से पहले मैं कभी भी एक दिन के ट्रैक पर एक्सट्रा लोअर नहीं ले गया था पर ये सोच कर लोअर रख लिया था कि ट्रैक करते हुए अगर गर्मी हुई तो मैं विंड प्रूफ लोअर को चेंज कर लूंगा।) अब वो लोअर अभिजय पहनकर आगे-आगे चल रहे हैं।

चलिए हम कहाँ थे ? संभवतः रिस्पना इन प्रमुख जलधाराओं के पहले संगम पर. यानी अगर हम देखें तो इस जलधारा का यह पहला बड़ा संगम माना जा सकता है। तो उत्तर दिशा की ओर से बहकर आ रही ये जलधारायें यहाँ पर मिल रही हैं। दायीं ओर की जलधारा में अधिक पानी है। हम उसी दिशा में बढ़ चलते हैं। घाटी बहुत संकरी, लगभग 10-12 फीट से भी कम हो गयी है। सौ मीटर जाने के बाद ऐसा लग रहा है जैसे आगे ये गाड़ या नदी संकरी गुफा से निकल रही हो। हमारे दाहिनी ओर पहाड़ी का काफी बड़ा हिस्सा ‘यू’ के आकार में कटा हुआ है। और इसमें यू के आकार की ही पतली घाटी बन गयी है। वो आगे थोड़ा डरावनी सी लग रही थी। नदी के बीच मे खड़े होने पर मैंने आभास किया कि बरसात में यह नदी तकरीबन 20-25 फीट ऊँची लेकिन संकरी घाटी में तेज बहाव लिए बहती होगी. यानी उन दिनों इसका दृश्य बेहद भयावह और खतरनाक होता होगा। मैंने अपने बायें हाथ की तरफ चट्टान पर इस वर्ष की बरसात के पानी के बहाव के निशान देखे तो मुझसे 5-6 गुना ऊँचाई तक बने थे। जबकि जिस संगम को हम पीछे छोड़ आए थे उस घाटी में बहकर आ रही नदी का मार्ग काफी चैड़ा लेकिन बहुत कचरे से भरा हुआ था। यही कारण रहा कि मैंने अपने साथियों से दायें यानी पूरब और ऊपर की दिशा में चढ़ने का सुझाव रखा। अभिजय उस मुख्य धारा में थोड़ी दूर तक गये। जबकि विजय प्रताप और शार्दुल बायें तरफ की घाटी में थोड़ा आगे की तरफ गये। मैं वहीं उस पहले संगम पर फोटाग्राफी करता रहा। विजय शाही पानी में पड़े पत्थरों से खेलने लगा। जब सारी टीम ने आपस में सहमति बना ली कि चलो दायीं पूरब वाली दिशा में चलते है तो हमारे सामने वो यू आकार की घाटी आ गयी, जिसके बारे में मैंने ऊपर बताया है। नदी का मार्ग संकरा और भयावह हो गया था। यह दृश्य देहरादून के गुच्चुपानी की तरह ही लग रहा था। चट्टानों की बनावट मिलती जुलती थी। ये चट्टानें कमेड़े या चूने जैसी लगती हैं। तो सोचा झाड़ियां पकड़कर टीले पर पहुँचकर दूसरी ओर देखें। ठीक टीले पर बांज, बुरांस, अयांर और काफल के पेड़ सीधे आसमान छूने को बढ़े चले जा रहे हों। अब धूप हमें दिखने लगी थी। पेड़ों के बीच से जो भवन पश्चिमी दिशा में ऊपर दिखाई दे रहे थे, बाद में पता चला; वो वाईनबर्ग एलन की स्टेट है। टीले में पीछे की तरफ देखते हैं नदी में पानी गायब है। अभिजय जोर से चिल्लाते हैं बस यहीं से पानी है आगे कुछ नहीं है। शाही कहते हैं अबे ये नदी ढूंढ ही ली हमने आखिर।

पर जमीन पर किसी भी तरह के रास्ते के कोई निशान नहीं है। मसूरी के पिछले हिस्से की सड़क जो सुवाखोली, धनौल्टी की ओर जाती है उसी को ध्यान में रखते हुए मैं सभी को कहता हूँ- हम दायें ओर ऊपर चलेंगे। शाही अभी आगे चल रहे हैं। गहरी हरी पत्तियों वाली देव रिंगाल की झाड़ियां खूब दिखाई देने लगती है। पांव के नीचे की जमीन में जंगल की पत्तियों की खाद पर कदम पड़ते ही गुदगुदाहट का अनुभव होता है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस घाटी में कहीं भी माॅसी फाॅल के बाद अभी तक हमें कोई रूखापन, बड़ा लैंडस्लाइड, जंगल की आग, अवैध कटान हमें दिखाई नहीं दिये। क्या लोग या घसियारियां यहाँ नहीं आती होंगी ? थोड़ा ऊपर चढ़ते ही शार्दुल को एक मरे हुए बंदर की खोपड़ी मिलती है। विजय प्रताप उसे हाथ में लेकर फोटो शूट करवाता है। और मेरा पूरा ध्यान रिंगाल की झाड़ियों पर है। यहाँ पर रिंगाल के पौधों के साथ फोटो सेशन करने के बाद हम आगे चल रहे है। शाही ने कह दिया आगे कोई रास्ता नहीं है। अब साथियों को भूख भी सताने लगी थी। हालांकि विजय प्रताप ने माॅसी फाॅल के पास और इस घाटी में प्राइवेट स्कूल की पानी की सप्लाई के लिए बने वाटर पम्प के आसपास बिस्किट खिलाये थे। पर अब शायद बिना नाश्ते के काफी टाइम हो गया। तीन दिन पहले हनुमान चौक से खरीदा गया खजूर का पैकेट मेरे बैग में था। वो हमने बांटकर खाना शुरू किया। पानी की एक छोटी बोतल सिर्फ मेरे पास थी। थोड़ा-थोड़ा पानी सभी गटकाते हैं।

अब मैं आगे बढ़ गया हूँ और ऊपर जाकर रास्ता ढूंढने की कोशिश कर रहा हूँ। सौ डेढ सौ मीटर जाने पर दाहिनी ओर कुछ ताजी लेकिन पूरी तरह सूखी हुई लकड़ियां रखी हैं जिससे यह लगता है कि यहाँ लोग जलौनी लकडी लेने आते होंगे। लेकिन जमीन पर किसी तरह की पगडंडी के निशान नहीं हैं। एक दो जगह मुझे घुरड़ (बार्किंग डिअर) का गोबर भी दिखा। जिससे मुझे इस जंगल में उनके होने का प्रमाण मिला। अब और ऊपर बढ़ने पर चढ़ाई सीधी खड़ी हो गयी है तो मैंने सभी को कहा जिगजैग चलो सीधे चढाई पर नहीं। तकरीबन दो सौ मीटर ऊपर जाने पर देखता हूँ विजय प्रताप सबसे नीचे छूट गया है। उसने गरम टोपी उतार दी है। यहाँ पर पेड़ों की 2-3 ताजी कटी हुई टहनियां दिखती हैं, यानि हम सही दिशा में जा रहे हैं। क्योंकि यहाँ आसपास से जरूर कोई लकड़ी काटने या घास लेने आता होगा यानी बसकत नजदीक है । ये अब तक इस ट्रेक का सबसे कठिन रास्ता होगा। यहाँ चढते वक्त नंदा देवी राज जात की नकचोढ़ी धार और रूपकुंड से ऊपर ज्युरागली की याद आ गयी.

 

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जगदम्बा प्रसाद मैठाणी

जगदम्बा प्रसाद मैठाणी स्वैच्छिक संस्था 'आगास फाउंडेशन' के निदेशक हैं.