पोस्टमार्टम !


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कमल जोशी
March 27, 2018

दोनों पुलिस अधिकारी परस्पर इस बात पर लड़ रहे थे कि क्षेत्र उनका नहीं है। मृतक का शव नदी के जिस किनारे पड़ा था वहां पानी कम था, जिसके आधार पर उस क्षेत्र का पुलिस चौकी इंचार्ज लड़ रहा था कि जब पानी उधर ज्यादा है तो लड़का इधर कैसे डूबा? दूसरे पक्ष का कहना था कि लाश तो नदी के दूसरे किनारे पर है जहां उसकी सरहद खत्म हो जाती है।

इसे घटित हुए नौ महीने बीत चुके हैं, लेकिन सब कुछ अच्छी तरह याद है। कुछ घाव बहुत गहरे होते हैं, वरना इतने समय में तो मानव भ्रूण पूरा विकसित होकर जन्म ले लेता है।

जून के महीने की 24 तारीख। मुख्यमंत्री उस दिन अल्मोड़ा के नज़दीक एक नामी हृदय विशेषज्ञ द्वारा स्थापित अस्पताल का उद्घाटन करने आये हुए थे। कार्यक्रम से वापस लौटा ही था कि दोपहर बाद मोबाइल पर एक नज़दीकी रिश्तेदार के नदी में डूबने की दुःखद खबर मिली। डूबने वाला एक 17 वर्षीय किशोर था। उसके परिवार के एक सदस्य और दो पड़ोसी, हम चार लोग तुरंत ही घटना स्थल को रवाना हुए।

घटना स्थल शहर से करीब 16 कि.मी. दूर श्मशान घाट से 1 मील आगे था। श्मशान तक पक्की सड़क थी, जिससे आगे कच्ची सड़क और फिर थोड़ी दूर पैदल। घटना स्थल पर राज्य आपदा मोचन बल का बचाव दल, अनेक पुलिसकर्मी, स्थानीय गांव वाले और कुछेक परोपकारी लोग इकट्ठे थे। निरीक्षक व उप निरीक्षक स्तर के पुलिस अधिकारी भी थे, आम आदमी को बचाने के लिये तंत्र का इतना बड़ा जमावड़ा देख कर एक पल को सुखद आश्चर्य हुआ।

भीड़ को चीरते हम ’जीरो पॉइण्ट’ पहुंचे तो देखा कि मृतक के शव को नदी से निकाला कर किनारे पर रखा हुआ था। यह सुयाल नदी है, जिसके एक ओर हवालबाग विकास खण्ड तथा दूसरी ओर लमगड़ा विकास खण्ड है। सद्मे के कारण हम हक्के-बक्के थे इसलिये काफी देर तक  अगली कार्यवाही का चुपचाप इंतजार करने के सिवाय कुछ भी करने या कहने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन जब घंटा भर से ज्यादा बीत गया तो पुलिस अधिकारियों से अनुरोध किया कि जो कार्यवाही करनी है वह जल्दी कर ली जाये। उन्होंने बताया कि पुलिस को सूचना दी गयी है, इसलिये पंचनामे की कार्यवाही होगी और पोस्टमार्टम भी। एक घंटा और निकलने के साथ ही मेरी बेचैनी बढ़ रही थी इसलिये पुलिस वालों से देरी की वजह जाननी चाही। पता चला कि देरी का कारण यह था कि घटना किस थाने के क्षेत्राधिकार में हुई है,  तय नहीं हो पा रहा था। घटना नदी में घटित हुई जिसके दोनों तरफ अलग-अलग पुलिस चौकियों का क्षेत्र पड़ता था। एक चौकी इंचार्ज पहले से वहां मौज़ूद थे, लेकिन वह दावा कर रहे थे कि मामला दूसरी चौकी का है। दूसरे इंचार्ज ने काफी देर इंतजार कराया। टकटकी लगाये उनके आने की राह ऐसे देखी मानो सारी समस्या उनके आते ही खत्म हो जायेगी। लेकिन ये क्या! उनके आते ही दोनों ’क्षेत्राधिकारियों’ के बीच घमासान वाक्-युद्ध छिड़ गया। अक्सर क्षेत्राधिकार की लड़ाई इस बात पर होती है कि दोनों पक्ष क्षेत्र पर अपना हक़ बताते हैं, लेकिन यहां मामला उल्टा था। दोनों पुलिस अधिकारी परस्पर इस बात पर लड़ रहे थे कि क्षेत्र उनका नहीं है। मृतक का शव नदी के जिस किनारे पड़ा था वहां पानी कम था, जिसके आधार पर उस क्षेत्र का पुलिस चौकी इंचार्ज लड़ रहा था कि जब पानी उधर ज्यादा है तो लड़का इधर कैसे डूबा? दूसरे पक्ष का कहना था कि लाश तो नदी के दूसरे किनारे पर है जहां उसकी सरहद खत्म हो जाती है। ऐसे में वह क्यों मामले को ले? अगला घंटा इस लड़ाई में बीता। अन्ततः जहां शव पड़ा था उस क्षेत्र के चौकी इंचार्ज को ही पंचनामे की कार्यवाही शुरू करनी पड़ी। बमुश्किल ’तत्र’ ने पहला ’ज़रूरी’ दायित्व पूरा किया। पहली बार प्रत्यक्ष ज्ञान मिला कि कहने को तो ’उत्तराखण्ड पुलिस’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यथार्थ में भीतर कितने झगड़े हैं। जहां एक गंभीर दुर्घटना घटी हो, वहां त्वरित मदद करने की बजाय आपसी झगड़ा हो रहा है, वह भी कर्तव्य से विमुख होने की खातिर! यहीं यह पाठ भी समझा कि घटना स्थल पर ’तंत्र’ का भारी-भरकम त्वरित बचाव दल हाथी के दिखाने वाले दांत’ जैसा ही होता है। ’त्वरित’ कहा जाने वाला कोई दल या बल कभी इतना तेज नहीं हो सकता कि दुर्गम पहाडों में पलक झपकते ही घटना स्थल पर पहुंच जाये। किशोर की जान बचाना तो दूर, शव को निकालने में भी इस दल को कामयाबी नहीं मिली। स्थानीय ग्रामीणों ने शव को निकाला था। स्मरण हुआ कि पिछली गर्मियों में जब पहाड़ी वन दावाग्नि से जल रहे थे तब राष्ट्रीय आपदा राहत बल को आग बुझाने के काम में लगाया गया, लेकिन बल में शामिल मैदानी क्षेत्र के जवानों को पहाड़ में चढ़ने/चलने का बिल्कुल अनुभव नहीं था।

’तंत्र’ का दूसरा ज़रूरी काम, इस दुर्घटना के सम्बन्ध में, पोस्टमार्टम का था।   पोस्टमार्टम हाउस पहुंचने तक सूर्यास्त हो गया था। पता चला कि पोस्टमार्टम हाउस की चाबी यहां नहीं रह कर शहर के दूसरे छोर पर स्थित मुख्य चिकित्साधिकारी के दफ्तर में रहती है। यह भी पता चला कि देरी के कारण पोस्टमार्टम की अनुमति अपर जिला मजिस्ट्रेट से लेने की ज़रूरत पड़ी। किसी ने कहा कि पोस्टमार्टम के लिये चिकित्सक नहीं है। इन सब के बीच पता लगा कि यहां तो बिजली ही खराब है। कुछ भले जन-प्रतिनिधियों ने डी.एम. साहब से सम्पर्क करके आखिरकार यह दूसरा ज़रूरी काम भी सम्पन्न करा दिया।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट को हासिल करना नाकों तले चने चबाने जैसा था। कोतवाली में घटना का सन्दर्भ देकर रिपोर्ट की प्रति चाही। वहां रजिस्टर में घटना का विवरण तो दर्ज़ था, लेकिन काफी ढूंढ-खोज करने पर भी ’मित्र’ पुलिस पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं ढूंढ पायी। उन्होंने एस.डी.एम. के दफ्तर या अस्पताल में पूछकर पता लगाने को कहा, लेकिन वहां भी सुराग नहीं मिला। परिचित नगरपालिका के चेयरमैन साहब को समस्या बतायी तो उन्होंने भी एस. डी. एम. और मुख्य चिकित्सा अधीक्षक से सम्पर्क किया, किसी को सम्बन्धित पुलिस चौकी भेज कर वहां पता लगाया और अन्ततः जब वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से सम्पर्क किया तो पता चला कि यह उनके दफ्तर में उपलब्ध रहती है। एक महत्वपूर्ण सबक यह कि सरकारी तंत्र में विभागों यहां तक कि एक ही विभाग के अलग-अलग कार्यालयों के बीच आपस में समन्वय का अभाव है।

तीसरी औपचारिकता, जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह है मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल की। जन्म- मृत्यु के अलावा खुद के जीवित होने के प्रमाणपत्र की सरकारी कामकाज में कितनी अहमियत है इसका अंदाज़ा एक किस्से से लगा सकते हैं। जिस दोरान मैं इस मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल करने के लिये सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा रहा था एक महिला वकील ने कचहरी में यह किस्सा सुनाया था : ’’एक पेंशनर अपरिहार्य कारणवश अपने जीवित होने का प्रमाण प्रस्तुत करने कोषागार में नहीं आ सका, इस कारण उसकी पेंशन रोक दी गयी। अगली बार जब वह उपस्थित हुआ तब उससे इस आशय का शपथपत्र देने को कहा गया कि जिस तारीख को वह नहीं आ सका उस तारीख को भी वह जीवित था।’’ व्यक्ति सशरीर प्रत्यक्ष हाज़िर है, लेकिन उससे जीवित होने का शपथपत्र मांगा जाता है! ’’प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती’’ कहावत का क्या करें?

मृत्यु प्रमाणपत्र सम्बन्धित ग्राम पंचायत विकास अधिकारी ने देना था। लेकिन सरकारी तंत्र में आवेदन की प्रक्रिया सीधी व सरल कैसे हो सकती है? अर्ज़ी उप जिलाधिकारी को लिखी गयी, फिर इस पर तहसीलदार ने खण्ड विकास अधिकारी को आदेश लिखा कि ’’कृपया जांचकर नियमानुसार कार्यवाही करें’’। इसे लेकर मुझे खण्ड विकास अधिकारी के दफ्तर जाना था, जो 14 कि.मी. दूर है। बी.डी.ओ. साहब ने हाथ मिलाया और बड़े मधुर भाव से अपने कमरे में ले गये। मैंने सोचा कि इतने अच्छे अधिकारी हैं तो काम तुरंत ही हो जायेगा। उन्होंने हरी स्याही से आवेदन पत्र पर अपने अधीनस्थ ग्राम पंचायत विकास अधिकारी को आदेश लिखा- ’’नियमानुसार कार्यवाही करें’’। मैंने पूछा कि ये अधिकारी हैं कहां तो उन्होंने उनका मोबाइल नम्बर लिख कर दे दिया। लेकिन नम्बर मिलाने पर उधर से एक महिला ने रुखाई से जवाब दिया कि वह लंबे अवकाश पर है। वापस बी.डी.ओ. से मिला तो उन्होंने दूसरे वीपीडीओ का नम्बर लिख दिया। उससे सम्पर्क के प्रयास निष्फल साबित हुए क्योंकि हमेशा मोबाइल स्विच ऑफ था।

एक सुपरिचित वीपीडीओ ने भरोसा दिलाया कि अर्ज़ी दे दो मैं काम करा कर दे दूंगा। वह घर से कागजात खुद लेकर गया था। करीब  सप्ताह भर बाद उसने हाथ खड़े कर दिये कि मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं मिल पायेगा। कारण यह कि पंचनामा भरने वाले पुलिस अधिकारी ने एक घटना स्थल अंकित करते समय नदी के दोनों तरफ पड़ने वाले दोनों गांवों के नाम दर्ज़ कर दिये और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी एक की बजाय दो गांव दर्ज़ हो गये। एक व्यक्ति दो गांव में कैसे मर सकता है। मुझे ’तंत्र’ के साथ-साथ मृतक पर भी झुंझलाहट हो रही थी कि डूब मरने के लिये उसने इतनी विवादित जगह क्यों चुनी। अब क्या हो सकता है? इस सवाल का उत्तर नहीं था, लेकिन दोनों गांवों में से किसी का भी अधिकारी अपनी नौकरी दांव पर लगा कर मृत्यु प्रमाणपत्र देने को तैयार नहीं था। जो परिचित ग्राम पंचायत विकास अधिकारी मुझसे अर्जी व कागजात ले गया था उसने मुझे वापस लौटा दिये। मैं एस.डी.एम. और नगरपालिका अध्यक्ष से पुनः मिला। उन दोनों ने फोन पर आपस में विचार-विमर्श किया, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकल सका। यहां एक और सबक मिला कि वर्तमान सरकारी तंत्र का एक अदन सा कर्मचारी भी आम आदमी को परेशान या डरा-धमका सकता है, लेकिन बड़ी कुर्सी पर बैठा अधिकारी भी आम आदमी के हित में लीक से हट कर कोई छोटा सा निर्णय लेने में खुद को लाचार व नियमबद्ध बताने लगता है। क्या नौकरी खोने का डर वाकई इतना भयानक है?

मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल करने में तहसीलदार की कुर्सी पर बैठी युवा महिला की संवेदना और सही निर्णय की क्षमता महत्वपूर्ण थी, जिसने कहा कि वह तंत्र की बड़ी लापरवाही के कारण हुई मेरी परेशानी को समझती है। उसने कोतवाली को घटनास्थल की स्थिति स्पष्ट करने को िंलखा। कोतवाली इंचार्ज ने दो में से एक गांव का नाम काट दिया और एक बाधा दूर हो गयी । संवेदना और मदद की भावना पुलिस अधीक्षक कार्यालय में कार्यरत लिपिक में भी स्पष्ट दिखी, जिसने एक परिवार में तीन महीने के भीतर हुई दो आकस्मिक् मौतों के बारे में पता चलते ही काफी चुस्ती व दौड़-धूप के साथ काम किया। अच्छे और खराब लोग हर जगह हर ’सिस्टम’ में होते हैं

संशोधित पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ पुनः बी.डी.ओ. कार्यालय का चक्कर लगाया। पूरी उम्मीद थी आज कि मृत्यु प्रमाणपत्र मिलना अटल है। बी.डी.ओ. साहब ने फिर वीपीडीओ को आदेश लिख दिया। लेकिन पता चला कि वह अवकाश पर ही है। फिर बहुत दिन निकल गये तो धैर्य जवाब देने लगा तो मैंने जिलाधिकारी को एक शिकायत भरा पत्र लिखने के बाद बीडीओ को फोन किया कि अगर अब काम नहीं हुआ तो मुझे शिकायत करनी ही होगी। इसका असर हुआ। केवल 15 मिनट के भीतर ही उन्होंने खुद फोन करके बताया कि छुट्टी पर गये अधिकारी का चार्ज अन्य को दे दिया है, जो मृत्यु प्रमाणपत्र दे देगा। उसका मोबाइल नम्बर भी दिया। सचमुच उस दिन काम हो गया। शाम को बीडीओ साहब ने खुद फोन करके पुष्टि करनी चाही कि काम हो गया था। उन्हें याद दिलाया कि मैंने उन्हें धन्यवाद का एस.एम.एस. भेज दिया था। ’’फिर भी कन्फर्म करनना था’’, उन्होंने कहा। जो काम बेवजह इतने दिनों तक टाला जाता रहा, आज तंत्र इतना कर्तव्यपरायण हो गया था। यह जिलाधिकारी से शिकायत करने की धमकी का असर था?

सोचता हूं कि क्या एक आम व्यक्ति की मौत के बहाने यह हमारे सरकारी तंत्र का ’पोस्टमार्टम’ नहीं था। क्या तंत्र को भी ’डेथ सर्टीफिकेट’ नहीं मिलना चाहिये?

 

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कमल जोशी

कमल जोशी अल्मोड़ा में रहते हैं और 'उत्तराखंड सेवा निधि' में कार्य करते हैं.