विज्ञान के मनोहरश्याम जोशी 


mm
देवेन्द्र मेवाड़ी
August 10, 2018

9 अगस्त प्रसिद्ध लेखक मनोहरश्याम जोशी जी का जन्मदिन है। विज्ञान लेखकों की जिस पीढ़ी ने सन् साठ-सत्तर में लोकप्रिय पत्रिका ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में लिखा, उन्हें उनकी यह बात शायद आज भी अच्छी तरह याद होगी कि जटिल विज्ञान भी पठनीय हो सकता है बशर्ते उसे अच्छी तरह समझ-बूझ कर सरल-सहज भाषा और रोचक शैली में लिखा जाए। उन्होंने हिंदी विज्ञान लेखन को ऐसी ही साहित्यिक सरसता के साथ आगे बढ़ाने में भरपूर योगदान दिया और इस बात को सुनिश्चित किया कि सरसता में भी विज्ञान बना रहे। उन्होंने उस दौर के हिंदी विज्ञान लेखकों की पूरी पीढ़ी को पठनीय विज्ञान लिखने के लिए प्रोत्साहित किया और उनकी रचनाओं में अपने चकित कर देने वाले चुनिंदा शीर्षक जड़ कर पाठकों को विज्ञान पढ़ने के लिए प्रेरित किया। विज्ञान के हर छपे हुए लेख पर उनकी छाप होती थी। यही कारण था कि साठ और सत्तर के उन दशकों में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ का विज्ञान कथा-कहानी-सा रोचक और पठनीय विज्ञान बन गया था। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की हर वैज्ञानिक हलचल पठनीय रूप में पाठकों को मिलने लगी थी और वे इस तरह के नए विज्ञान लेखन के लिए हम जैसे नए विज्ञान लेखकों को लेखन की दीक्षा दे रहे थे। ऐसे थे वे हम विज्ञान लेखकों के संपादक मनोहर श्याम जोशी जिनकी अब केवल स्मृति शेष है।

‘कुरू-कुरू स्वाहा’, ‘कसप’ ‘क्याप’ तथा ‘हमजाद’ जैसे गंभीर उपन्यासों के रचयिता, साहित्य अकादमी से सम्मानित साहित्यकार और ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’, ‘हमराही’ तथा ‘गाथा’ जैसे अपने बहुचर्चित दूरदर्शन धारावाहिकों से करोड़ों लोगों की प्रशंसा पाने वाले बहुपठित बहुश्रुत मनोहर श्याम जोशी विज्ञान में गहरी रूचि रखते थे। वे हर नई वैज्ञानिक उपलब्धि की जानकारी अपने पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास करते थे। उनके लिए कहा जाता था कि लोकप्रिय विज्ञान के क्षेत्र की कोई भी बहु चर्चित पुस्तक उनके पास मिलेगी और वे उसे पढ़ चुके होंगे। ‘द डबल हेलिक्स’ पुस्तक के साथ यही हुआ। डी. एन. ए. के खोजकर्ता जेम्स वाटसन, फ्रैंसिस क्रिक और मौरिस विल्किंस को 1962 में शरीर क्रिया विज्ञान (चिकित्सा) का नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। 1968 में न्यूयार्क में जेम्स वाटसन की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द डबल हेलिक्स’ प्रकाशित हुई तो जोशी जी पढ़ने के लिए बेचैन! वरिष्ठ विज्ञान लेखक कैलाश साह ने एक दिन बताया- ‘जोशी जी के पास ‘द डबल हेलिक्स’ आ चुकी है और वे पढ़ चुके हैं। उनके जरिए हम भी ‘द डबल हेलिक्स’ के दर्शन कर सके। लेकिन, हिंदी के पाठक को डी. एन. ए. के बारे में कैसे पता लगे? तो, संपादक मनोहर श्याम जोशी ने डी. एन. ए. की खोज कथा और उस खोज की भावी संभावनाओं के बारे में तत्काल अपने पाठकों के लिए स्वयं लिखा। इसी प्रकार अनेक ज्वलंत वैज्ञानिक विषयों पर वे यदा-कदा लिखते रहते थे।

अपनी पत्रिका में सामायिक विषयों पर विज्ञान संबंधी लेख लिखने के लिए वे विज्ञान लेखकों से आग्रह भी करते थे। 1968 में मैक्सिको में आयोजित ओलंपिक खेलों के अवसर पर अचानक उनका फोन आया- ‘खेलों में शारीरिक क्रियाओं पर जो प्रभाव पड़ता है उस पर लेख भेजो।’ तो, शरीर पर खेलों के दबावों-तनावों पर लेख भेजा और आगामी अंक में ‘खेल में दर्दे दिल गुनाह होता है’ जड़े शीर्षक के साथ अपना लेख पढ़ कर दिल बाग-बाग हो गया।

जनवरी 1969 का तीसरा सप्ताह रहा होगा। मैं पूसा इंस्टीट्यूट में अनुसंधान कार्य से जुड़ा हुआ था। फोन पर उन्होंने गांधी शताब्दी पर फरवरी प्रथम सप्ताह में प्रकाश्य अंक के लिए वैज्ञानिक लेख भेजने को कहा। मैं चौंका- गांधी जन्म शताब्दी और विज्ञान? उनसे कहा तो बोले, ‘क्यों, विज्ञान में अहिंसा पर लिखो। जे. बी. एस. हाल्डेन के विचार दो’। हाल्डेन की पुस्तकें खोजीं। उन्हें पढ़ा और लिखा। उस महान वैज्ञानिक से मेरा वही पहला परिचय था। उन्हें पढ़ कर पता लगा कि स्वाभिमान के साथ व्यक्ति कैसे जी सकता है। यह भी तभी पता लगा कि जे. बी. एस. हाल्डेन वैज्ञानिक ही नहीं सिद्धहस्त विज्ञान लेखक भी थे

mm
देवेन्द्र मेवाड़ी

देवेन्द्र मेवाड़ी हिन्दी विज्ञान साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं. उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. हाल ही में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा उन्हें 'विज्ञान भूषण' से सम्मानित किया गया.