मेरी यादों का नैनीताल


mm
विश्वम्भर नाथ साह 'सखा'
February 2, 2018

उगते सूरज से चाइना पीक, केमल्स बैक, डाॅर्थी सीट, टीफन टाॅप व स्नोव्यू की चोटियां सुनहरी चमकती हुई । उनका अक्स स्थिर जल की सतह पर एक हल्की स्वर्णिम आभा लिये हुए। बीच-बीच में उछाल लेती महाशीर मछलियों द्वारा उत्पन्न चक्राकार अनेक लहरें एक स्वप्निल लोक का सृजन करती हुई कितनी मनोहारी प्रतीत होती हैं

नैनीताल तीन तरफ से घिरा, एक ओर खुला हिस्सा, तराई भाबर की दृश्यावली को खोलता हुआ सा, और बीच में आँख का स्वरुप लिये हुए विस्तृत झील। सुबह-सुबह अलसाई हुई सी। उगते सूरज से चाइना पीक, केमल्स बैक, डाॅर्थी सीट, टीफन टाॅप व स्नोव्यू की चोटियां सुनहरी चमकती हुई । उनका अक्स स्थिर जल की सतह पर एक हल्की स्वर्णिम आभा लिये हुए। बीच-बीच में उछाल लेती महाशीर मछलियों द्वारा उत्पन्न चक्राकार अनेक लहरें एक स्वप्निल लोक का सृजन करती हुई कितनी मनोहारी प्रतीत होती हैं। इसका अनुभव देख कर ही किया जा सकता है।

तीनों पहाड़ियों के ढलानों पर सुरई, देवदार व बाँज के सघन वन क्षेत्र और उनके मध्य छिटके हुए कोठी बँगले और उनका प्रतिबिम्ब लिये हुए पूरे लैण्डस्केप का कैनवास जब सामने आता है तो मन अदृश्य से परीलोक में विचरण करने को आतुर हो जाता था। परिदृश्य की स्थिति तो पूर्ववत है परन्तु कंकरीट के सघन भवनों के निर्माण, वनों वृक्षों के विनाश ने कोबाल्ट ब्ल्यू व प्रशियन ग्रीन के शेडों को समाप्त कर दिया हैै। परन्तु हाँ, प्रकृति के इस अद्भुत स्वरूप के एक अंग के पक्षाघात के बाद भी एक दिव्य छटा दृष्टिगोचर होती है। अपने ढुनुक-मुनुक वाले मौसमी मिजाज की प्रसिद्धि को लिये हुए भी अपने अपने अस्तित्व का बोध कराने में समर्थ है।

पिछले साल नैनीताल का सरोवर घटते जल स्तर के कारण चर्चा में रहा। 20-21 फीट पानी के स्तर का गिरना निश्चित ही चिन्ता का सबब बना। नालों के मुहानों में विस्तृत डेल्टा उभर आये। उनके बीच में शिवलिंग की तरह उभरे चट्टानों के शीर्ष भी उभर आये और लोग हैरत में कि कही तलहटी में छेद तो नहीं हो गया। पर्यावरणविदों, भू वैज्ञानिकों ने कहा कि जलागम क्षेत्रों को मानव कर्मों व उसके लालच ने तबाह कर दिया। सामाजिक विज्ञान के जानकारों ने कहा कि नैनीताल शहर की अपनी वाहन क्षमता से अधिक पर्यटकों के हजूमों के आने का यह दुष्परिणाम है। मैं समझता हूँ कि आधुनिक जीवन शैली का भी इस दिशा में अपना योगदान रहा है। आधुनिक शौचालय, फ्लश व सीवर व्यवस्था, स्नानागारों आधुनिक स्वरूप व उपकरण, वाशिंग मशीनें इत्यादि में जल बहुतायत से प्रयोग होता है। ऊपर से नगर क्षेत्र में बिखरे ऊपरी व निचले क्षेत्रों में कूड़े के ढेर। बरसाती नालों में एकत्रित जैव व अजैविक कूडे़ के ढेर। सफाई व उठान का मनमौजी प्रबन्धन, कोई समयबद्ध अनुशासित व्यवस्था का तंत्र नहीं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता व जो लोक तंत्र का प्रत्यक्ष स्वरूप न देखने वाला, न सुनने वाला और न करने वाला।

आज मेरी उम्र 84 साल की है। अगर मैं कहूँ कि मनुष्य की समझ लिये हुए भोगे गये, देखे गये परिवर्तनों को स्मृति में रख पाने की क्षमता क्या 10 वर्षों से हो जाती है ? तब नैनीताल के जीवन की क्रमबद्ध वहनीयता चलचित्र की भांति मन मस्तिष्क के पर्दे पर उभरती और ओझल होती रहती है और यही स्मृति की आँखमिचौली  की क्रीड़ा है। घाटी (नैनीताल-हल्द्वानी मार्ग) के बाईं ओर से एक पैदल मार्ग मनोरा गाँव को जाता था। जो आज भी है। परन्तु टूटता रहता है। इस मार्ग के ऊपर पहाड़ी में बाँज के छिटपुट पेड़ थे। उनके मध्य जैन मुनि की कुटिया थी, जो कहा जाता है कि सिन्धी थे। उनके निकट ही शीतला देवी का मन्दिर था। यह दोनों आज भी वहीं हैं। तब वहाँ  वेधशाला नहीं थी। सम्पूर्ण पर्वत चोटी क्षेत्र व ढलान में शिशुओं व प्लेग से मरे आदमियों को दफनाया जाता था। सुना था कि नैनीताल में यह महामारी हुई थी और ताकुला क्षेत्र में अस्पताल बनाया गया था। परन्तु वर्ष 1952-55 के बीच हनुमानगढ़ी नाम से हनुमान मन्दिर की स्थापना नीमकरौली नाम से ज्ञात एक साधु द्वारा की गई। वहाँ तक मोटर मार्ग की व्यवस्था की गई।

इस से पहले लद्दाखी व पेशावरी पठान बजरी खोद कर अपने खच्चरों से शहर की आपूर्ति करते थे। उससे पहले घाटी की दूसरी तरफ आगे की ओर ठीक राज्यपाल भवन की झण्डी धार के नीचे चूने की भट्टियां थीं। साथ ही बजरी की कई खानें निरन्तर खुदान और आपूर्ति में सक्रिय रहती थी। नैनीताल के जितने भी भवन व कोठी बंगले हैं वे सभी घाटी की बजरी व घाटी व धारा पत्थर की चूने की भट्टियों द्वारा निर्मित चूने व सुर्खी द्वारा निर्मित हैं। सुर्खी भट्टी से निकाले गये चूने व बजरी को भारी व बड़े दो पत्थर के पाटों में चक्की की तरह पीस कर एक मुलायम मिट्टी की तरह प्रयोग में लायी जाती थी। यह पिष्ठी बैजों द्वारा निर्मित विशाल पत्थर के पाटों को चक्की की तरह घुमा कर बनाई जाती थी। मेरे नाना ठेकेदार थे। उन्होंने नैनीताल में कई निर्माण कार्य किये। उन्होंने मुझे बताया और उस पाट को दिखाया था, जो उन्होंने प्रयोग में लिया। वह पत्थर का पाट आज भी परमा शिवलाल शाह धर्मशाला से आगे क्लर्क क्वाटर के पास नैनीताल मोटर मार्ग के पास बाँई ओर पड़ा हैं। बजरी खुदान अधिक होने के कारण राजभवन का पहाड़ धँसने लगा। इसलिये इसे 1960-70 के आसपास यहाँ खुदान वर्जित कर दिया गया।

पहले नैनीताल आने के लिये काठगोदाम से वीरभट्टी तक सड़क बनी थी। इसके द्वारा घोड़ा, खच्चर, बैलगाड़ी व तांगे से सामान व लोगों की आवत-जावत रहती थी। वीरभट्टी से तल्लीताल वर्तमान में परमा शिवलाल साह धर्मशाला तक एक मार्ग था, जो आज भी है। इस मार्ग में यात्रियों के रुकने के लिये कुछ आवास थे जिन्हें ‘रईस होटल’ के रूप में जाना जाता था। ये भवन आज भी हं,ै  परन्तु भू स्खलन के कारण लगभग ध्वस्त हो चुके हैं। इसी मार्ग से संलग्न भूक्षेत्र में दुर्गापुर व श्री कृष्णापुर स्टेेट निर्मित हुए, जिनमें बड़ें नवाब, राजा रजवाडे नवाब ठहरते थे। कृष्णापुर में नवाब रामपुर रुकते थे। दुर्गापुर में आज प्रेमा जगाती महाविद्यालय है। दुर्गापुर को श्री दुर्गा शाह रईस ने बसाया था। इसकी अतिरिक्त भूमि में अब आवासीय भवन बन गये है। कृष्णापुर को कृष्णा शाह ने बसाया था। इसके जिस भवन में नवाब रामपुर रहते थे, आज कुमाऊँ विश्वविद्यालय के अधीन है। अन्य स्थान आवासीय बन चुका है। गुफा महादेव व नैनीताल कारागार पूर्ववत हंै। 7 धारों वाला प्राकृतिक जलस्रोतों वाला सिपाही धारा पूर्ववत है।

नया बाजार व मल्लीताल बाजार पूर्ववत हैं। परन्तु आधुनिक जीवन की माँग के अनुसार वहाँ दोमंजिले मकानों की जगह बहुमंजिले भवनों का निर्माण हो चुका है। यही हाल पिछाड़ी बाजार का भी हैं। कसाई खाने की स्थिति पूर्ववत है। मस्जिद व आवासीय भवनों का व्यापक स्तर पर नव निर्माण हो चुका है। कसाई खाने के वधस्थल का का निचला भाग ध्वस्त हो चुका है। कसाई खाने का निचला हिस्सा जो ढलान लिये हुए था, वहाँ से मरे हुए जानवरों, घोड़ों व खच्चरों को लुढ़काया जाता था। बहुत नीचे एक चबूतरा बना था, जिसके चारों ओर लोहे की पेलिंग लगी थी। लुढ़क कर आये जानवर इसी में रुकते थे। यह क्षेत्र गिद्धों का अड्डा था। वहीं इन्हें आहार प्राप्त होता था। आज सब चीजें लुप्त हो चुकी हैं। गिद्ध भी गायब हैं। अलबत्ता वहाँ पौधारोपण के कारण वृक्ष कुंज उभर आया है। उस खड्ड के ऊपरी ढलान में अवैध भवन निर्माण हो चुका है, जो एक चमत्कार सा है, साथ ही मानव दुस्साहस का ज्वलन्त उदाहरण भी।

बलिया नाले की गत खराब है। इसके किनारे स्थित धोबीघाट का फैलाव सिमट कर मात्र 3 या 4 पानी की  डिग्गियों तक रह गया है। बाकी सारा क्षेत्र कच्चे-पक्के मकानों से घिर चुका है। कितने वैध हैं और कितने अवैध, यह कोई नहीं जानता। सब भगवान के भरोसे है। पुराना सार्वजनिक शौचालय आज भी है, पर परिवर्तित रूप में खड़ा है। लकड़ी टाल आज भी है। इसके ऊपरी छोर पर टैक्सी स्टैण्ड बन चुका है। नैनीताल की पहचान बन चुका डाकखाना आज भी अपने पूर्ववर्ती वस्तुकला को प्रतिबिम्बित करता खड़ा है। उसके नीचे पानी निकासी के लिये बने 5 डाँठ पूर्ववत हैं। परन्तु निचला भाग आर.सी.सी., कंक्रीट व लिन्टर से नवनिर्मित गाड़ियों के पार्किंग स्थल व रोडवेज स्टेशन के रूप में परिवर्तित हो चुका है। लिन्टर के नीचे बडे़ व्यास व आकार के पाईप लगा दिये गये हंै, जिनमें वक्त-बेवक्त तालाब का पानी छोड़ा जा सके। नैनीताल भवाली सड़क जो कि संलग्न क्षेत्र से जुड़ी है, में छावनी पालिका द्वारा निर्मित बाजार व पयर्टक अतिथि भवनों का निर्माण इसे चुका हैं। 80 वर्ष पुरानी ‘नैनी हेयर सैलून’ पूर्ववत् ही है। परन्तु अन्य व्यापारिक गतिविधियों के लिये नई-नई दुकाने व रेस्टोरेन्ट खुल गये हंै। पूर्व में इस बाजार में अधिकांशतः झटके व हलाल की मांस की दुकानें, अण्डा-मुर्गी व आटा-चावल की दुकानें ही हुआ करती थीं, वह भी बहुत सीमित संख्या में। उससे आगे भव्य होटल निर्मित हो गये हैं। बाकी हिस्से में पूर्ववत् ही सेना के आवास, बैरकें, कार्यालय इत्यादि हैं।

(जारी है)

mm
विश्वम्भर नाथ साह 'सखा'

84 वर्षीय विश्वम्भर नाथ साह 'सखा' बहुआयामी व्यक्तित्व हैं. एक प्रशिक्षित चित्रकार होने के साथ वे संगीत, रंगमंच, फिल्म, राजनीति और समाज सेवा में भी सक्रिय रहे हैं.