पानी नहीं, आंसुओं के सैलाब से भरेगा पंचेश्वर बांध 


नैनीताल समाचार
October 11, 2018

 

-मोहित डिमरी

जनसंवाद यात्रा के लिए पंचेश्वर पहुंचा। सरयू और महाकाली नदी के संगम को निहारते हुए कई ख्याल आ रहे थे। सोच रहा था कि पंचेश्वर बांध बनेगा तो यहां क्या टिहरी जैसा हाल होगा? बड़े बांध आंसुओं के सैलाब से बनते हैं और भरते हैं। पंचेश्वर बांध को लेकर न तो पर्यावरण को ध्यान में रखा जा रहा है और न ही जनभावनाओं का। आखिर ये जनविरोधी और प्रकृति विरोधी फैसले कौन लेता है? टारगेट है 6720 मेगावाट बिजली का उत्पादन। पर किस क़ीमत पर?

133 गांव प्रभावित होंगे, 22 गांवों का अस्तित्व मिट जाएगा। 22 हजार करोड़ की योजना क्या यहां के लोगों को खुशी देगी, क्या यहां का विकास होगा़? किसको पता? पर योजना है तो स्थानीय लोगों का विरोध भी है। जन संवाद यात्रा’ के पहले दिन पंचेश्वर में मेरी मुलाकात एक 25 साल के स्थानीय युवक से हुई। दिनेश सिंह नाम के इस युवक से मैंने पंचेश्वर बांध के बारे में पूछा। उसने कहा कि एक दिन हमारा पूरा इलाका पानी में डूब जाएगा। मैं नहीं चाहता कि हमारे गाँव, खेत, मठ-मंदिर,पेड़-पौधे और सांस्कृतिक धरोहरें झील में समा जाए। सरकार हमें रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा उपलब्ध कराये। हम अपनी थाती-माटी नहीं छोड़ना चाहते। 55 वर्षीय  व्यक्ति गिरीश बोहरा भी बांध बनने से चिंतित दिखाई दिये। उनकी चिंता यह है कि बाँध बनने के बाद उनकी जन्मभूमि और विरासत सब कुछ खत्म हो जाएगा।

टिहरी बाँध निर्माण के बाद पैदा हुए हालात से भी गिरीश परिचित हैं। इसी कारण मैंने उनके चेहरे पर भविष्य को लेकर आशंका भी पढ़ ली। हमने पंचेश्वर से ‘जन संवाद यात्रा’ के आगाज का फैसला इसीलिए लिया कि इस पूरे क्षेत्र में बन रहे दुनिया के दूसरे सबसे बड़े बाँध को लेकर आम लोगों को जागरूक किया जा सके। यात्रा के दौरान हमने कई लोगों से बातचीत की। इनमें हमें एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जो बाँध के पक्ष में रहा हो। अब इस बाँध के बारे में मोटा-मोटी जानकारी आप सभी से साझा करता हूँ।

पंचेश्वर बाँध भारत नेपाल सीमा पर शिव के प्राचीन पंचेश्वर मंदिर से दो किलोमीटर नीचे सरयू और महाकाली नदी के संगम पर बनाया जाना है। बाँध निर्माण के लिये भारत और नेपाल के बीच 1996 में महाकाली नदी संधि हुई थी।यह बाँध आकार में टिहरी बाँध से करीब तीन गुना अधिक होगा। बाँध बनने से एक बड़ा क्षेत्र पानी में जलमग्न हो जाएगा। बांध 2018 में ही बनना शुरू हो जाएगा और 2026 तक कार्य पूरा होगा। इसके बाद दो साल तक इसमें पानी भरा जाएगा। तब बिजली निर्माण होगा। इतना तो तय है कि बाँध निर्माण से सामाजिक और पर्यावरणीय नुकसान होगा। बाँध निर्माण से इस क्षेत्र का भूगोल ही बदल जाएगा।

भूगर्भविज्ञानी मानते हैं कि भूकंप के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील स्थान पर पंचेश्वर बाँध बनाया जा रहा है। यह कभी भी बड़ा खतरा बन सकता है। टिहरी बाँध का उदाहरण आज दुनिया के सामने है। विकास के नाम पर टिहरी विस्थापितों ने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। दावा किया गया था कि टिहरी बाँध से 2400 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा, लेकिन इस परियोजना से 500 से 700 मेगावाट से अधिक बिजली पैदा नहीं हुई।

मैं व्यक्तिगत रूप से जल विद्युत परियोजनाओं का विरोधी नहीं हूँ। मेरा विरोध सिर्फ़ बड़े बाँधों को लेकर है। अगर बाँध बनाने ही हैं तो एक मेगावाट से 100 मेगावाट तक बनाये जा सकते हैं। इससे पर्यावरण को बड़े पैमाने पर नुक़सान नहीं होगा। पर्यावरण और संस्कृति का ध्यान रखते हुए विकास परियोजनाओं का स्वरूप छोटा किया जा सकता है। इससे नदियों का प्रवाह प्रभावित नहीं होगा और जैव विविधता का नाश, पेड़ों और मिट्टी का कटान और जलवायु में परिवर्तन भी नहीं होगा। मेरा आप सभी से अनुरोध है कि पहाड़ के अस्तित्व को बचाने के लिये विध्वंसकारी बाँधों का विरोध करें।

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