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क्या इस चुनाव पर नोटबंदी, जीएसटी और सवर्ण आरक्षण का भी असर होगा?


नैनीताल समाचार
April 8, 2019

लोकसभा चुनाव के मुद्दों में मोदी सरकार के तीन सबसे बड़े फैसले – जीएसटी, नोटबंदी और सवर्ण आरक्षण – प्रमुखता से नहीं दिख रहे

लेकिन अगर केंद्र सरकार के पिछले पांच साल के कार्यकाल को देखें तो जो उसके तीन सबसे बड़े फैसले नजर आते हैं वे हैं – नोटबंदी, जीएसटी और सवर्ण आरक्षण. सवाल है कि मोदी सरकार के इन तीन सबसे बड़े फैसलों का आगामी लोकसभा चुनावों पर कितना असर पड़ेगा. जानने की कोशिश करते हैं.

नोटबंदी

हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में पड़ने वाले खतौली में हैं. आसपास गन्ने के खेतों से घिरी सड़क के इर्द-गिर्द लगे गुड़ बनाने वाले ज्यादातर कोल्हू बंद हैं. एक को छोड़कर. इलाके के ज्यादातर कोल्हू बंद क्यों हैं? इस सवाल पर कोल्हू मालिक पवन जवाब देते हैं, ‘पिछले कई सालों से बाजार में गुड़ के रेट ठीक नहीं हैं. मिल पर गन्ने का भाव 325 रुपये प्रति कुंतल है और गुड़ के रेट कम होने से कोल्हू वाले 260 रुपये भी नहीं दे पा रहे हैं. इसलिए ज्यादातर ने काम बंद कर रखा है. बस इक्का-दुक्का लोग ही चला रहे हैं.’ क्या कोल्हू और गन्ने से जुड़े खेती पर आधारित छोटे काराबोर पर नोटबंदी का भी कुछ असर पड़ा है? इस सवाल पर पवन कहते हैं, ‘हम लोग तो दो-चार लाख का कारोबार करने वाले लोग हैं, क्या फर्क पड़ेगा लेकिन थोड़ा बुहत फर्क तो पड़ा ही है.’

पवन आवाज लगाकर कोल्हू पर काम कर रहे दो मजदूरों को बुलाते हैं. बताते हैं कि ये देवेंद्र और नरेश हैं. पानीपत की किसी फैक्ट्री में नौकरी करते थे, लेकिन नोटबंदी के दो महीने बाद इनकी नौकरी छूट गई. इस चुनाव में किसके साथ हैं? इस पर देवेंद्र और नरेश का जवाब आता है, ‘गठबंधन (सपा-बसपा-रालोद) को ही कह रहे सब लोग.’

देवेंद्र और नरेश से बात करने पर लगता है कि उन्हें यह एहसास तो है कि उनकी नौकरी जाने में नोटबंदी भी एक वजह रही. लेकिन वोट देने की उनकी प्राथमिकता इस वजह से तय हुई हो ऐसा नहीं है. पवन सिंह बात को और स्पष्ट करते हैं, ‘अजी, ये पास के गांव के लोग हैं, जहां ज्यादातर जाटव और मुसलमान बिरादरी है. इसलिए गठबंधन के साथ हैं, नोटंबदी और इनके वोट का कोई सीधा मतलब नहीं है.’

मेरठ में ट्रैक्टर से जुड़े कल-पुर्जे बनाने वाले एक लघु उद्यमी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘अब तो नोटबंदी को तीन साल बीत गए हैं, लेकिन अभी तक छोटा कारोबारी इससे उबर नहीं पाया है. कारोबारी का नुकसान तो हुआ ही है, लोगों का काम भी गया है. पहले मेरी फैक्ट्री में 35 लोग काम करते थे, अब 18 लोग ही हैं. नोटबंदी के सालभर तक काम लगभग जीरो ही रहा था.’ लेकिन क्या इससे छोटे कारोबारियों के वोट पर फर्क पड़ेगा? इस पर उनका जवाब होता है, ‘वोट किसे देना है ये सिर्फ इसी बात से नहीं तय होता.’ उनका राजनीतिक रूझान पिछले चुनाव में भी भाजपा की ओर था और इस चुनाव में भी वे भाजपा को वोट देने की बात करते हैं.

गुड़ के ठीक दाम न मिलने के कारण वेस्ट यूपी के ज्यादातर कोल्हू पिछले साल बंद ही रहे | फोटो : अनुराग शुक्ला
गुड़ के ठीक दाम न मिलने के कारण वेस्ट यूपी के ज्यादातर कोल्हू पिछले साल बंद ही रहे | फोटो : अनुराग शुक्ला

छोटे उद्यम और कारोबार से जुड़े लोगों से बातचीत में यह सामने आता है कि नोटबंदी ने काम-धंधे को चोट पहुंचाई. लेकिन इस वजह से अपना वोट तय करने वालों का प्रतिशत बहुत ज्यादा नहीं दिखता. ‘ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का प्रभाव’ विषय पर अध्ययन कर रही लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्रा रिद्धि कहती हैं, ‘नोटबंदी का ग्रामीण इलाकों पर बहुत गहरा असर पड़ा है. लेकिन इसको लेकर कोई राजनीतिक नाराजगी नहीं है तो उसकी वजह विपक्ष है, जिसने न इस बात को कायदे से उठाया और न इससे होने वाले नुकसान को बताया. यह जरूर हुआ है कि लोग अब यह समझ गए हैं कि इससे अमीर लोगों को कोई खास नुकसान नहीं हुआ, बल्कि गरीब लोगों के रोजी-रोजगार पर ज्यादा असर पड़ा.’ समाजवादी पार्टी से जुड़े एक पदाधिकारी भी मानते हैं कि नोटबंदी को लेकर जनता की धारणा बदली है, लेकिन विपक्ष उसे राजनीतिक तौर पर भुना नहीं पा रहा है.

जीएसटी

मोदी सरकार के बड़े फैसलों में जीएसटी भी है. भाजपा सरकार ने जीएसटी की ब्रांडिंग धूमधाम से की. लेकिन धीरे-धीरे सामने आने लगा कि जीएसटी जिस तरह से लागू हुआ, उससे यह कारोबारियों के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. तो सवाल है कि मौजूदा लोकसभा चुनाव में जीएसटी और उससे हो रहा लाभ-हानि कोई असर डालेगा. यह सवाल इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जीएसटी लागू होने के बाद नाराजगी के स्वर सबसे ज्यादा उन मंझोले कारोबारियों की ओर से उठ रहे हैं जिन्हें भाजपा का पारंपरिक वोटर माना जाता है.

बाराबंकी के व्यापार मंडल से जुड़े शरद गुप्ता कहते हैं, ‘जीएसटी आने के बाद से ही व्यापारी वर्ग इसकी जटिलताओं का विरोध कर रहा है. बहुत सारी रियायतों के बाद भी व्यापारियों की दिक्कतें दूर नहीं हुईं हैं. लेकिन इस नाराजगी की वजह से व्यापारी या कारोबारी के वोट पर असर पड़ेगा, ऐसा नहीं है.’ मेरठ के कारोबारी सत्यप्रकाश जीएसटी की जमकर कमियां गिनाते हैं और फिर वोट के सवाल पर कहते हैं कि बाकी पार्टियां तो व्यापारियों की बात ही नहीं करतीं. एक चार्टर्ड एकाउंटेंट इस बात को थोड़ा और तफ्सील से बताते हैं. वे कहते हैं, ‘व्यापारी वर्ग जीएसटी से परेशान है. कर राहत के बाद भी उसकी जटिलताएं और कर अधिकारियों की मनमानी कम नहीं हुई है. लेकिन कारोबारी अब जीएसटी और व्यापार में कर जटिलताओं को अपनी नियति मान चुका है. उसे लगता है कि दूसरी पार्टी की सरकार आने पर भी यह चीजें कम ज्यादा ऐसी ही बनी रहेंगी. इसलिए यह नाराजगी कभी भी बहुत ज्यादा उनके मतदान में नजर नहीं आती है.’

काफी हद तक यह निष्कर्ष सही लगता है. गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त सूरत जैसे शहरों में जीएसटी को लेकर जोरदार प्रदर्शन हो रहे थे और ऐसा लग रहा था कि भाजपा को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा. लेकिन चुनावी नतीजे आने के बाद सूरत में भाजपा का प्रदर्शन शानदार रहा. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सूरत में अगर भाजपा को वैसी सफलता न मिलती तो वह गुजरात में सामान्य बहुमत से पिछड़ जाती. जाहिर है तब के मुकाबले जीएसटी को लेकर व्यापारियों में आक्रोश घट चुका है और लोकसभा चुनाव में उनका पारंपरिक समर्थन बहुत ज्यादा बदलने वाला है, ऐसा नहीं. बाकी सामान्य लोगों के लिए जीएसटी कोई खास मुद्दा है, ऐसा नहीं लगता.

सवर्ण आरक्षण

मोदी सरकार द्वारा सामान्य वर्ग को दस फीसद आरक्षण देने का फैसला लोकसभा चुनावों के सबसे नजदीक किया गया है. एक मोटी राजनीतिक समझ है कि ऊंची जातियां आमतौर पर भाजपा समर्थक होती हैं. तो ऐसे में भाजपा को सवर्ण जातियों के लिए आरक्षण की क्या जरूरत थी? पार्टी के ही जमीनी नेता मानते हैं कि यह धारणा सही है, लेकिन ऐसा लग रहा था कि तमाम वजहों से सवर्ण मतदाता पार्टी से छिटक सकता है, इसलिए अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग में उत्साह भरने के लिए ऐसा जरूरी है. लेकिन क्या सवर्ण आरक्षण का मुद्दा क्या वाकई चुनावों पर कोई असर डाल रहा है? इस सवाल पर बहराइच जिले के विजय मिश्र कहते हैं, ‘नौकरी है ही नहीं तो काहे का आरक्षण. हम तो कहते हैं किसी को भी आरक्षण देने के बजाय सारा आरक्षण खत्म कर दिया जाए.’

मेरठ के सतीश शर्मा भी मानते हैं कि सवर्ण आरक्षण से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. सहारनपुर के वरिष्ठ पत्रकार अवनींद्र कमल कहते हैं, ‘आरक्षण का मामला अब नौकरियों में लाभ का मामला नहीं रह गया है. बल्कि यह जातीय अस्मिता को नए रूप में ले आया है. सवर्ण आरक्षण से भाजपा को कोई फायदा होगा ऐसा तो नहीं लगता, अलबत्ता इसकी वजह से पिछड़ों और दलितों में जरूर एक नाराजगी का भाव है जो भाजपा के लिए मुश्किल बन सकता है क्योंकि पिछले चुनावों में इन वर्गों का काफी वोट पार्टी को गया था.’

जमीन पर भी यही समझ काफी हद तक नजर आती है. भाजपा समर्थक उंची जातियों के लोगों में सामान्य आरक्षण को लेकर न कोई उत्साह दिखता है और न यह उनके वोट देने की वजह बनने जा रहा है. बसपा के एक बड़े नेता कहते हैं कि भाजपा मध्य प्रदेश चुनाव में ऊंची जातियों की नाराजगी देखकर इस तरह का बिल लाई है, लेकिन अगर कायदे से विपक्ष सामान्य वर्ग के आरक्षण की बात करे तो उत्तर प्रदेश-बिहार में पिछड़ों और दलितों को काफी हद तक भाजपा के खिलाफ किया जा सकता है. पिछड़े-दलित इस घोषणा को लेकर भाजपा से कितना नाराज हैं, यह अलग बात है, लेकिन सामान्य आरक्षण ऊंची जातियों के पारंपरिक भाजपाई जनाधार में कुछ अतिरक्त मदद देने वाला है, ऐसा नहीं लगता.

हिन्दी वैब पत्रिका ‘सत्याग्रह’ से साभार

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