महत्वपूर्ण घटना है किम और ट्रम्प के बीच समझौता


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राजीव लोचन साह
June 18, 2018

यह घटना रेखांकित करती है कि इस तनावग्रस्त और उन्माद से भरी दुनिया में अभी भी विवेक के लिये कुछ स्थान बचा हुआ है। एक परमाणु युद्ध की आशंका से हम फिलहाल बाहर निकल आये हैं, मगर इससे भी आगे इसने एक उम्मीद को मजबूत किया है। डोनाल्ड ट्रम्प और किम जोन उंग, दोनों की छवि कट्टर, बददिमाग और अड़ियल नेताओं की रही है। इन दोनों का, भले ही परस्पर अविश्वास के साथ, एक मेज पर साथ-साथ बैठ जाना ही बड़ी बात है। यह मान लेना तो खामख्याली होगी कि यह समझौता चिरस्थायी और मजबूत रहेगा…

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उत्तरी कोरिया के नेता किम जोन उंग के बीच सिंगापुर में हुआ समझौता, जिसके अनुसार अमेरिका और उत्तरी कोरिया के बीच उकसाने वाली घटनायें रोकी जायेंगी; अमेरिका उत्तरी कोरिया पर लगाये प्रतिबन्ध खत्म करेगा और उत्तरी कोरिया अपने मिसाइल परीक्षण क्षेत्र को खत्म करेगा; एक बड़ी घटना है। यह घटना रेखांकित करती है कि इस तनावग्रस्त और उन्माद से भरी दुनिया में अभी भी विवेक के लिये कुछ स्थान बचा हुआ है। एक परमाणु युद्ध की आशंका से हम फिलहाल बाहर निकल आये हैं, मगर इससे भी आगे इसने एक उम्मीद को मजबूत किया है। डोनाल्ड ट्रम्प और किम जोन उंग, दोनों की छवि कट्टर, बददिमाग और अड़ियल नेताओं की रही है। इन दोनों का, भले ही परस्पर अविश्वास के साथ, एक मेज पर साथ-साथ बैठ जाना ही बड़ी बात है। यह मान लेना तो खामख्याली होगी कि यह समझौता चिरस्थायी और मजबूत रहेगा। दो-दो विश्व युद्धों के अनुभव हमें बताते हैं कि ऐसे समझौते होते भी हैं और टूटते भी हैं। दीर्घकालीन कूटनीतिक फायदे लेने के लिये ये समझौते किये जाते हैं। मगर परमाणु अस्त्रों से लदी हुई दुनिया में ट्रम्प और किम को तो यह मालूम ही होगा कि अब की हुई कोई छोटी सी चूक हमारे ग्रह के लिये विनाशकारी होगी। इस समझौते के बाद हम अपने पड़ौसी देशों के साथ आ जाते हैं। जब हजारों किमी. की दूरी पर अवस्थित दो दुश्मन राष्ट्र, जिनकी भाषा-संस्कृति सब एक दूसरे से पूरी तरह अलहदा है तो भारत और पाकिस्तान, जिनका एक साझा अतीत और साझी संस्कृति रही है, क्यों खुले मन से एक दूसरे से बातचीत नहीं कर सकते ? दोनों देशों की जनता में जबर्दस्ती जो मनोमालिन्य बढ़ाया जा रहा है, वह किसी के भी हित में नहीं है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इतनी बुरी तरह चरमरा गई है कि उसका एक रुपया भारत के पचास पैसे के बराबर आ गया है और भारत के हाल तो हम जानते ही हैं। ऐसे में हम मिलजुल कर एक दूसरे की मदद ही कर सकते हैं।

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राजीव लोचन साह