महानगर का कूढ़ा और महानेता


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पृथ्वी 'लक्ष्मी' राज सिंह
August 7, 2018
इस गंदगी में जानवरों का भी पूरा साम्राज्य फैला है। मैं जब भी इन्हें भगाता हूँ माननीय की निन्द्रा टूटती है… 
आपने महानगर देखा है! उसके आगे पीछे कूड़े का बड़ा ढेर होता है। ऐसे ही एक महानगर में ऐसे ही किसी कूड़े के ढेर में एक महानेता कुछ तलाश रहे हैं।
इसका कूड़ा उतना कूड़ा नहीं है जितना रद्दी है इसमें चुनावी घोषणा पत्र हैं, फरियादें हैं, फाइलें हैं। यह थोड़ा थोड़ा कब्रिस्तान है जिसमें दफन हैं तख्तियां उद्घाटनों की, शिलान्यासों के पत्थर, महानायकों की मूर्तियां।
माननीय बहुत बेचैन हैं। मैं उन्हें मदद करना चाहता हूं। पूछता हूँ: तलाशना क्या है माननीय?
शायद उन्हें भी नहीं मालूम कि तलाशना क्या है? मैं भी तलाशना शुरू करता हूँ। जब कुछ खास मिलता है मैं चीखता हूँ; “यह है उस घोटाले की दबी फाइल!”
माननीय अनसुना कर रहे हैं। वह कुछ बहुत खास तलाश रहे हैं।
इस गंदगी में जानवरों का भी पूरा साम्राज्य फैला है। मैं जबभी इन्हें भगाता हूँ माननीय की निन्द्रा टूटती है।
“क्या है!”
हुजूर सांप है! चूहा है! कुत्ता है! जैसे जवाब से उन्हें फिर निराशा घेर लेती है।
मैं और गहरे पैठता हूँ; हट! हट! चिल्लाता हूँ। माननीय पूछते हैं “क्या है”
“कुछ नहीं हुजूर” वह फिर निराश हो जाते हैं, “गधा है”
कहाँ है! कहाँ है! ; वो सुअर की तरह लोटते हुए तेजी से मेरी तरफ आते हैं।
” यहां था। उधर भगा दिया”; वह तेजी से उसी दिशा को उखेलते हैं।
” आप इस गधे को तलाश रहे हैं हुजूर? “
माननीय मुझ पर चीखते हैं; गधा नहीं है वह! खेवनहार है! यह जो ढेर है ना विकास का, सब उसी पर तो सवार है।”
मैं श्रद्धा से पूछता हूँ ; “हुजूर यह क्या शेषनाग का अवतार है? “
“नहीं बे! यह गधा है, यही लोकतंत्र का आधार है”
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पृथ्वी 'लक्ष्मी' राज सिंह