किसानों की समस्याओं का असली समाधान क्या है ?


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विवेकानन्द माथने
June 4, 2018
विवेकानन्द माथने 

देश का मुख्य समाज किसान गरीब क्यों ? किसान परिवार में आत्महत्या क्यों ? इस सरल प्रश्न का सच्चा जवाब हम देना नही चाहते। बड़ी-बड़ी रिपोर्टें तैयार की गयीं। उनमें से कुछ की सिफारिशें लागू भी की गयीं। लेकिन आज तक किसानों की समस्याओं का समाधान नही हुआ। बल्कि संकट दिन ब दिन गहराता जा रहा है। किसानों की हालत लगातार बिगडती जा रही है। क्या हम किसानों की समस्याओं का सही कारण नही खोज पाये ? या खोजना ही नही चाहते ?

देश का मुख्य समाज किसान गरीब क्यों ? किसान परिवार में आत्महत्या क्यों ? इस सरल प्रश्न का सच्चा जवाब हम देना नही चाहते। इन प्रश्नों का जवाब दशकों से ढूंढा जा रहा है। बड़ी-बड़ी रिपोर्टें तैयार की गयीं। उनमें से कुछ की सिफारिशें लागू भी की गयीं। लेकिन आज तक किसानों की समस्याओं का समाधान नही हुआ। बल्कि संकट दिन ब दिन गहराता जा रहा है। किसानों की हालत लगातार बिगडती जा रही है। क्या हम किसानों की समस्याओं का सही कारण नही खोज पाये ? या खोजना ही नही चाहते ?

कुछ लोग तो मानते ही नही कि किसानों की कोई समस्या भी है। उनका मानना है कि किसान कर्ज निकाल कर बच्चों के शादी ब्याह पर खुल कर खर्च करते हैं और यही उनकी बदहाली का कारण है। कुछ और लोग कहते हैं कि किसानों में शराब पीने की लत ही उन्हें आत्महत्या की ओर धकेलती है। कुछ कहते हैं कि किसानों की मनो चिकित्सा करवायी जानी चाहिये। जो लोग किसान की समस्याओं को स्वीकार करते हैं, उनमें भी अलग-अलग राय है। कुछ कहते हैं कि खेती की पद्धति में बदलाव करना चाहिये, रासायनिक खेती के बदले जैविक खेती करनी चाहिये। कुछ अन्य कहते हैं कि सिंचाई का क्षेत्र बढ़ाना चाहिये, यांत्रिक खेती करनी चाहिये। कुछ कहते हैं कि उत्पादन बढ़ाने के लिये जीएम बीज का इस्तेमाल करना चाहिये, निर्यातोन्मुखी फसलों का उत्पादन करना चाहिये। कुछ कहते हैं कि फसल बीमा योजना में सुधार करना चाहिये, कर्ज योजना का विस्तार करना चाहिये। ये सारे उपाय भी कमोबेश अपना कर देख लिये गये हैं, किसानों के जीवन में कोई बदलाव आता नही दिखाई दिया है। उन की समस्या जस की तस है।

ये उपाय किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिये नहीं, बल्कि उनकी समस्याओं का लाभ उठाने के लिये किये जाते रहे हंै। आज तक का अनुभव यही है कि इन योजनाओं का लाभ बैंकांे, बीज, बीमा व यंत्र निर्माता कंपनियों, निर्यात कंपनियों, बांध बनानेवाली कंपनियों और ठेकेदारों को मिला है। पहले किसानों की आत्महत्या के कारणों की खोज के नाम पर पर रिपोर्ट बनायी जाती हंै और फिर सरकार में लॉबिंग कर उनकी सिफारिशों लागू करवाया जाता है। यह रिपोर्ट बनाने में सी.एस.आर. फंड प्राप्त एन.जी.ओ. बड़ी भूमिका निभाते हंै और हम भी ‘किसान के बेटे हंै’ कहने वाले नौकरशाह और राजनेता अपने बाप से बेईमानी करते हंै। उत्पादन वृद्धि के इन उपायों से किसानों का उत्पादन खर्च बढ़ा है। साथ ही उत्पादन बढ़ने और आपूर्ति स्ै मांग ज्यादा हो जाने से फसलों के दाम घटे है। इससे किसान का लाभ नहीं, नुकसान बढ़ा है। किसानों की लगातार बिगडती स्थिति इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में किसानों की औसत मासिक आय 6,426 रुपये है। इसमें केवल खेती से प्राप्त होनेवाली आय केवल 3,081 रुपये प्रतिमाह है। देश के 17 राज्यों मे यह केवल 1,700 रुपये मात्र है। हर किसान पर औसतन 47,000 रुपयों का कर्ज है। लगभग 90 प्रतिशत किसान और खेत मजदूर गरीबी का जीवन जी रहे हैं। जो किसान केवल खेती पर निर्भर हंै, उनके लिये दो वक्त की रोटी पाना भी संभव नही है। खेती के काम हो, बीमारी हो, बच्चों की शादी हो या कोई अन्य कार्य, किसान के पास हर बार कर्ज लेने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता। यह जानते हुये भी कि उसकी आय कर्ज का ब्याज लौटाने के लिये भी पर्याप्त नहीं है।

राजनेता और नौकरशाह अपना वेतन तो आवश्यकता और योग्यता से कई गुना अधिक बढ़ा लेते हैं। लेकिन किसान के लिये ऐसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था बनाये रखना चाहते हैं कि उसे 8 घंटे के हाड़तोड़ परिश्रम के बाद भी उसकी मेहनत का उचित मूल्य न मिले। पूरे देश के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर आकलन करें तो खेती वाले दिनों में पूरे दिन के श्रम के लिये केवल 92 रुपये मजदूरी मिलती है। यह मजदूरी 365 दिनों के लिये प्रतिदिन 60 रुपये के आसपास पड़ती है। किसान की कुल मजदूरी से किराये की मजदूरी कम करने पर दिन भर की मजदूरी 30 रुपये से कम पडती है। मालिक की हैसियत से तो किसान को कुछ मिलता ही नही, खेती में काम के लिये न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं। कुल मिला कर आज हालात यह हैं कि केवल खेती पर निर्भर हो कर परिवार का जीवन चलाना किसान के लिये संभव नहीं है।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि बाजार में विकृति पैदा न हो, इसलिये वह फसल के उत्पादन खर्च पर आधारित दाम किसान को नहीं दे सकती। अजीब तर्क है! महंगाई न बढ़े, उद्योगपतियों को सस्ते कृषि उत्पाद मिलंे, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आयात निर्यात स्पद्र्धा बनी रहे, विश्व व्यापार संगठन की शर्तों को निभाया जा सके, इसलिये वह कृषि फसलों की कीमत नहीं दे सकती। यह कृषि प्रधान कहे जाने वाले भारत में किसान की हैसियत है!

बाजार अपने आप में लूट की एक व्यवस्था है, जो स्पर्धा के नाम पर बलवान को दुर्बल को लूटने की स्वीकृति के सिद्धांत पर खड़ी है। बाजार व्यवस्था में बलवान लूटता है और कमजोर लूटा जाता है। ‘बाजार में विकृति पैदा न होने देने’ का अर्थ किसान को लूटने की व्यवस्था बनाये रखना है। जब तक किसान बाजार नामक लूट की व्यवस्था में खड़ा है, उसे कभी न्याय नहीं मिल सकता। बाजार में किसान हमेशा कमजोर ही रहता है। एक साथ कृषि उत्पादन बाजार में आना, मांग से अधिक उत्पादन की उपलब्धता, स्टोरेज का अभाव, कर्ज वापसी का दबाव, जीविका के लिये धन की आवश्यकता आदि सभी कारणों से किसान की हैसियत बाजार में बहुत कमजोर होती है।

कृषि की पूरी व्यवस्था किसान को लूटने और उसे गुलाम बनाये रखने के लिये बनाई गई है। खेती से जुड़ी हर गतिविधि में उसे लूटा जाता है। उसे उतना ही दिया जाता है, जितने में वह पेट भर सके और मजबूर होकर खेती करता रहे। सारी कृषि नीतियां और आर्थिक नीतियां इसी तरह बनाई गई हैं। जब तक सत्ता में बैठे लोग किसान को मनुष्य नहीं, बल्कि सस्ता मजदूर समझते रहेंगे, किसान कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पायेगा और न ही उसे सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार प्राप्त हो सकेगा।

यह शोषणकारी व्यवस्था उद्योगपतियों, व्यापारियों और दलालों को लाभ पहुंचाने के लिये बनाई गई है। अभी हाल-हाल तक यह लूट देशी लोगों के द्वारा होती थी। अब इस लूट में देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी शामिल कर लिया गया है। ये कंपनियां खेती के पूरक उद्योगों और उसके व्यापार पर पहले ही कब्जा कर चुकी हैं। अब वे पूरी दुनिया की खेती पर कब्जा करना चाहती हैं। इसीलिये विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन के दबाव में दुनिया भर की सरकारें लगातार किसान विरोधी नीतियां बनाती जा रही है।

किसान का मुख्य संकट आर्थिक है। उसका एकमात्र समाधान यह है कि एक किसान को अपने परिवार की बुनियादी आवश्यकताएं प्राप्त करने तथा एक सम्मानपूर्ण जिन्दगी बसर करने के लिये समुचित आय प्राप्त हो।  उसकी समस्याओं का समाधान केवल उपज का मूल्य थोड़ा बढ़ा कर नही हो सकता। किसान के श्रम का शोषण, लागत वस्तु के खरीद में हो रही लूट, कृषि उत्पाद की बिक्री के समय व्यापारी-दलालों द्वारा खरीद और सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद में की जा रही लूट, बैंको, बीमा कंपनियों द्वारा की जा रही लूट…… इन सबको बंद करना होगा। उसके शोषण और लूट का हर रास्ता बंद करना होगा।

किसान, खेती और गांवों को स्वावलंबी और समृद्ध बनाने के लिये कृषि आधारित कुटीर एवं लघु उद्योगों को एक बार फिर जीवित करना होगा। जब खेती का काम नही रहता, तब किसान को पूरक रोजगार की आवश्यकता होती है। भारत सरकार ने 1977 में एक नीति के तहत 807 वस्तुओं को पूरी तरह लघु और कुटीर उद्योगों के लिये संरक्षित किया था। बड़े उद्योग ये वस्तुएं नहीं बना सकते थे। यह किसानों के लिये बड़ा सहारा था। मगर नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद इस नीति को धीरे-धीरे पूरी तरह से हटा लिया गया। इस नीति पुनः लागू कर, ग्रामीणों को देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ असमान प्रतिस्पद्र्धा से बचाना होगा। इन वस्तुओं के बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादन पर पाबंदी लगानी होगी। कृषि उत्पादकों के लिये उत्पादन, प्रसंस्करण व विपणन के लिये सरकारी और काॅरपोरेटी हस्तक्षेप से मुक्त एक सरल गांव केंद्रित रोजगाराभिमुख नई सहकारी व्यवस्था बनानी होगी।

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र 1948 में ऐसे पारिश्रमिक की परिकल्पना की गई है जो ‘कर्मी’ और उसके परिवार’ को गरिमा के साथ जीवन प्रदान करने के लिये आश्वासन देती है। इस घोषणापत्र के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत ने भी इस पर हस्ताक्षर किये है। भारत में संगठित क्षेत्र के लिये वेतन आयोग द्वारा ‘परिवारिक सिद्धांत’ अपनाया गया है। राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन 1975 में भी सामान्य रूप से न्यूनतम मजदूरी के लिये इस सिद्धान्त को अपनाने की सिफारिश की गई है। लेकिन कृषि में अधिकारों का निर्धारण करने में पारिवारिक सिद्धांत की अनदेखी की गई है। लोक कल्याणकारी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह मौलिक अधिकारों का रक्षण करे और किसी का शोषण न होने दे। संविधान में मजदूरी निर्धारण में किसी प्रकार के भेदभाव की अनुमति नहीं है। जिस प्रकार संगठित और औद्योगिक क्षेत्र में ‘पारिवारिक सिद्धांत’ के आधार पर अधिकार दिये हैं, किसान को भी उसी आधार पर श्रम मूल्य दिया जाना आवश्यक है।

काम के बदले आजीविका मूल्य प्राप्त करना हर व्यक्ति का मौलिक और संवैधानिक अधिकार है। किसान को भी काम के बदले न्यायपूर्ण श्रम मूल्य मिलना चाहिये। आजीविका मूल्य बौद्धिक श्रम के लिये 2,400 कैलरी और शारीरिक श्रम के लिये 2,700 कैलरी के आधार पर तय किया जाता है। इसके लिये संगठित-असंगठित का भेद किये बिना ‘समान काम के लिये समान श्रम मूल्य’ के सिद्धांत के अनुसार परिवार की अन्न, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि बुनियादी आवश्यकताएं पूरी करने के लिये आजीविका मूल्य निर्धारित करना होगा। श्रम मूल्य निर्धारण में संगठित क्षेत्र की तुलना में अधिकतम और न्यूनतम का अनुपात 1:10 से अधिक नही होना चाहिये। इस प्रकार से निर्धारित न्यायपूर्ण श्रम मूल्य किसान को देने की व्यवस्था करनी होगी।

सरकार को महंगाई का नियंत्रण करने के लिये किसान का शोषण करने का कोई अधिकार नहीं है। यह सरासर अन्याय है। अगर वह सरकारी खरीद या बाजार में फसलों की उचित किमते देने की व्यवस्था नही कर सकती तो ऐसे स्थिति में सस्ते कृषि उत्पाद का लाभ जिस-जिस को मिलता है उनसे वसूल कर किसान को उसके नुकसान की भरपाई करनी होगी। एक वर्ग विशेष को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिये किसान का अधिकार नहीं छीना जा सकता।

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विवेकानन्द माथने

'आजादी बचाओ आन्दोलन' और 'सर्व सेवा संघ' से जुड़े विवेकानन्द माथने किसान आन्दोलन से बहुत गहराई से जुड़े हैं.