किसानों को गुमराह किया जा रहा है


नैनीताल समाचार
November 26, 2018

जे. जैकब

किसान आजकल सब को से प्यारे लगने लगे हैं। भाजपा से लेकर कांग्रेस तक, योगेन्द्र यादव से वामपंथियों और गैर सरकारी संगठनों से पर्यावरणवादियों तक सभी को। किन्तु किसी ने नेहरू सरकार के समय से किसानों के प्रति जारी मूलभूत अन्याय का विरोध नहीं किया। नीतियों में किसानों के प्रति किये जा रहे भेदभाव पर किसी ने आपत्ति नहीं की। आखिरकार वे सभी, प्रत्यक्ष या परोक्ष, उसी राजनैतिक अर्थव्यवस्था का ही झंडा बुलंद करते रहे, जिसमें किसानों और आम जनता को कुचला जा रहा था।

कुछ उसी राजनैतिक अर्थव्यवस्था के सहारे या तो प्रशासन चला रहे हैं या चला चुके हैं और कुछ इस कृषक विरोधी राजनैतिक अर्थव्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से अपना समर्थन दे रहे हैं। उन्होंने कभी भी न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने वाले भेदभावपूर्ण मानदंड पर सवालात खड़े नहीं किये। उन सभी ने डेढ़ गुना वृद्धि के फ़ॉर्मूले को लागू किये जाने की ही मांग की। किन्तु मौजूदा मानदंड के भीतर ऐसी किसी वृद्धि से कृषकों को तक़रीबन कुछ भी हासिल नहीं होगा। बिना भेदभावपूर्ण मानदंड को बदले यह मांग दरअसल किसानों की गुलामी को मजबूत ही कर रही है। इनमें से किसी ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों पर आधारित सरकारी कर्मचारियों की उस वेतन वृद्धि पर कभी सवाल नहीं उठाए, जिसके अंतर्गत केवल केन्द्रीय कर्मचारियों की वेतन वृद्धि ने 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त सालाना वित्तीय बोझ पैदा किया। जरा सोचिये, सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों पर आधारित केन्द्रीय, राज्य और सार्वजनिक उपक्रमों के कार्मिकों की वेतन वृद्धि का समग्र व्यय कितना विशाल होगा ? किन्तु मोदी नितांत झूठा दावा कर रहे हैं कि उन्होंने किसानों के लिए कुछ कुछ किया है।

केंद्र और राज्य, दोनों में एक के बाद एक सत्ता में आने वाली सरकारों के दौरान इस तरह के असंतुलित क़दमों का सिलसिला लगातार जारी रहा है। मोदी की सरकार भी इसी राह चली है और उनकी सरकार ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ही काम किया। किसी को भी मोदी सरकार के आने से भी पहले की, किसान के शोषण और कॉरपोरेट के लिए लाभकारी, फसल बीमा योजनाओं पर कोई एतराज नहीं हुआ। दरअसल कृषकों को पूरी तरह मिटा देने के लिए कॉरपोरेट ताक़तों के निर्देश पर बनाई गयी स्वामीनाथन समिति की रपट के क्रियान्वयन को लेकर उन सबके बीच सामान्य सहमति है। एम. एस. स्वामीनाथन हमेशा से कॉरपोरेट ताकतों के हाथों की कठपुतली रहे हैं।

अगर आप स्वामीनाथन समिति की रपट के क्रियान्वन की मांग कर रहे हैं तो आप ज़ाहिर कर रहे हैं कि आप कॉरपोरेट समर्थक हैं और चाहते हैं कि किसानों का गुलामी में रहना जारी रहना चाहिए। जब प्रत्येक सरकार केवल किसान विरोधी नीतियों को ही महत्व दे रही हो तो नीतियों की सही समझ न रखने वाले विरोधी दलों और बाकियों के लिए निराश कृषकों को साथ लेकर कुछ किसान संघर्षों का आयोजन सरल और सुविधाजनक होता है। किन्तु ऐसे तमाम संघर्ष कृषकों को अनावश्यक रूप से आवेशित कर उन्हें एक चरणबद्ध तरीके से संगठित करने और किसान-विरोधी नीतियों के खिलाफ़ एक स्पष्ट और दिशायुक्त कृषक जन आन्दोलन के अवसर से दूर ले जाते हैं। ऐसे नकली और फ़रेबी संघर्षों को चमक-धमक के साथ प्रसारित करने के कुटिल खेल में मीडिया की भी संलग्नता है और ऐसी गतिविधियों के लिए कॉरपोरेट और गैर सरकारी संगठनों की निधियाँ बड़ी मात्रा में बढ़ रही हैं।

(अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद : रमदा )

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