मूर्तियों में आतंक


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जितेन्द्र भट्ट
March 8, 2018

मूर्तियों में जो थोड़ा बुजुर्ग थीं, उनके पास ऐसे हालात का अनुभव था। लेकिन आधुनिक भारत के इतिहास की तरह नौजवान मूर्तियों ने बुजुर्ग मूर्तियों को मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा बना दिया था। कालांतर में नौजवान मूर्तियों का बुजुर्ग मूर्तियों से संवाद कम होता गया।

वो बहुत बुरा दिन था। मूर्तियां बहुत घबरा गयी थीं।

चौबीस घंटे में चार मूर्तियों के टूटने की सूचना ने बची हुई मूर्तियों को परेशान कर दिया। हैरान करने वाली बात ये थी कि सभी जात, पंथ और विचारधारा की मूर्तियों पर हमले हो रहे थे। लेफ्ट से लेकर राइट तक। दक्षिण से लेकर उत्तर तक मूर्ति टूटी। कुल मिलाकर घटनाक्रम ऐसा था कि कभी भी, कहीं भी और किसी की भी मूर्ति पर आक्रमण हो सकता है। ऐसे खतरनाक हालात के बारे में सोचकर मूर्तियों की आत्मा हिल गई।

ऐसा मूर्तियों के आधुनिक इतिहास में बहुत कम हुआ था। विरोधियों के हाथ एक दूसरे को निशाना बनाते बनाते मूर्तियों के गले तक पहुंच गए थे। मूर्तियों में जो थोड़ा बुजुर्ग थीं, उनके पास ऐसे हालात का अनुभव था। लेकिन आधुनिक भारत के इतिहास की तरह नौजवान मूर्तियों ने बुजुर्ग मूर्तियों को मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा बना दिया था। कालांतर में नौजवान मूर्तियों का बुजुर्ग मूर्तियों से संवाद कम होता गया। नौजवान मूर्तियों को लगता था कि अगर उन्होंने बुजुर्ग मूर्तियों से कोई सलाह ली, तो कहीं वो इसका क्रेडिट न ले लें। इसलिए बुजुर्गों को करीब करीब कोने की तरफ धकेल दिया गया था।

वैसे सभी प्रकार की मूर्तियों की स्थिति सोशल मीडिया पर उस स्टेट्स जैसी हो गयी थी। जिन्हें लोग बिना जाने, बिना समझे लाइक किए जा रहे थे। ये भी कह सकते हैं कि मूर्तियां छब्बीस जनवरी जैसी थीं। उनकी जिंदगी में चहल पहल खास दिनों में ही होती थी। खैर।

बुजुर्ग मूर्तियां इन बातों को समझती थीं। लेकिन कहती नहीं थीं। कहती भी,  तो कौन सुनता? शायद इसी बात ने उन्हें मौन कर दिया था।

राज्य में चुनाव तो होते ही रहते थे। हार जीत पर कभी कबार खून खच्चड़ भी हुआ। मूर्तियों ने अपनी आंखों से ये सब देखा था। लेकिन आज तक हिंसा की आग उनकी नाक तक नहीं पहुंची। मूर्तियां अक्सर देखा करती थीं कि विरोधी एक दूसरे का खून बहाते हैं। फिर कुछ दिन धरना प्रदर्शन करते हैं। पैदल मार्च। कैंडल मार्च। राज्यपाल को मेमोरेंडम। राष्ट्रपति को मेमोरेंडम। और अंत में जांच आयोग। फिर इन क्रियाकलापों में पांच साल निकल जाते।

इस हिंसा के बीच मूर्तियों को कभी ख्याल नहीं आया कि हिंसक भीड़ को रोका जाए। कहा जाए, भाई ये सब क्यों कर रहे हो? सच बात तो ये है कि मूर्तियां ये सोचकर चुप रहीं कि दूसरे के फटे में टांग कौन अड़ाए। दूसरे के पंगे में क्यों सिर खपाना? तो इस तरह मूर्तियों की जिंदगी ठीक ठाक कट रही थी।

लेकिन मुश्किलें बता कर थोड़े ही आती हैं। ऐसा ही इनके साथ भी हुआ। एक मनहूस दिन विरोधी खेमे ने लेनिन की मूर्ति तोड़ दी। मूर्ति की कोई गलती नहीं थी। मूर्ति ने विरोधी खेमे को कभी चुनाव जीतने से नहीं रोका। यहां तक कि मूर्ति ने विरोधियों को धरना प्रदर्शन करने से भी नहीं रोका। पांच साल की मासूम उम्र थी, लेनिन की इस मूर्ति की। विरोधी इस मासूम मूर्ति के सामने तरह तरह के नारे लगाते, मूर्ति चुपचाप सुनती रहती। शायद मूर्ति का रिएक्ट न करना ही इसपर भारी पड़ा।
मूर्तियाँ फिर भी सह लेती। मूर्ति तोड़ यहीं रुक जाते, तो शायद मूर्तियां परेशान न होती। लेकिन मूर्ति टूटने का सिलसिला रुका नहीं। पहली मूर्ति टूटने के चौबीस घंटे के अंदर चार मूर्तियां तोड़ दी गयी। लेनिन की मूर्ति के साथ हादसा नॉर्थ ईस्ट में हुआ। साउथ में पेरियार की मूर्ति पर हथौड़े मारे गए। अगली सुबह श्यामा प्रसाद मुखर्जी और फिर बाबा साहब अंबेडकर मूर्ति पर हमला हुआ।

घटनाक्रम तेजी से बदल रहा था। हर मूर्ति को अपने सिर पर मंडराते खतरे के बारे में सोचकर चिंता हो रही थी। मूर्तियों के दिन का चैन और रातों की नींद उड़ गयी। कंधे और कान तक हालात मुश्किल हो गए। नौजवान मूर्तियों को समझ ही नहीं आ रहा था कि इस नई परिस्थिति का सामना कैसे किया जाए?

मूर्तियों ने विचार विमर्श के बाद तय किया कि इस विकट मुश्किल हालात का हल निकालना किसी एक के बस की बात नहीं है। बात खुद पर बन आई थी, सो नौजवान मूर्तियों ने इगो किनारे रखकर बुजुर्ग मूर्तियों को मीटिंग के लिए बुलाया। मार्गदर्शक मंडल से भी आग्रह किया कि वो मीटिंग में आकर मुश्किल भरे वक्त में अपने अनुभव साझा करें। ताकि नौजवान मूर्तियों के सामन खड़े संकट का मुकाबला मिलकर किया जा सके।

पहले से तय कार्यक्रम के हिसाब से मीटिंग हुई। कई घंटों के संवाद और मार्गदर्शक मंडल के सुझावों के बाद डिसाइड किया गया कि मूर्तियों का एक डेलिगेशन वाम मोर्चे को एक मेमोरेंडम देने जाएगा। एक डेलिगेशन राइट विंग वालों को मेमोरेंडम सौंपेगा। अनुरोध किया जाएगा कि दोनों पक्ष मासूम मूर्तियों को निशाना बनाना बंद करें। क्योंकि मूर्तियां किसी भी विचारधारा के आड़े नहीं आ रही हैं। इसलिए मानवता को ध्यान में रखकर मूर्तियों के साथ हिंसा से बचा जाए। ये भी तय किया गया कि तोड़ी गयी मूर्तियों को शहीद का दर्जा देने की मांग की जाएगी। और तोड़ी गयी मूर्तियों की याद में नई और पहले से ज्यादा ऊंची मूर्तियां बनाई जाएं।

 

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जितेन्द्र भट्ट

जितेन्द्र भट्ट ने नैनीताल समाचार से पत्रकारिता शुरू करने के उपरान्त पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की. आजकल एक टीवी न्यूज़ चैनल में काम करते हैं.