संदर्भ नगर निकाय चुनाव : 74 वें संविधान संशोधन की जमीनी चुनौतियां..


नैनीताल समाचार
October 18, 2018

प्रमोद साह

उत्तराखंड के 74 नगर निकाय में चुनाव की घोषणा के साथ ही यह जांचने परखने का वक्त आया कि, इस चुनाव के बाद नगर निकायों में चुनाव के नाम पर फिर कुछ चेहरे बदले जाएंगे या कुछ व्यक्तियों को अपने घरों और गाड़ियों में नाम पट्टिका लगाने के अधिकार मिल जाएंगे और नगर निकाय की पूर्व की भांति सरकारों पर ही निर्भरता बनी रहेगी अथवा नगर निकाय इस बार 74 वें संविधान संशोधन की भावना के अनुरूप नगर इकाईयों में वास्तविक रूप से एक प्रभावी स्वायत्तता सम्पन्न लोकतंत्रात्मक नगर निकाय स्थापित किये जाने के  संवैधानिक प्रावधानों को लागू किये जाने के विमर्श को धरातल पर ला सकें,  जो अपनी योजनाओं को  बनाने में सक्षम हो, अपना राजस्व संग्रह करें और एक संवैधानिक सरकार की हैसियत को प्राप्त करते हुए राज्य अनुदान पर आश्रित न रह कर, जनता की सीधी सरकार का स्वरुप  प्राप्त करे, जैसा कि 74 वें संविधान संशोधन की मूल भावना है।

नगरों का इतिहास

यद्यपि नगर नियोजन, सार्वजनिक स्नानागार और  अनाज भंडार की अवधारणा ने हड़प्पा के पहली नगरी सभ्यता होने के प्रमाण प्रस्तुत किए हैं, जिसका समय ईसा पूर्व 3000 वर्ष से पहले निधारित किया जाता है। लेकिन चुनी हुए  नगर प्रशासन की दृष्टि से यूनान का स्पार्टा शहर जो ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी में अस्तित्व में था, दुनिया का सर्वाधिक पुराना शहर माना जाता है। इसके बाद एथेंस का जिक्र है। लेकिन एशिया महाद्वीप में पाटलिपुत्र, जोकि ईसा पूर्व 300 पहले से अस्तित्व में था, सबसे पुराना लोकतां​त्रि​क नगर प्रशासन के रूप में जाना जाता है। इस नगर का प्रशासन चुने हुए 30 सदस्यों की 6  समितियों द्वारा संचालित किया जाता था, जिसकी प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे। यह समितियां निम्न प्रकार कार्य देखती थी :

1-औद्योगिक और कलात्मक उत्पादन

2- नागरिकता आब्रजन

3-जन्म मृत्यु पंजीकरण

4-व्यापार तथा वा​णिज्य का विनियमन व करारोपण

5-विनिर्माण निगरानी

6-कर राजस्व संग्रह

एक नगर प्रशासन लोकतंत्र  की जो व्यवस्था मौर्य साम्राज्य में चाणक्य द्धारा स्थापित की गई, वह आज भी दुनिया की श्रेष्ठ नगर व्यवस्थाओं में शामिल है। जहां नगर की तमाम योजनाओं एवं निर्माण का अधिकार चुने हुए समिति के सदस्यों के पास था और राजा का भी इस समिति के कार्यों में सीधा हस्तक्षेप नहीं था।

आधुनिक नगरपालिकाओं का विकास

भारत में सन 1666 में मद्रास रेजीडेंसी नाम से पहली नगरपालिका अस्तित्व में आई. उसके बाद वर्ष 1726 में मुंबई तथा कलकत्ता नगरों के प्रशासन की व्यवस्था बनाई गई। ब्रिटिश शासन  में वर्ष 1916 के अधिनियम द्धारा नगर पालिकाओं को वैधानिक शक्तियां प्रदान की गई, जिसमें संशोधन करते हुए वर्ष 1935 में नगरपालिकाओं को आज की स्थापित नगरपालिकाओ से अधिक अधिकार और स्वायत्तता संपन्न  इकाई बनाया गया, जिसमें उनके द्धारा नगरीय क्षेत्र में निर्माण, कर संग्रह, चिकित्सा व स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर आज की नगरपालिकाओ से अधिक अधिकार संपन्न बनाया गया था ।

ब्रिटिश शासन में स्थापित नगरपालिकाओं की तुलना में आजादी के बाद नगरपालिकाएं दिनोंदिन कमजोर होती गई. उनकी निर्भरता अपनी योजनाओं के निर्माण, राजस्व के संग्रह पर राज्य सरकारों पर अधिक निर्भर हो गई. आर्थिक रूप से कमजोर होने के साथ ही मौजूदा नगर निकाय राज्य सरकार द्धारा दी जाने वाले आर्थिक अनुदान ऊपर निर्भर होती गईं. यहीं से नगर निकायों के लकवाग्रस्त होने की कहानी प्रारंभ हो जाती है।

स्वर्णीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्धारा अपने शासनकाल में ग्राम स्वराज और नगरों की स्वायत्तता के महत्व को गंभीरता से महसूस किया गया,  ताकि अंतिम पायदान तक लोकतंत्र पहुंचे. लोक अपनी बुनियादी आवश्यकताओं का खाका स्वयं खींचे और अपनी निगरानी में अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कार्यों को अंजाम दे सकें।

अन्तिम पायदान पर लोकतंत्र की स्थापना हो, ऐसी व्यवस्था स्थापित किये जाने के उद्देश्य से स्व. राजीव गांधी द्धारा मध्य प्रदेश कैडर के वरिष्ठ आईएएस डॉ ब्रह्मदेव शर्मा, जिनका कि मध्यप्रदेश में आदिवासियों तथा वंचित तबकों के विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है, के सुझाव से भारत मे ऐतिहासिक 73वे- 74वें संविधान संशोधन, जो कि ग्राम स्वराज तथा नगर निकायों की स्वायत्तता से संबंधित है कानून लाने का महत्वपूर्ण निर्णय किया गया। नगर निकायों में जनता की सरकार हो, इसके लिए 74वां संविधान संशोधन जो वर्ष 1992 में लाया गया. इसके लिए संविधान में 12वीं अनुसूची में नगर निकायों के उन 18 कार्यों को परिभाषित किया गया, जोकि एक स्थानीय सरकार को सही मायनों में स्वायत्त सरकार बनाते हैं

महत्वपूर्ण संवैधानिक उपबंध

74 वें संविधान संशोधन में यूं तो विस्तार से नगर प्रशासन के कार्य और दायित्व को परिभाषित किया है, लेकिन संवैधानिक महत्व जिन बिंदुओं को इस में उल्लेखित किया गया है वह निम्न है :

नगर निकाय मे राष्ट्रीय स्तर पर एकरुपता हो।

नगर निकाय केंद्र और राज्य सरकार की भाँति एक सरकार है, जो 6 माह से अधिक समय तक लंबित नहीं रह सकती है. 6 माह के भीतर-भीतर नगर निकायों का चुनाव किया जाना आवश्यक है। अन्यथा यह एक संवैधानिक संकट समझा जाएगा।

नगर निकाय अपनी आर्थिक स्वतंत्रता के लिए सरकार के अनुदान पर निर्भर ना हो, बल्कि राज्य वित्त आयोग में उन्हें उनके हिस्से का अंशदान संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्राप्त अधिकार के रूप मे प्राप्त  हो, जिसे वह अपने चुने हुए सदस्यों द्धारा निर्धारित प्रक्रिया से खर्च करें। प्रत्येक वर्ष 15 मार्च तक निकाय के लिए बजट कर लिया जाय.

वित्त आयोग से प्राप्त अंशदान का उपयोग नगर निकाय अपने क्षेत्र के विकास के लिए कर सकेंगे लेकिन इन आयोगों से प्राप्त धनराशि का उपयोग कर्मचारियों के वेतन भत्ते के रूप में खर्च न किया जाए। नगर निकाय अपनी आवश्यकता के अनुसार क्षेत्र में टैक्स वसूल करने में सक्षम होगी. टैक्स का आधार वैज्ञानिक होगा।

74 वें संविधान संशोधन की जमीनी चुनौती

यद्यपि संशोधन 1992 में पारित हुआ, लेकिन आज तक धरातल में इस संशोधित संविधान संशोधन के अनुरूप किसी भी राज्य सरकार द्धारा अपने नगर निकाय को वैसे स्वतंत्रता एवं आर्थिक स्वायत्तता प्रदान नहीं की, जैसी 74 वें संविधान संशोधन की मंशा है। 74 वें संविधान संशोधन में नगर निकाय जो एक स्थानीय निकाय ना होकर सरकार है जिसे 6 माह से अधिक लंबित नहीं रखा जा सकता, राष्ट्र के आर्थिक संसाधनों के वितरण में ग्राम पंचायत तथा नगर निकाय प्रशासन को एक आयोग द्धारा अनुपातिक रूप से नियम वद्ध करो में हिस्सेदार बनाया जाये, ताकि वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सके जिससे  निर्माण कार्यों तथा योजनाओ के क्रियान्वयन पर उसकी राज्य तथा केंद्र सरकार पर निर्भरता न रहे।

यह अब देखे जाने का वक्त है कि नगर निकायों में नव निर्वाचित  प्रतिनिधि अपने संवैधानिक अधिकारों से कितने परिचित होते हैं। किस रूप में इसे लागू कराने के लिए राज्य सरकार व केंद्र सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब रहते हैं। या सिर्फ खुद को चुने जाने का जश्न मनाते हुए 74 वे संविधान संशोधन की भावना को दफ्न करते ही जाएंगें।

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