नर्क से बदतर हैं उत्तराखण्ड की जेलें


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जय सिंह रावत
February 8, 2018

उन्हें न तो पेट भर कर भोजन मिलता है और न ही व्याधि की स्थिति में उनकी तकलीफों या पीड़ा को कम करने की कोई व्यवस्था है। सजायाफ्ता कैदियों के साथ ऐसे कैदियों को भी रखा जाता है जिनके मामले विचाराधीन हैं। ऐसा करना जेल मेनुअल का खुला उल्लंघन है।

गौतम बुद्ध से लेकर महात्मा गांधी तक सभी महापुरुषों ने समाज को सीख दी थी कि पाप से घृणा करो मगर पापी से नहीं। केवल गौतम बुद्ध और गांधी ही नहीं बल्कि विश्व के सभी पंथों के ग्रंथों में कहा गया है कि मनुष्य को क्षमाशील होना चाहिए। लेकिन जब हम जेलों की हालत देखते हैं तो लगता है कि गौतम बुद्ध और गांधी के इस नीति वाक्य की गूंज स्वतंत्र भारत की लोक कल्याणकारी सरकारों के कानों तक नहीं पहुंची है। जेलों में सजायाफ्ता हो या फिर विचाराधीन, दोनों तरह के बंदियों को भेड़ बकरियों की तरह ठूंसा तो जा ही रहा है, लेकिन साथ ही उन्हें न तो पेट भर कर भोजन मिलता है और न ही व्याधि की स्थिति में उनकी तकलीफों या पीड़ा को कम करने की कोई व्यवस्था है। सजायाफ्ता कैदियों के साथ ऐसे कैदियों को भी रखा जाता है जिनके मामले विचाराधीन हैं। ऐसा करना जेल मेनुअल का खुला उल्लंघन है। मानवाधिकारों का यह खुल्लमखुल्ला उल्लंघन उन पुराने राज्यों की जेलों में तो हो ही रहा है जहां जेलें और जेल व्यवस्था उपनिवेशवादी अंग्रेजी शासन से विरासत में मिलीं थीं लेकिन जेलों की स्थिति उत्तराखण्ड जैसे उन राज्यों में भी मानवीय गरिमा और संवेदनाओं के अनुकूल नहीं है जिनका अस्तित्व स्वतंत्र भारत में मानवाधिकारों की चेतना के इस वैश्विक युग में हुआ है।

उत्तराखण्ड में कुल 13 जिले हैं मगर राज्य में अब तक केवल 7 ही जिला जेलें हैं। इनके अलावा 2 उप कारागार और एक खुली जेल है। महिलाओं के लिये अलग जेल और जेल सुधार के तहत अन्य तरह की जेलों की कल्पना फिलहाल कल्पनातीत ही है। जाहिर है कि 13 जिलों के बंदियों को 7 जिलों में ठूंसेंगे तो जेलों में उपलब्ध मानवीय सुविधाओं पर भारी दबाव पड़ेगा ही। कितनी बड़ी विडम्बना है कि टिहरी रियासत का 1949 में भारत संघ में विलय हो गया और 1960 में बने उत्तरकाशी जिले के बंदियों को अब भी टिहरी जेल में ठूंसा जाता है। नब्बे के दशक में बने रुद्रप्रयाग, चम्पावत और बागेश्वर के बंदी भी पड़ोस की जिला जेलों में ठूंसे जाते हैं। सूचना के अधिकार के तहत मिली एक जानकारी के अनुसार उत्तराखंड की कुल 11 जेलों में 4815 कैदी बंद हैं, जबकि स्वीकृत क्षमता केवल 3378 बन्दियों की है। हल्द्वानी उपकारागार में 260 कैदियों की क्षमता है लेकिन उससे तिगुने से अधिक 804 बंदीजन बंद है। इसमें केवल तीन जेलों को छोड़कर सभी जेलों में स्वीकृत क्षमता से अधिक कैदी बंद है। उपकारागार हल्द्वानी में तो स्वीकृत क्षमता 260 से तिगुने से भी अधिक 804 कैदी बंद है जबकि जिला कारागार देहरादून में स्वीकृत क्षमता 580 के दुगने से अधिक 1169 कैदी बंद है। हरिद्वार जिला जेल में 840 की स्वीकृत  क्षमता की तुलना में 1190 कैदी बंद है। 150 कैदियों की क्षमता वाली जिला कारागार पौड़ी में 153 कैदी बंद है जबकि 71 कैदियों की क्षमता वाली जिला कारागार नैनीताल में 113 कैदी, 102 क्षमता वाली जिला कारागार अल्मोड़ा में 152 कैदी तथा 244 क्षमता वाली उपकारागार रूड़की में 364 कैदी बंद है। 512 कैदियों की क्षमता वाली उत्तराखंड की केन्द्रीय कारागार सितारगंज में 638 कैदी बंद है।

राज्य सरकार के पास बंदीजनों के स्वास्थ्य और उनकी दैहिक तकलीफों के लिये कोई संवेदना नहीं है। राज्य सरकार की ओर से आज भी किसी भी जेल में कोई नियमित डाक्टर तैनात नहीं है। डाक्टर ही क्यों राज्य की जेलों में 15 स्वीकृत पदों में से केवल 7 फार्मासिस्ट तैनात हैं। सन् 2000 में राज्य के गठन के बाद  वर्ष 2016 तक के 16 सालों में राज्य की जेलों में 188 बंदी अपनी जानें गंवा चुके थे। हैरानी का विषय यह है कि इनमें से ज्यादातर कुपोषण के कारण ट्यूबर क्लोसिस (क्षय रोग) से मरे। राज्य की जेलों में टीबी के मरीजों के अलावा एड्स के मरीज भी मौजूद हैं। राज्य गठन के बाद 16 सालों के बाद हरिद्वार जेल में 67 बंदी मर गये। इसी तरह देहरादून की सुद्धोवाला तथा पुरानी जेल में 62, हल्द्वानी की जेल में 32, सितारगंज में 18 और रुड़की जेल में 7 बंदियों की मौत हुयी है।

प्रदेश की जेलों में भरपेट भोजन न मिलने से भी बंदीगण कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। जेल विभाग से मिली एक अन्य सूचना के अनुसार प्रदेश की जेलों में एक बंदी पर सुबह का नाश्ता, दिन का भोजन, चाय और रात के भाजन पर सरकार का 35 से लेकर 40 रुपये तक खर्च होता है। प्रत्येक माह एक बंदी को राशन के अलावा 100 ग्राम टूथपेस्ट कपड़े धोने के लिये 120 ग्राम वजन का साबुन तथा 75 ग्राम नहाने का साबुन दिया जाता है। जाहिर है कि साफ सफाई के प्रति घोर लापरवाही के कारण बंदियों के जीवन से भी खिलवाड़़ किया जा रहा है। हरीश रावत के मुख्यमंत्रित्व काल से सप्ताह में तीन दिन विचाराधीन बंदी को 55 ग्राम और सजायाफ्ता को 70 ग्राम वजन की मंडुवे की रोटी भी दी जाने लगी है।

ऐसी भी अधिकृत जानकारी मिली है कि जो जेलें जिला अदालतों से काफी दूर हैं वहां के विचाराधीन बंदियों को सुबह 10 बजे अदालत पहुँचाने के लिये सुबह 8 या 9 बजे ही गाड़ियों में बिठा दिया जाता है और फिर सायं ढले जेल पहुँचने पर ही उन्हें भोजन नसीब हो पाता है। टिहरी जेल से मिली एक आरटीआइ सूचना के अनुसार एक बंदी को प्रति दिन चाय के लिये 50 ग्राम, नाश्ते के लिये 40 ग्राम तथा दोनों वक्त के भोजन के लिये 525 ग्राम लकड़ी उपलब्ध करायी जाती है। सोमवार से लेकर रविवार तक बंदियों के लिये राशन तय है, जिसमें सेमवार को एक बंदी को 90 ग्राम वजन की पाव रोटी या बन और 45 ग्राम गुड़, भोजन में 45 ग्राम अरहर की दाल सायंकाल के भोजन के लिये भी 45 ग्राम उड़द की दाल दी जाती है। इस राशन में आधा ग्राम मिर्च, 2 ग्राम नमक, 1 ग्राम तेल और 2 ग्राम आमचूर भी दिया जाता है।

बेहद चिन्ता का विषय यह है कि इन मौतों में ज्यादातर क्षय रोगी शामिल हैं। जेलों में पेटभर भोजन और समय से भोजन न मिलने के कारण भी कुपोषण की समस्या खड़ी हो रही है। यही नहीं राज्य की जेलों में एड्स रोगी भी बंद हैं। इन बंदियों से संक्रमण होगा या नहीं, इस बारे में जेल प्रशासन मौन है। जेल प्रषासनों को भी पता नहीं कि बड़ी संख्या में बंद साँस रोगी या टी.बी रोगी कहीं एचआइबी से संक्रमित तो नहीं हैं! सूचना के अािकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार टिहरी जेल में एक कैदी एड्स संक्रमित है जबकि एक अन्य की ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) के कारण फेफड़े के फट जाने से मौत हो चुकी है। टिहरी जेल में ही एक अन्य बंदी गंभीर सांस रोग से पीड़ित है। रुड़की जेल में ट्यूबर क्लोसिस से एक की मौत की पुष्टि हो गयी है और एक अन्य की लीवर सिरोसिस से मौत हुयी है। हल्द्वानी उप करागार में ट्यूबरक्लोसिस से दो कैदी पीड़ित हैं। चमोली के पुरसाड़ी कारागार में एक कैदी मिंटू चौधरी की मौत कैंसर से हुयी है। हरिद्वार जिला कारागार में 67 बंदियों की मौतों के बाद भी 2 कैदी ट्यूबर क्लोसिस से पीड़ित हैं। देहरादून की सिद्धोंवाला जेल में 6 कैदी गंभीर बीमार हैं जिन्हें मुक्त करने के लिये जेल प्रषासन ने भी षासन से मांग की है। सितारगंज स्थित सम्पूर्णानन्द खुली जेल में भी 2 कैदी ट्यूबर क्लोसिस से पीड़ित हैं।

 

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जय सिंह रावत

देहरादून निवासी 63 वर्षीय जय सिंह रावत अनेक अखबारों में काम कर चुकने के बाद अब स्वतंत्र पत्रकारिता और स्फुट लेखन कर रहे हैं. 'स्वाधीनता आन्दोलन में उत्तराखंड की पत्रकारिता' उनके द्वारा लिखित एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है.