बीसवीं शताब्दी के उत्तराखंड का एक प्रमाणिक दस्तावेज


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अरुण कुकसाल
October 1, 2018

‘People and legends of Himalaya and the Ganga’

विख्यात साहित्यकार स्वर्गीय विद्यासागर नौटियाल ने हिमालय और उसके निवासियों पर प्रकाशित बेहतरीन किताबों में ‘People and Legends of Himalaya and the Ganga’ को शामिल किया है। इस बात की पुष्टि में तथ्य यह भी कि वर्ष 2007 में ‘Kalpaz Publication, Delhi’ से प्रकाशित यह किताब हिमालयी साहित्य के पंसदीदा पाठकों के मध्य प्रत्येक वर्ष अग्रणी रैंकिग में सराही जाती है।

उक्त किताब के लेखक देहरादून निवासी आदरणीय मथुरा प्रसाद कुकसालजी की उम्र आज 98 वर्ष है (कल याने 1 अक्टूबर को वे 99वें वर्ष में प्रवेश करेंगे)। आज भी वे पूर्णतः स्वस्थ और हर समय प्रसन्नचित रहकर बिना चश्मा पहने रोजाना ज्यादातर समय अध्ययन एवं लेखन में तल्लीन रहते हैं।

मूलतः चामी गांव, पौड़ी (गढ़वाल) के निवासी श्री मथुरा प्रसाद कुकसालजी का जन्म 1अक्टूबर, 1920 को स्यूंसारी गांव, भवाली (नैनीताल) में हुआ था। उनके पिता हृदय राम खुगशाल वहां कानूनगो तैनात थे। श्यामखेत, भवाली, नैनीताल और इलाहाबाद से शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे बतौर नियोजन अधिकारी बिजनौर और मेरठ में कार्यरत रहे।

मथुरा प्रसाद कुकसालजी वर्ष 1954 में लोकसेवा आयोग उत्तर प्रदेश से चयनित प्रथम बैच के ‘खंड विकास अधिकारियों’ में शामिल रहे हैं। उत्तराखण्ड में सल्ट, जोशीमठ और भटवाड़ी ब्लाक को स्थापित एवं शुरुवाती संचालन का श्रेय उन्हीं को है। जीवन में सादगी, ईमानदारी और कड़ी मेहनत उनके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग रहे है। जिसका आज भी वो कड़ाई से पालन करते हैं। स्वाध्याय, फोटोग्राफी, लेखन एवं भ्रमण के शौक ने उनके जीवनभर के प्रयासों और कार्यों को और बेहतर करने में मदद की है। ‘People and Legends of Himalaya and the Ganga’ किताब उनके स्कूली जीवन से लेकर सरकारी नौकरी से अवकाश लेने तक कभी-कभार इधर-उधर लिखे अपनी डायरी के पन्नों का क्रमबद्ध एवं सम्पादित प्रस्तुतीकरण है।

यह किताब 29 उपशीर्षकों में संस्मराणात्मक शैली में है। पुस्तक के शुरुवाती पन्ने हिमालय के अंर्तमन में आत्मसात आध्यात्मिकता, पौराणिकता और उसके निवासियों की जीवटता पर हैं। लेखक के घुम्मकड़ी स्वभाव में दर्ज हिमालय की प्रकृत्ति और प्रवृत्ति का संक्षिप्त विश्लेषणात्मक विवरण एक विशिष्ट नजरिये का आभास देता है। लेखक के नैनीताल के स्कूली दिनों से लेकर इलाहबाद में कानून की पढ़ाई पास करने तक के संस्मरण 20वीं शताब्दी में उत्तराखंड के लोगों विशेषकर युवाओं की सहजता, कर्मठता और बेचारगी दोनों भावों से परिचित कराते है। ‘चैतराम शाह ठुलघरिया हाईस्कूल, नैनीताल’ से वर्ष 1938 में प्रथम श्रेणी (गणित और संस्कृत में विशेष योग्यता) में हाईस्कूल के उपरान्त भी ‘सैंट जोजेफ कालेज, नैनीताल’ में उनको इसलिए प्रवेश नहीं मिला क्योंकि वे भारतीय थे। तब के अंग्रेज प्रधानाध्यापक ने कहा कि ‘तुम जैसे प्रतिभावान छात्र को प्रवेश देने में मुझे खुशी होगी, परन्तु इस कालेज के अंग्रेज लड़के तुम्हारे इंडियन होने के कारण तुम्हें इतना परेशान करेंगे कि तुम ठीक से पढ़ नहीं पाओगे’। आज की पीढ़ी को समझने के लिए देश की गुलामी का यह एक मामूली दृष्टांत मात्र है।

यह किताब 30 के दशक के कुमाऊं विशेषकर नैनीताल और उसके ग्रामीण इलाकों में पहाड़ी लोगों के जनजीवन और बच्चों की दुनिया की सैर कराती है। नैनीताल में पहाड़ी बच्चों और अंग्रेज लोगों की तीखी नोक-झोंक के कई किस्से इसमें है। आगे की पढ़ाई के लिए लेखक का इलाहाबाद में कई साल रहना हुआ। तब के गढ़वाल-कुमाऊं से पढ़ने गए लड़कों का ‘इलाहबादी उत्तराखण्ड’ पुस्तक में जीवन्तता से दिखाई देता है। चालीस के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन में इलाहबाद और मुख्यतया इलाहबाद विश्वविद्यालय के आंदोलनों की पड़ताल भी इसमें है।

किताब के चौथे अध्याय ‘Early Years of Community Development’ से बात पते की आरम्भ होती है। स्वतंत्रता के बाद देश के अन्य राज्यों की भांति उत्तर प्रदेश में सरकारी तौर पर सामुदायिक विकास कार्यक्रमों का श्रीगणेश वर्ष 1954 से हुआ। कुकसालजी जनवरी, 1955 में अल्मोड़ा जनपद के सल्ट ब्लाक के प्रथम ‘खंड विकास अधिकारी’ बने। अपने कार्यकाल के दौरान सल्ट क्षेत्र की जिन मौलिक विशिष्टताओं और समस्याओं का जिक्र उन्होने किया है, आज 63 साल बाद भी लगता है सल्ट क्षेत्र आज भी वहीं के वहीं निश्चेत खड़ा है। पानी, शिक्षा, सड़क स्वास्थ्य, रोजगार आज भी वहां की प्रमुख समस्यायें हैं, ये मुद्दे तब भी ऐसे ही रहे होगें। हां, सल्टिया पहचान ‘तिक्खी मिर्च अर तगड़ बल्द’ मेें फीकापन जरूर आ गया है। खेती-किसानी चौपट हुयी तो पहचान का संकट आना स्वाभाविक था। किताब में सल्ट संस्कृति के माध्यम से तब के पहाड़ी जन-जीवन के सीधेपन, कर्तव्यपरायणता और ईमानदारी के कई प्रसंग हें। उसमें एक प्रसंग काफी मजेदार है। तब पूरे स्टाफ के वेतन लाने के लिए प्रत्येक महीने कैशियर को खुमाड़ (सल्ट) से अल्मोड़ा जाना- आना होता था। अल्मोड़ा जाने-आने में 4 दिन लगते थे। एक बार वेतन के कलदार याने रुपए-पैसों से भरे बैग को कैशियर रास्ते में कहीं भूल गया था। ढूंड-खोज आरम्भ हुयी तो ‘मोहान’ नामक जगह पर किसी दुकानदार ने बताया कि आज से 5 दिन पहले एक बैग उसे बैंच पर मिला था जिसे उसने सामने के नजदीकी मकान के बाहर की खूंटी पर लटका दिया था, ताकि जिसका होगा वह ले जायेगा। कैशियर ने वहीं से नजर उठा कर देखा तो उसका बैग खूंटी पर लटका दिखाई दिया। वह तुरन्त उस व्यक्ति के साथ उस मकान पर पहुंचे जहां वह बैग पूरी धनराशि के साथ सही-सलामत उसी खूंटी पर शान से लटका हुआ था। आज यह बात कल्पना से भी परे है।

यह किताब देश के स्वाधीन होने के बाद के वर्षों में गढ़वाल-कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्र में विकास कार्यक्रमों के शुरुवाती प्रयासों को उद्घाटित करती है। जोशीमठ ब्लाक जिसे पर्णखंडा क्षेत्र कहा जाता है के सीमावर्ती गांव माणा, नीति, मलारी, बडाहोती, उर्गम, बद्रीनाथ, द्रौणागिरि, कल्पेश्वर, राईं-चाईं, टंगडी, पाण्डुकेश्वर और उत्तरकाशी के भटवाडी ब्लाक के गंगोत्री, हर्सिल, सुक्खी, झाला, मुखवा आदि अनेकों गांवों में लेखक के विविध अनुभवों ने किताब को रोचक एवं शोधपूर्ण कलेवर प्रदान किया है। पहाड़ में लकड़ी के बहुचर्चित कारोबारी ‘हर्सिल के विल्सन’ पर ‘The Legendary Wilson’ अध्याय में कई विशिष्ट, रोचक एवं चर्चित जानकारियां हैं। गंगा की महत्वा और उसकी महिमा पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण का जिक्र इस किताब में जगह-जगह पर आया है। ‘The legends of Ganga’ अध्याय लेखक की भारतीय दर्शन एवं विज्ञान पर गहरी समझ को इंगित करता है। कुकसालजी एक अच्छे फोटोग्राफर एवं कवि भी हैं। जिसके प्रभाव ने किताब को और भी आकर्षक और प्रभावशाली स्वरूप प्रदान किया है।

आज किसी अधिकारी का पहाड़ में रहना एवं कुछ किमी. पैदल चलना ही बड़ी और चर्चित खबर बन जाती है। जबकि 50-60 साल पहले इन्हीं पहाड़ों में एम. पी. कुकसालजी जैसे अनेकों अधिकारियों ने तो जीवन प्रर्यन्त सामान्यतया बीसों मील रोज पैदल चल कर विकास की अलख जगाने का काम किया था। वे सब ग्रामीण जन-जीवन में विकास के प्रथम वाहक ही नहीं वरन वे खुद भी वैसा ही जीवन जीते थे। आज पहाड़ी गांवों में जो भी मजबूती है तो वह पचास साल पहले के सरकारी अथवा गैरसरकारी कार्यों की वजह से ही है। क्योंकि तब सब जगह जीवन में कर्मठता और ईमानदारी का बोलबाला था न कि आज की तरह अर्कमण्यता और बेईमानी की ताजपोशी और वाह-वाही।

यह किताब इन संदर्भों में भी उल्लेखनीय है कि हिमालय एवं गंगा की पौराणिकता और उसके प्रति स्थानीय समाज में मौजूद सदभाव और आस्था की गहरी और गम्भीर जानकारी इसमें मौजूद है। यह किताब 20वीं सदी के उत्तराखंडी जन-जीवन की व्यापक जानकारी देकर पाठकों की कई जिज्ञासाओं को शांत करके सकून प्रदान करती है। इन्हीं व्यापक संदर्भों में यह किताब 20वीं सदी के उत्तराखंड का एक प्रमाणिक दस्तावेज है।

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अरुण कुकसाल

अरुण कुकसाल विभिन्न क्षेत्रों में सेवाएँ देने के बाद स्वैच्छिक सेवा निवृति लेकर अब स्थायी रूप से श्रीनगर में रहते हैं और सामाजिक कार्यों व स्फुट लेखन में व्यस्त हैं.