राजनीति के कुशल खिलाड़ी थे नारायण दत्त तिवारी


नैनीताल समाचार
October 19, 2018

 

शिवप्रसाद जोशी

 

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, आंध्रप्रदेश के पूर्व राज्यपाल और पूर्व केंद्रीय वित्त और विदेश मंत्री नारायण दत्त तिवारी नहीं रहे. उन्होंने लंबी बीमारी के बाद 18 अक्टूबर की शाम 93 साल की उम्र में दिल्ली के एक निजी अस्पताल में आखिरी सांस ली. वो लंबे समय से अस्पताल में भर्ती थे {रविवार, 21 अक्टूबर को हल्द्वानी के निकट रानीबाग के चित्रशिला घाट में उनका अंतिम संस्कार होगा. –सम्पादक}.

भारतीय राजनीति के वो संभवतः सबसे वयोवृद्ध और विवादास्पद नेताओं में से थे. दो-दो राज्यों का मुख्यमंत्री पद संभालने के साथ साथ प्रशासन, अर्थनीति, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय राजनीति की गहरी समझ रखने वाले नेताओं में भी वो अग्रणी थे.

हिंदी और अंग्रेज़ी भाषाओं पर उनका कमांड था और बाज़ मौकों पर अपने उर्दू ज्ञान का मुज़ाहिरा भी वो कर देते थे.

इलाहाबाद छात्र संघ के पहले अध्यक्ष से लेकर केंद्र में योजना आयोग के उपाध्यक्ष, उद्योग, वाणिज्य पेट्रोलियम, और वित्त मंत्री के रूप में तिवारी ने काम किया. तिवारी ने 1995 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई. सफल नहीं रहे. दो साल बाद ही लौट आए.

कहा जाता है कि अगर वो उस समय नैनीताल सीट से लोकसभा का चुनाव नहीं हारते तो निश्चित रूप से देश के प्रधानमंत्री होते. उन्हें राष्ट्रपति पद का दावेदार भी माना जाता था.

एनडी तिवारी अपनी सधी हुई और दूर तक मार करने वाली राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा, और अपने रंग-रूप, झूमती हुई अदा, मीठी-सुरीली ज़बान और 50 और 60 के दशकों के हिंदी फ़िल्म नायकों सी कमनीयता से अभिभूत रहने वाली भावना से उद्दीप्त थे.

साब सीएम तो तिवारीजी ही थे”

युवा जीवन से लेकर अधेड़ावस्था और वृद्धावस्था में उनकी कथित ‘आशिकमिज़ाजी’ और उनकी ‘मित्रताओं’ के कई किस्से राजनीतिक गलियारों में उड़ते बिखरते रहे. तिवारी ऐसे क़िस्सों से बेख़बर रहने का नाटक भी बड़ी अदा से करते थे.

इसी निराली अदाकारी का प्रदर्शन वो अक्सर राजनीतिक मामलों में भी करते थे. ख़ासकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्रित्व काल में तो उन्होंने अपनी इस अदा से कई आकांक्षियों की राजनीतिक कामनाओं और उम्मीदों का ध्वंस किया. तो कईयों पर उपकार भी किए.

यह अकारण नहीं है कि उत्तराखंड निर्माण से नाक-भौं सिकोड़ने वाले नेता रह चुके तिवारी, राज्य के सबसे पसंदीदा राजनीतिक व्यक्तित्व माने जाते रहे हैं.

और तो और आज भी अगर आप गांव शहर या गांव- कहीं भी आम लोगों से तिवारी के बारे में उनकी राय पूछें तो वे यही कहते मिलेंगे कि “साब सीएम तो तिवारीजी ही थे, उनके दौर में कराए गए काम भी आज दिख रहे हैं बाकी तो शिलान्यास और लोकार्पण और उद्घाटन ही हैं” और ये भी कि “राजनीतिक विरोधियों से दोस्ती गांठना तो कोई तिवारी से सीखे.” मित्र विपक्ष का निर्माण तिवारी के कार्यकाल की एक अलग ही विशेषता थी.

एनडी तिवारी उत्तराखंड की पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया बनाए गये थे. चुनावी लड़ाई के ‘सेनापति’ तब के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत थे लेकिन जब राज्य का पहला विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने जीता तो कांग्रेस आलाकमान ने रावत को भयंकर हैरान करते हुए तिवारी को दिल्ली से रवाना कर दिया.

तिवारी राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे जिन्होंने पूरे पांच साल सरकार चलाकर दिखा दी. इससे पहले अंतरिम विधानसभा के पौने दो साल की अवधि में बीजेपी के दो मुख्यमंत्री हुए. तिवारी के पांच साल के बाद बीजेपी लौटी तो वहां भी खंडूरी और निशंक के बीच भीषण खींचतान होती रही और कुर्सी पर आवाजाही बनी रही.

उसके बाद कांग्रेस की बारी आई तो बहुगुणा और रावत के बीच सत्ता का खेल चला. बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई. और 2017 के चुनाव में बीजेपी को सत्ता मिली और एक साल से ज़्यादा के शासनकाल में त्रिवेंद्र सिंह रावत तो अब तक अपनी कुर्सी बचाने में सफल रह पाए हैं हालांकि पार्टी में खींचतान की अंडरकरेंट इतिहास दोहराने को बेकरार नज़र आती है.

सबको लेकर चलने वाले तिवारी

तिवारी के लिए बुढ़ापे में उत्तराखंड की कुर्सी किसी सौगात से कम न थी. उत्तर प्रदेश के तीन तीन बार मुख्यमंत्री रहने के बाद और वहां नोएडा जैसे महानगरों के निर्माण में योगदान के बाद मीडिया और अपने प्रशंसकों के बीच विकास पुरुष की छवि हासिल कर चुके थे.

इसी छवि के सहारे उत्तराखंड में वो टिके रहे, लेकिन उनका पांच साल का शासनकाल सबको ख़ुश रखने के लिए ही सबसे ज़्यादा याद किया जाएगा. कहते हैं कि जो तिवारी जी के पास पहुंच जाए और कभी ज़ोर से तो कभी हल्के से भी कुछ मांग ले तो खाली हाथ नहीं लौटता था. उस दौर में खूब लालबत्तियां बांटी गईं. तिवारी को किसी की नाराज़गी की भनक लगने की देर थी, वो पहुंच जाते उसके पास.

तिवारी मीडिया हल्कों में भी लोकप्रिय हो गए. सीधे रिपोर्टर का हाथ पकड़ लेते या कंधे पर हाथ रख देते. होली दिवाली आती तो उमंग में आ जाते. होली में गीत गाते झूमते और दिवाली में भी मौका लगते ही ठुमकने लगते.

तिवारी की यही ‘ठुमक ठुमक’ अदा, शेरो शायरी, कुमाऊंनी लोकगीतों और देशभक्ति के गीतों की झड़ी और मौका लगने पर महात्मा गांधी की याद, और उस याद में भावुकता के आंसू, अचानक भर्रा जाने वाला गला……ये सब चीज़ें तिवारी को एक आकर्षक सेलेब्रिटी बनाती थीं. कई बार लोग असहज हो जाते लेकिन तिवारी अपनी छायावादी और रूमानी थपकी देकर आगे बढ़ जाते.

सियासत के माहिर खिलाड़ी

उत्तराखंड की सियासी धमाचौकड़ी में बूढ़े तिवारी बड़े खिलाड़ी थे. पांच साल में शायद ही कोई दिन ऐसा होगा जब उनपर हमले का कोई सिरा न खुला रहता. लेकिन तिवारी ख़तरा भांपने के माहिर थे, सूंघ लेते और संकट का सिरा बंद कर देते.

उनकी इस चतुराई का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि उत्तराखंड के मशहूर गायक- गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी के गाए एक गीत नौछमी नारैण और इस पर आधारित वीडियो अल्बम भी तिवारी को पांच साल पूरे करने से नहीं रोक पाया.

कहा जाता है कि ये गीत तिवारी की राजनीतिक कार्यशैली और निजी जीवन की विसंगतियों पर एक कटाक्ष था. इस वीडियो गीत में मुख्य किरदार को पीली पोशाक पहने, बंसी थामे, मोर मुकुट बांधे और कुछ रंगबिरंगी पोशाकें पहनीं महिला किरदारों के साथ नाचता गाता दिखाया गया है.

उम्र के अंतिम पड़ाव और तिवारी का कबूलनामा

2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की विदाई हुई और बीजेपी का आगमन. तिवारी नई रमणीयताओं और नये भूगोलों की थाह लेने दिल्ली निकल चले. उन्हें आंध्रप्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया. लेकिन सेक्स स्कैंडल के आरोपों में घिर गए. उनकी वीडियो क्लिपिंग भी आ गई.

तिवारी ने इसे राजनीतिक साज़िश बताते हुए खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर 2009 में राज्यपाल पद से इस्तीफा दे दिया. देहरादून लौट आए.

2008 में उनके खिलाफ एक अदालती मामला सुर्खी बन गया. रोहित शेखर ने कहा कि वो तिवारी के बेटे हैं और वो उनके जैविक पिता हैं. तिवारी अपनी ढली उम्र में भरसक मोहक अदाएं बनाते बनाते पहले तो नानुकुर करते रहे लेकिन रोहित की लड़ाई प्रामाणिक और अकाट्य थी.

डीएनए जांच से रक्त संबंध साबित हो गए. आखिरकार तिवारी को उन्हें अपना बेटा और उनकी मां उज्जवला को अपनी पत्नी का दर्जा देना ही पड़ा. तिवारी परिवार के साथ लखनऊ से नैनीताल आना जाना करते रहे और रोहित शेखर को राजनीतिक विरासत सौंपने का संकल्प लिया.

91 साल की उम्र में नारायण दत्त तिवारी, बेटे का राजनीतिक भविष्य संवारने के लिए ऐसे ठिकाने पहुंचे थे जिसकी कम से कम उन जैसे सेक्युलर और गांधीवादी कहे जाने वाले नेता से अपेक्षा नहीं की जा सकती थी.

जर्जर शरीर और कांपते हाथों के साथ, अपनी पत्नी उज्ज्वला और बेटे रोहित का हाथ थामे तिवारी, जब दिल्ली में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के सामने एक तरह से “पेश” किए गये तो चर्चा तो जो हुई सो हुई, बीजेपी पर भी आरोप लगे कि उसने बूढ़े अशक्त व्यक्ति का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की.

भारतीय राजनीति के कई दौर और कई शेड्स देखने वाले और इनमें से कुछ दौरों के केंद्र में और कुछ शेड्स के निर्माता रह चुके तिवारी के बारे में जानकारों का मानना है कि अगर शारीरिक रूप से इतने अशक्त, लाचार और स्मृतिविहीनता का शिकार न होते तो आज के राजनीतिक हालात पर उनके बयान और मौजूदगी भी ग़ौरतलब होती.

ख़ासकर मीटू अभियान पर एनडी तिवारी क्या कहते, ये सुनना भी कम रोचक न होता.

बीबीसी हिन्दी से साभार (bbc.com)

 

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