पर्यावरण संरक्षण का पर्याय: सरला बहन


नैनीताल समाचार
April 5, 2018
रमेश कुमार मुमुक्षु 

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान चनौदा आश्रम के सभी सदस्यों को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। सरला बहन ने उनको छुड़वाने का बीड़ा उठाया। उस वक्त के आयुक्त ने उनको ऐसा करने के लिए मना भी किया। लेकिन सरला बहन अपने मिशन में लगी रही। देखने में वे विदेशी थीं, लेकिन भीतर से और व्यवहार से पूरी भारतीय और भारत से प्रेम करने वाली।

रात्रि में एक लकड़ी के तख्त पर लिखते-लिखते सो जाना कोई विशेष बात नहीं है, लेकिन घने जंगल में निपट अकेले ही जंगली जानवरों के बावजूद ऐसा करे तो सोचने का विषय हो सकता है। ऐसा साहस और निर्भयता किसी आध्यात्मिक और ऋषितुल्य व्यक्ति में हो सकती है। सच में इंग्लिश मूल की महान सर्वोदय एवं समाज सेवक सरला बहन ऐसी ही महान व्यक्तित्व की धनी थीं। क्या रात और क्या दिन ? सर्दी, गर्मी, धूप, जंगल, पहाड़ सभी स्थानों पर एक समान काम करते रहना सरला बहन का स्वभाव था।

सरला बहन, जिनका मूल नाम कैथरीन मेरी हाइलामन था, का जन्म 5 अप्रैल 1901 को पश्चिम लंदन में शेफर्ड बुश नामक स्थान में हुआ। उनके पिता स्विस जर्मन मूल से थे जबकि माँ इंग्लिश मूल की थीं। पिता के स्विस जर्मन मूल होने के बावजूद भी वे इंग्लिश लोगों की तरह जर्मन की साम्राज्यवाद नीति का विरोध करते थे। लेकिन उनकी राष्ट्रीयता के कारण उनको दुश्मन देश से जोड़ दिया गया। कैथरीन ने देखा कि युद्ध होते ही पड़ोसी, जो भाईचारे से रहते थे, यकायक एक दूसरे के विरोधी हो गए। कैथरीन के पिताजी की राष्ट्रीयता के कारण उनको पढ़ाई में छात्रवृद्धि नही दी गई। उनकी पढ़ाई छूट गई। कैथरीन ये सब देख विद्रोही बन गई। उनके मन में उथल पुथल मचने लगा। बड़े नगर, बड़े उद्योग और सरकार…. सबसे उनका मोहभंग होने लगा क्योंकि विश्व युद्ध इनके कारण ही हुआ था, ऐसा वेे मानती थीं। विश्व युद्ध की त्रासदी ने उनके भीतर कोलाहल मचा दिया था। युद्ध में जीतने वाला खुशी में झूम रहा था और मरने वाला शोक में डूबा था। उनके मन के भीतर ये सब देख कर गहरा असर हुआ और उनको लगने लगा कि हार-जीत में आखिर मानव ही मरता है, मानवता ही परास्त होती है। कैथरीन को खोज थी ऐसी दुनिया की, जहां पर युद्ध नहीं शांति का अस्तित्व हो। युद्ध से ग्रसित विश्व में ये सब संभव नहीं था। वे खेतों और जंगल में भटकती और चिंतन करती रहती थीं। युद्ध मानवता के लिए घातक है, ये उनको समझ आ गया था।

कैथरीन ने आरंभिक दौर में क्लर्क के रूप में नौकरी की और 1920 में घर छोड़ दिया। उथल-पुथल का ये सिलसिला 1927 तक चलता रहा। उसके पश्चात् उनका संपर्क भारतीय विद्यार्थियों से हुआ, जिनके कारण सरला बहन गांधी जी के बारे में जान सकीं। उनको लगा कि ये ही वह व्यक्ति और विचार है, जिससे मानवता प्रेम और भाईचारे से रह सकती है। उन्होंने गांधी जी से संपर्क किया और भारत आने की बात कही। गांधी ने उनको भारत आने को मना ही किया। संभवतः वेे उनका समर्पण देखना चाह रहे थे।

अंत में 1932 में कैथरीन ने इंग्लैंड सदा के लिए छोड़ दिया और कभी वापस लौट कर नही गईं। अब वे सरला बहन थी। सर्वप्रथम उन्होंने उदयपुर में इंग्लिश अध्यापक के रूप में बच्चो को पढ़ाया । उस स्कूल की स्थापना गुजरात विद्यापीठ के तर्ज़ पर हुई थी। लेकिन सरला बहन को वहां अच्छा नही लगा और उनके लिए वो एक मॉडल स्कूल ही था, अन्य स्कूलों जैसा, जिसमे उनको रुचि नही थी। 1936 में सरला बहन अहमदाबाद में मज़दूरों के साथ काम करने मज़दूर संघ से जुड़ीं। लेकिन वहां भी उनकी पटरी नही जमी।

वहां पर वे बीमार हो गईं, जिसके कारण उनको बॉम्बे जाना पड़ा। वहीं से जमुना लाल बजाज के निमंत्रण पर सेवाग्राम गांधी जी के पास पहुंच गईं। सेवाग्राम में सरला बहन आर्यनकाम परिवार की सदस्य बनीं। पहली बार उनको उनकी रुचि और प्रतिभा के अनुसार कार्य करने का अवसर मिला। शिक्षा ही उनकी रुचि का काम था। सेवाग्राम में सरला बहन 8 वर्ष तक रहीं। सेवाग्राम में ही रहकर उन्होंने गांधी की नई तालीम को आत्मसात किया और पर्यावरण संरक्षण की बारीकियों को समझ उसके महत्व को गहराई से मथ लिया। वर्धा का मौसम सरला बहन के मुताबिक नही था। एक बार सरला बहन मलेरिया से पीड़ित हो गई।

1941 में गांधी जी ने  सरला बहन को स्वास्थ्य लाभ के लिए कौसानी जाने को कहा। 1929 में गांधी जी कौसानी में कुछ समय रह चुके थे और उन्होंने वहाँ पर ‘अनासक्ति योग’ के नाम से गीता पर टीका लिखी थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान चनौदा आश्रम, जिसकी स्थापना महात्मा गांधी ने की थी,के  सभी सदस्यों को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। सरला बहन ने उनको छुड़वाने का बीड़ा उठाया। उस वक्त के आयुक्त ने उनको ऐसा करने के लिए मना भी किया। लेकिन सरला बहन अपने मिशन में लगी रही। देखने में वे विदेशी थीं, लेकिन भीतर से और व्यवहार से पूरी भारतीय और भारत से प्रेम करने वाली। कौसानी के प्रवास ने उनके लिए एक नई राह और विश्व पर्यावरण और महिला शिक्षा के नए रास्ते खोल दिए।

कौसानी में ही उन्होंने गांधी की नई तालीम के प्रयोग करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने लक्ष्मी आश्रम की स्थापना भी की, जो 1946 में अस्तित्व में आया। वह दौर अंग्रेज़ी शासन का था। सरला बहन ने इंग्लिश हुकूमत के विरुद्ध जाने का निर्णय किया। उनके साहस और समर्पण भाव का अंदाज़ा इस बात से लग जाता है कि  वे दिन ढलने के बाद जंगली रास्तों से होते हुए युद्धबंदियों को संदेश देने लिए अल्मोड़ा पहुँच जाती थीं। निर्भय और दृढ़ता की पर्याय सरला के लिए अंधेरी रात घनघोर जंगल मात्र एक रास्ता ही था। जो लोग आज़ादी की लड़ाई में जेल में डाल दिये थे, उनके परिवारों की उन्होंने देखभाल शुरू की। इसके लिए उनको नज़रबंद कर दिया गया।  उन्हें दो बार अल्मोड़ा और लखनऊ की जेलों में डाला गया।

1946 में कस्तूरबा महिला उत्थान मंडल के माध्यम से लक्ष्मी आश्रम ने उत्तराखंड, जो उस वक्त यूनाइटेड प्राॅविंसेज था, में एक अनूठा काम शुरू किया। यहाँ नई तालीम का प्रयोग एक मिशन की तरह शुरू हुआ। नई तालीम मात्र स्कूली शिक्षा और अक्षर ज्ञान ही नही था, अपितु पूरी जीवन शैली विकसित करने का तरीका था। इसमें भी उनका जोर स्त्री शिक्षा पर था। सरला बहन का मानना था कि एक स्त्री पढे़गी तो पूरा परिवार पढ़ेगा। नयी तालीम में कताई, बुनाई, ऊन उद्योग, कृषि आदि की शिक्षा भी शामिल थी। पढ़ाई के साथ कृषि, उद्योग और मिट्टी से नितांत नज़दीकी ही शिक्षा है और इसी से ग्राम स्वराज की स्थापना कर सकते है। खादी के प्रचार के लिए उन्होंने गांधी जी के सिपाही शांति लाल त्रिवेदी के साथ लंबी यात्रायें कीं। शांति लाल जी खादी प्रचार को ‘ड्यूटी विद ब्यूटी’ कहते थे। संगठन के माध्यम से कार्य करना उनकी विशेषता थी। 1961 में उन्होंने सर्वोदय मण्डल की स्थापना ग्राम स्वराज्य के प्रचार के लिए की।

1979 में बाबा आमटे के साथ प्राप्त जमुना लाल बजाज पुरस्कार की धनराशि से पर्वतीय पर्यावरण संरक्षण समिति की स्थापना की, जो धरमघर (पिथौरागढ़) में स्थित है। वहाँ आज भी सरला बहन की धरोहर को अक्षुण्ण रखने का भरसक प्रयास जारी है। उन्होने विश्वविख्यात पक्षी वैज्ञानिक डॉ. सालिम अली को इसका संरक्षक मनोनीत किया था।

उन्होंने विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण के साथ भी कार्य किया। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में उन्होंने बिहार में काम किया। जयप्रकाश नारायण द्वारा डाकुओं से आत्मसमर्पण करवाने के पश्चात् उन्होंने चम्बल में उनके परिवारों के बीच काम किया।

सरला बहन नई तालीम के आगे शिक्षा में नई सोच और एप्रोच की बात सोचने लगी थीं और इसके लिए लोक शिक्षण की बात करने लगी थीं, ताकि ग्राम स्वराज्य की स्थापना हो सके। सरला बहन नई तालीम के आगे शिक्षा में नई सोच और एप्रोच की बात सोचने लगी थीं और इसके लिए लोक शिक्षण की बात करने लगी थीं, ताकि ग्राम स्वराज्य की स्थापना हो सके। इस कार्य के लिए स्त्री शक्ति और लोक यात्रा के माध्यम से सरला बहन 10 वर्ष मध्यप्रदेश, बिहार और कर्नाटक के गाँवों में जनजागरण के लिए लगभग पैदल ही यात्रा करती रहीं।

चीन के साथ सीमा विवाद के कारण उत्तराखंड में रह रहे विदेशी मूल के लोगों को काफी समय तक उत्तराखंड से बाहर रहना पड़ा। किन्तु सरला बहन की आत्मा तो उत्तराखंड के पहाड़ों में ही में ही थी। एक बार उन्होंने दक्षिण में भी बसने की भी सोची। लेकिन उसी दौरान उनके रहने के लिए धरमघर में व्यवस्था हो गई। इस आश्रम का नाम उन्होंने ‘हिमदर्शन कुटीर’ दिया, क्योंकि यहाँ से हिमालय की बर्फ से ढँकी चोटियां, नंदा देवी, नंदा घुंटी, पंचाचूली दिखाई देती हैं। अपनी 22 पुस्तकों में से अधिकांश उन्होंने यहीं लिखीं। उन्होंने हिन्दी भाषा को आत्मसात कर लिया था। आठ वर्ष तक गांधी जी के साथ रह कर उनमें भी लगातार लिखने की आदत आ गई थी। उन्होंने खूब लिखा और अभी भी उनकी कितनी ही पाण्डुलिपियाँ अप्रकाशित रखी हुई हैं।

‘पर्यावरण संरक्षण’ पुस्तक के माध्यम से उन्होंने पर्यावरण शब्द को एक व्यापक अर्थ दिया और आम आदमी  तक प्रचारित कर दिया। उनके अनुसार पर्यावरण संरक्षण ही मानव का सबसे बड़ा और आवश्यक कार्य है। वृक्षों से उनका प्रेम उनके साथ रहने वाले बखूबी जानते थे। जंगल से उनका प्रेम इस बात से उजागर हो जाता है कि वे जानवरों के चारे के लिए भी जंगल में जाने को माना करती थीं। सत्तर के दशक में ही उन्होंने पर्वतीय विकास की सही दिशा पर सभी सामाजिक चिंतकों और कार्यकर्ताओं के साथ गहन चर्चा कर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की ताकि पर्वतीय क्षेत्रों का विकास कैसा हो, इस पर आम राय बन सके। विश्वप्रसिद्ध चिपको आंदोलन की संकल्पना सरला बहन की ही देन है। सतत विकास के माध्यम से जल, जंगल, जमीन का सही और कम से कम दोहन ही उनका लक्ष्य था। प्रकृति में खाद्य श्रृंखला का क्या महत्व होता है, इस पर उन्होंने बड़ी गहराई से समझाया।

सरला बहन ने अति पिछड़े इलाके में होमियोपैथी के इलाज को भी लोगों में प्रचलित किया। गांव के बच्चे बाल मिठाई के दाने समझ उनसे ये दवाइयाँ मांगने आते रहते थे।

प्रचार से दूर सरला बहन एक ऋषि की भांति ग्राम स्वराज्य, पर्यावरण संरक्षण, मद्यनिषेध, नारी शिक्षा और विश्व प्रेम का संदेश ‘जय जगत’ प्रचारित करती रहीं। गांधी जी ने अपने पीछे समाज में काम करने के लिए एक पीढ़ी तैयार की। ऐसे ही सरला बहन ने भी एक पीढ़ी तैयार की जो देश-विदेश में पर्यावरण संरक्षण, स्त्री शिक्षा मद्यनिषेध के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम करने के साथ-साथ आगे आने वाली पीढ़ी को तैयार कर रही है। चिपको आंदोलन के सबसे बड़े हस्ताक्षर सुंदरलाल बहुगुणा, उनकी धर्मपत्नी विमला बहुगुणा, चंडीप्रसाद भट्ट, राधा भट्ट, शोभा बहन, सदन मिश्रा, हीरा सिंह धर्मसक्तू आदि उसी परम्परा के वाहक हैं।

1982 में सरला बहन का देहान्त हुआ। उन्होंने कहा था कि मरने के उपरांत मुझे अग्नि को समर्पित करना। उनके मरने के बाद उनका दाह संस्कार लक्ष्मी आश्रम में हुआ और उनके फूल हिमदर्शन कुटीर, जहां वेे अक्सर लेखन का काम करती थीं, में जमीन में समाधि के रूप में रखे गए। उनकी इच्छा के अनुसार उनके फूल के ऊपर देवदारु और पù के पेड़ लगाए गए है । आज भी हर वर्ष पाँच अप्रैल को उनका जन्म दिन हिमदर्शन कुटीर में मनाया जाता है और 8 जुलाई को उनकी बरसी लक्ष्मी आश्रम, कौसानी में आज भी मनाई जाती है। ये सिलसिला चलता रहेगा और पहाड़ की एक और पीढ़ी को समाज के लिये काम करने को प्रेरित करता रहेगा।

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