प्रधानमंत्री जी, चुनावी मोर्चे पर ‘जनरल’ को मत भेजिए


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जितेन्द्र भट्ट
May 11, 2018

प्रधानमंत्री जी, ध्यान देने की बात है कि फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा चार साल कमांडर-इन-चीफ रहने के बाद 14 जनवरी, 1953 में रिटायर हुए। रिटायर होने के बाद फील्ड मार्शल करिअप्पा ने 1953 से 1956 तक आस्ट्रिया और न्यूजीलैंड में भारत के हाई कमिश्नर के तौर पर काम किया। जाहिर है ये नियुक्ति उस वक्त की नेहरु सरकार ने ही की होगी।

 

आदरणीय प्रधानमंत्री जी को एक चिट्ठी

आदरणीय प्रधानमंत्री जी, ये शब्द लिखते हुए अच्छा नहीं लग रहा। पर कुछ दिन पहले आपने ब्रिटेन में प्रसून जोशी के साथ बातचीत के अंत में वहां मौजूद लोगों से कहा था, मुझसे कोई गलती हो जाए, तो बताते रहिए

मैं इसे अपना फर्ज समझता हूं कि आपको बताया जाए कि आपने चुनावी सभा में हजारों लोगों के सामने अपने भाषण में कुछ गलतियां की हैं। मुझे अच्छा नहीं लगा, जब आपने तीन मई को कर्नाटक की चुनावी सभा में फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा और जनरल के एस थिम्मैया का जिक्र गलत तथ्यों के साथ किया।

प्रधानमंत्री जी, कलबुर्गी की उस रैली में आपने फील्ड मार्शल करिअप्पा और जनरल थिम्मैया के बारे में जो कहा, उसे हुबहू लिख रहा हूं। आपने सेना और देश के जवानों की बात करते हुए कहा, हमारे कर्नाटक में भी इस कांग्रेस पार्टी का सेना के साथ कैसा नाता रहा है, ये हमारे कर्नाटक के भाईयों से ज्यादा कौन जानता है। फील्ड मार्शल करिअप्पा और जनरल थिमैय्या, पूरे विश्व में सेनानायकों के रुप में जिनका नाम था। लेकिन फील्ड मार्शल करिअप्पा हों, जनरल थिम्मैया हों। उनके प्रति कांग्रेस सरकारों का क्या रवैया रहा था, किस प्रकार से उन्हें अपमानित किया गया था। ये इतिहास आपको भली प्रकार बताता है।

आपने सेना की बात की बहुत अच्छा लगा। आपने जवानों की बात की बहुत अच्छा लगा। प्रधानमंत्री जी, आपने देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरु पर फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा का अपमान करने की तोहमत लगाई। तो जरुरी है कि एक नजर फील्ड मार्शल करिअप्पा के करियर पर डाल ली जाए।

प्रधानमंत्री जी, ये जानना जरुरी है कि फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा 1947 में देश के आजाद होने तक ब्रिगेडियर के रैंक पर काम कर रहे थे। 1947 में आजादी के बाद जब नेहरु पहली सरकार के प्रधानमंत्री बने, फील्ड मार्शल करिअप्पा को मेजर जनरल की पोस्ट पर प्रमोट किया गया और उन्हें डिप्टी चीफ आफ द जनरल स्टाफ नियुक्त किया गया। ‍

नवंबर 1947 में फील्ड मार्शल करिअप्पा का प्रमोशन हुआ और वो लेफ्टिनेंट जनरल बनाए गए। उन्हें ईस्टर्न आर्मी कमांडर बनाया गया।

जनवरी 1948 में फील्ड मार्शल करिअप्पा को दिल्ली और ईस्ट पंजाब कमांड का जीओसी-इन-सी नियुक्त किया गया। और फिर जनवरी 1949 में फील्ड मार्शल करिअप्पा को कमांडर-इन-चीफ बनाया गया।

प्रधानमंत्री जी, ध्यान देने की बात है कि फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा चार साल कमांडर-इन-चीफ रहने के बाद 14 जनवरी, 1953 में रिटायर हुए। रिटायर होने के बाद फील्ड मार्शल करिअप्पा ने 1953 से 1956 तक आस्ट्रिया और न्यूजीलैंड में भारत के हाई कमिश्नर के तौर पर काम किया। जाहिर है ये नियुक्ति उस वक्त की नेहरु सरकार ने ही की होगी।

प्रधानमंत्री जी, एक और चौंकाने वाली बात आपको बताऊं। जिस कांग्रेस पर आपने फील्ड मार्शल करिअप्पा का अपमान करने का आरोप लगाया। उसी कांग्रेस की सरकार ने जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे, 28 अप्रैल 1986 को फील्ड मार्शल के रैंक से नवाजा। ये समझना बहुत जरुरी है कि अभी तक देश में सिर्फ दो फील्ड मार्शल हुए हैं, उनमें एक नाम करिअप्पा का भी है।

चौंकाने और सोचने वाली बात है जो कांग्रेस करिअप्पा का ‘अपमान’ करती थी, उसने उन्हें फील्ड मार्शल के रैंक से क्यों नवाजा होगा?

प्रधानमंत्री जी, तीन मई के उस लंबे चुनावी भाषण के दो मिनट से भी कम हिस्से में आपने फील्ड मार्शल करिअप्पा और जनरल थिम्मैया के साथ साथ देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरु और पूर्व रक्षा मंत्री वी के कृष्णा मेनन का नाम भी लिया।

जनरल थिम्मैया की बात करें, इससे पहले मैं आपका ध्यान वी के कृष्णा मेनन की तरफ दिलाना चाहता हूं। वी के कृष्णा मेनन अप्रैल 1957 में रक्षा मंत्री बनाए गए। मतलब कृष्ण मेनन के रक्षा मंत्री बनने से चार साल पहले ही फील्ड मार्शल करिअप्पा रिटायर हो चुके थे। जब कृष्ण मेनन रक्षा मंत्री बने, तब तक फील्ड मार्शल करिअप्पा विदेश में करीब तीन साल हाई कमिश्नर का काम भी खत्म कर चुके थे।

प्रधानमंत्री जी आपने अपनी इसी स्पीच के अगले हिस्से में कहा, “1948 में पाकिस्तान से युद्ध जीता जनरल थिम्मैया के नेतृत्व में। लेकिन उस पराक्रम के बाद कश्मीर को बचाने वाले जनरल थिम्मैया का उस वक्त के प्रधानमंत्री नेहरु और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन ने बार बार अपमान किया था।  और इसी के कारण जनरल थिम्मैया को अपने पद से सम्मान के खातिर इस्तीफा देना पड़ा था। मैं कर्नाटक की नई पीढ़ी को बताना चाहता हूं कि कांग्रेस का रवैया देश के सेना के मुखिया के प्रति रहा है। कर्नाटक के वीर पुत्र के प्रति रहा है। ये बात कर्नाटक के नौजवानों ने भूलनी नहीं चाहिए।

हां ये जरुर है कि 1959 में तब के रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन और जनरल के एस थिम्मैया में कुछ बातों को लेकर मतभेद थे। जिसकी वजह से जनरल थिम्मैया ने सितंबर 1959 में अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री नेहरु को आफर किया। पर नेहरु ने उनका ये इस्तीफा मंजूर नहीं किया। नेहरु ने जनरल थिम्मैया को समझाया, जिसके बाद उन्होंने अपना इस्तीफा वापस ले लिया। जनरल थिम्मैया चार साल आर्मी चीफ के पद पर रहे। सबसे बड़ी बात, उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया।

प्रधानमंत्री जी, आपने एक सांस में जनरल थिम्मैया के अपमान का आरोप नेहरु और कृष्णा मेनन पर लगाया। लेकिन आपने जो बात कही, वो विरोधाभासों से भरी हुई है। आपने कहा कि “1948 में पाकिस्तान से युद्ध जीता जनरल थिम्मैया के नेतृत्व में। लेकिन उस पराक्रम के बाद कश्मीर को बचाने वाले जनरल थिम्मैया का उस वक्त के प्रधानमंत्री नेहरु और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन ने बार बार अपमान किया था। और इसी के कारण जनरल थिम्मैया को अपने पद से सम्मान के खातिर इस्तीफा देना पड़ा था। “

प्रधानमंत्री जी, आपने इस्तीफे पर ज्यादा फोकस किया। आपने अपने सामने मौजूद भीड़ को ये तो बताया कि जनरल थिम्मैया ने इस्तीफा दिया था, पर शायद ये छिपाया कि उनका इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ था। इसे ऐसे समझिए कि इस्तीफा प्रकरण के बाद जनरल थिम्मैया करीब दो साल आर्मी चीफ रहे।

प्रधानमंत्री ने नेहरू पर निशाना साधने के जोश में एक और तथ्यात्मक गलती की। प्रधानमंत्री ने 1948 के पाकिस्तान युद्ध की जीत का श्रेय जनरल थिम्मैया को दिया। जबकि ऐतिहासिक तथ्य अलग हैं। 1948 में थिम्मैया मेजर जनरल की रैंक पर थे, वो डिविजनल कमांडर थे।

ये समझना जरुरी है कि 1948 में जिस वक्त पाकिस्तान से जंग हुई। लेफ्टिनेंट जनरल एस एम श्रीनागेश कोर कमांडर थे,लेफ्टिनेंट जनरल के एम करिअप्पा वेस्टर्न आर्मी कमांडर थे। तब आर्मी चीफ थे, जनरल रॉय बूचर।

जनरल थिम्मैया का नेहरू से अच्छा रिश्ता था। यही वजह है कि उन्हें दो सीनियर अफसरों की वरीयता को दरकिनार करके आर्मी चीफ बनाया गया।

शायद प्रधानमंत्री ये बात जानते होंगे। जिस नेहरु पर उन्होंने जनरल थिम्मैया के अपमान का आरोप लगाया, उसी नेहरु की सरकार ने जनरल थिम्मैया को 1954 में पद्म भूषण से नवाजा।

ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री की बातों में सारे तथ्य गलत थे। कुछ बातें सही हैं। फील्ड मार्शल करिअप्पा और जनरल थिम्मैया दोनों का 1948 के पाकिस्तान युद्ध में भूमिका थी। दोनों महान सेनानायक थे। दोनों देश के ऐसे सपूत हैं, जिन पर हर किसी को गर्व होना चाहिए।

लेकिन प्रधानमंत्री ने चुनावी सभा के मंच से इन दो महान विभूतियों का इस्तेमाल राजनीतिक पैंतरेबाजी के लिए किया। प्रधानमंत्री ने सरकार और अफसर के बीच नीतियों और स्ट्रेटजी को लेकर मत भिन्नता को अपमान से जोड़ा। ये कैसा अपमान है? कांग्रेस की जिस सरकार ने अपमान किया, उसी ने एक को फील्ड मार्शल जैसे सम्मान से नवाजा। और दूसरे को पद्म भूषण सम्मान ‍से।

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जितेन्द्र भट्ट

जितेन्द्र भट्ट ने नैनीताल समाचार से पत्रकारिता शुरू करने के उपरान्त पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की. आजकल एक टीवी न्यूज़ चैनल में काम करते हैं.