महिला शौचालय शिक्षा और स्वास्थ्य का मुद्दा है


नैनीताल समाचार
March 8, 2018

गायत्री आर्य 

स्कूल में शौचालय न होने के कारण, बहुत सारी लड़कियां आठवीं कक्षा तक आते-आते स्कूल छोड़ने पर बाध्य हो जाती हैं. इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट में सामने आया था, कि गांवों में लगभग 28 प्रतिशत लड़कियां पीरियड्स के दिनों में स्कूल ही नहीं जातीं.

हाल ही में बिहार की एक दलित महिला रुनकी देवी ने अपना मंगलसूत्र बेचकर घर में शौचालय बनवाने की नज़ीर पेश की. यह घटना इशारा करती है कि तमाम सफाई अभियानों और शौचालय निर्माण की योजनाओं के बावजूद आज भी गांवों में शौचालय की समस्या बहुत बड़ी है. कुछ समय पहले वाटरएड नामक एनजीओ की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि भारत में 35 करोड़ 50 लाख महिलाओं और लड़कियों को शौचालय मयस्सर नहीं हैं.

‘द स्टेट ऑफ वर्ल्डस टायलेट 2017’ नामक इस रिपोर्ट में कहा गया था कि पूरी दुनिया में भारत में सबसे कम लोगों के पास शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध है. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत की 73 करोड़ 20 लाख आबादी आज भी शौचालयों की पहुंच से दूर है. हालांकि सरकार का कहना है, कि 2014 में शुरू हुए स्वच्छता मिशन के तहत गांवों में 52 करोड़ शौचालयों का निर्माण कराया गया है.

यह विडम्बना ही है कि भारत में शौचालय निर्माण को अभी भी सिर्फ स्वच्छता अभियान से जोड़कर ही देखा जाता है न कि स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरत से, जबकि असल में शौचालयों की जरूरत और अहमियत, सिर्फ साफ-सफाई तक ही सीमित नहीं है. खासतौर से महिलाओं के लिए शौचालय उनके स्वास्थ्य और शिक्षा के स्तर को भी सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं. स्कूलों में शौचालय न होने के कारण अक्सर ही लड़कियों को सात-आठ घंटे पेशाब रोकना पड़ता है. या फिर वे बहुत कम पानी पीकर काम चलाती हैं. इस कारण किडनी, पेशाब संबंधी इंफेक्शन या फिर प्रजनन संबंधी बीमारियां होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है.

स्कूल में शौचालय न होने के कारण, बहुत सारी लड़कियां आठवीं कक्षा तक आते-आते स्कूल छोड़ने पर बाध्य हो जाती हैं. इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट में सामने आया था, कि गांवों में लगभग 28 प्रतिशत लड़कियां पीरियड्स के दिनों में स्कूल ही नहीं जातीं. इसका प्रमुख कारण स्कूलों में शौचालय का न होना है. कुछ समय पहले प्रथम नाम के एक एनजीओ की रिपोर्ट में सामने आया था कि देश में चल रहे कुल स्कूलों में 74 प्रतिशत सरकारी हैं. इनमें से 47 प्रतिशत स्कूलों में आज तक लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है.

इसी तरह गांवों में भी महिलाएं घर में शौचालय न होने के कारण मुंह अंधेरे सुबह और मुंह अंधेरे शाम को ही खेतों में जा पाती हैं. दिन के किसी अन्य समय पर शौचालय जाने की जरूरत महसूस होना उन महिलाओं के लिए बड़ी समस्या है. बहुत सारे सरकारी या निजी स्कूलों में आज भी महिला अध्यापिकाओं के लिए अलग से शौचालयों की व्यवस्था नहीं है. यहां तक कि बड़े शहरों में भी छोटे संस्थानों या दफ्तरों में काम करने वाली लड़कियों/महिलाओं के लिए भी अक्सर ही कोई शौचालय नहीं होता.

महिलाओं के लिए सार्वजनिक जगहों पर इतने कम शौचालयों का होना समाज और सरकार दोनों की उनके प्रति असंवेदनशीलता की तरफ साफ इशारा करता है. महिला सशक्तिकरण की दिशा में सबसे जरूरी व ठोस प्रयास, महिलाओं की बुनियादी जरूरतों को समझना और उन पर काम करना है. निजी और सार्वजनिक जगहों पर शौचालयों का निर्माण उनकी बुनियादी जरूरतों में से एक है.

लंबे समय तक शौचालयों के नियमित प्रयोग के लिए उनकी साफ-सफाई और देखभाल भी उतना ही महत्वपूर्ण पक्ष है, जितना कि उनका निर्माण. सरकार और ग्रामीण व शहरी प्रशासन दोनों को समझना होगा कि महिलाओं के लिए शौचालय निर्माण सिर्फ स्वच्छता का मसला भर नहीं है. इससे उनके निजी और सार्वजनिक दोनों जीवन पर बहुत गहरा असर पड़ता है. महिला स्वास्थ्य और शिक्षा को ध्यान में रखते हुए भी घरों, स्कूलों, ऑफिसों और सार्वजनिक जगहों में शौचालयों के निर्माण में, सरकार और समाज को युद्धस्तर पर एक मिली-जुली पहल करने की सख्त जरूरत है.

गायत्री आर्य का यह लेख www.satyagrah.in से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.

 

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