कलम के साथ-साथ बंदूक के सिपाहियों का भी सम्मान


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व्योमेश जुगरान
March 30, 2018

यदि उत्तराखंड के हर गांव को साधारण सी सुविधाएं उपलब्‍ध करा दी जाएं तो तस्वीर बदल सकती है। राजनयिक भंडारीजी ने ‘सबसे बड़े संसाधन’ पर्यावरण और इसके संरक्षण की वकालत करते हुए कहा कि बाहर वाले हमारे बारे में कहते हैं कि हम तो सेवन स्टार वातावरण में रहे रहे हैं। वे पर्यटक के रूप में आने को आतुर हैं मगर हम रास्ता बनाने की बजाय गांव छोड़कर भागने को अभिशप्त हैं…

रानीखेत की वादी में उमेश डोभाल स्मृति समारोह की शानदार गवाही 

24 मार्च की शाम। रानीखेत का सुभाष चौक। गिर्दा-चीमा-गोरख-गोंडवी की इनकलाबी कविताओं, जनगीतों और नारों के साथ एक जुलूस की शक्ल में झूमते-इतराते आगे बढ़ते लोग। नगर के मुख्य बाजार में एक नए तरह की रौनक और सैर को निकले पर्यटकों के लिए एक कौतूहल। रानीखेत की ठंडी और खूबसूरत वादियों में 28वें उमेश डोभाल स्मृति समारोह के शा­नदार आगाज की यह शानदार गवाही थी। 24-25 मार्च को दो दिवसीय आयोजन में लेखक, पत्रकार और संस्कृतिकर्मियों के अलावा बड़ी संख्या में स्‍थानीय लोग भी जुटे।

इस बार समारोह इस मायने में अनूठा था कि प्रतिष्ठित ‘उमेश डोभाल स्मृति सम्मान’ ले.जनरल डॉ. मोहन भंडारी को दिया गया जो चार दशकों की महत्वपूर्ण सैन्यसेवा के उपरांत स्‍थायी रूप से पहाड़ में अपने लोगों के बीच आ बसे हैं। पुरस्कृत होने वाले एक अन्य फौजी कुमाऊं राइफल्स से सेवानिवृत्त नायक ब्रजेश चन्द्र बिष्ट थे जिन्होंने चंपावत जिले के अपने गांव कफललेख को अकेले अपने दम पर मोटर सड़क से जोड़ने का कारनामा कर दिखाया। इस गांव तक पहुंचने के लिए डेढ़ किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई नापनी पड़ती थी। आधुनिक माधोसिंह भंडारी के रूप में जाने गए नायक ब्रजेश को ‘राजेन्द्र रावत राजू जन सरोकार सम्मान’ से नवाजा गया।

प्र‌िंट मीडिया के लिए ‘युवा पत्रकारिता पुरस्कार’ हिन्दुस्तान, ऊधमसिंह नगर के संवाददाता अजय कुमार जोशी को दिया गया। इलक्ट्रोनिक मीडिया के लिए जी-न्यूज देहरादून के संदीप सिंह गुसाईं और सोशल मीडिया के लिए स्वतंत्र पत्रकार योगेश भट्ट पुरस्कृत किए गए। सम्मानितों को 11 हजार की राशि, शॉल और स्मृतिचिह्न भेंट किए गए। योगेश भट्ट ने पुरस्कार राशि उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट को भेंटस्वरूप वापस कर सदाशयता का परिचय दिया। ‘गिरीश तिवारी गिर्दा जनकवि सम्मान’ लेखक और चिन्तक महेश पुनेठा को दिया गया। हालांकि उन्होंने समारोह में न आने की अपनी विवशता का संदेश भेजा और  सम्मानों/ पुरस्कारों के प्रति अरुचि की अपनी सैद्धांतिक निष्ठा का इजहार करते हुए इसे लेने से ससम्मान इनकार किया।

समारोह में पूर्व राजदूत और रानीखेत में ही स्‍थायी रूप से रह रहे चन्द्रमोहन भंडारी, जानेमाने इतिहासकार और लेखक डॉ. शेखर पाठक, वरिष्ठ पत्रकार व गैरसैंण स्‍थायी राजधानी संघर्ष समिति के संयोजक चारु तिवारी और भाषाविद डॉ. वीपी साह ने बेहद उपयोगी व्याख्यान दिए। सत्र की अध्यक्षता पेशे से टीवी पत्रकार और शौक से पर्वतारोही गोविन्द पंत राजू ने की। संचालक विमल सती और त्रिभुवन उनियाल जैसे सरोकारी पत्रकारों ने किया। उमेश डोभाल स्मृति न्यास के महासचिव एल.मोहन कोठियाल ने पुरस्कार सत्र का शानदार प्रबंधन किया।

 

सभी चिंतकों के व्याख्यान पलायन के प्रश्न से खूब टकराए। डॉ. शेखर पाठक ने पहाड़ की जमीन बेचकर मैदानों में एक दड़बा खरीदने की नई प्रवृत्ति को अलार्मिंग बताया। उनका कहना था कि जल-जंगल-जमीन से हमारी पहचान जुड़ी हुई है। इन्हें एक बार खोकर दोबारा पाना कठिन है। उन्होंने कहा, हमारे चारधाम इकोलॉजी के साथ बंधे हैं। ऊपर जब बर्फ पड़ती है तभी हमारी नदियों में पानी बहता है। जाडों में तो हमारे भगवान भी नीचे आ जाते हैं। ऑल वैदर के लिए जंगलों का कटना इस इकोलॉजी को गड़बड़ा देगा। उनका दावा था कि दुनिया के किसी भी पर्वतीय क्षेत्र ने अपने यहां 12 मीटर चौड़ी सड़कों की इजाजत नहीं दी है। शेखरदा ने कहा कि उत्तराखंड की नदियों का पानी पूरी तरह निजी क्षेत्र में जा चुका है। इसी का परिणाम है कि टिहरी में झील के उस पार प्रतापनगर ब्लाक की एक बड़ी ग्रामीण आबादी को इतने साल बाद भी एक अदद पुल नसीब नहीं हो सका। एक अरब 20 करोड़ खर्च के बावजूद मात्र एक पिलर खड़ा हो पाया। उनका कहना था कि टिहरी का हस्र देखने के बाद पंचेश्वर का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

पूर्व राजदूत चन्द्रमोहन भंडारी ने कहा कि पिछले साल घास तो कटी मगर घरों में सूख गई। इस साल कटी ही नहीं, खेतों में ही रही। उन्होंने कहा कि गांवों को आबाद करने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि हम अपने-अपने घरों को थोड़ा परिवर्तन करके रहने लायक बनाएं। बाकी प्रकृति हमें सब कुछ दे ही रही है। यदि उत्तराखंड के हर गांव को साधारण सी सुविधाएं उपलब्‍ध करा दी जाएं तो तस्वीर बदल सकती है। राजनयिक भंडारीजी ने ‘सबसे बड़े संसाधन’ पर्यावरण और इसके संरक्षण की वकालत करते हुए कहा कि बाहर वाले हमारे बारे में कहते हैं कि हम तो सेवन स्टार वातावरण में रहे रहे हैं। वे पर्यटक के रूप में आने को आतुर हैं मगर हम रास्ता बनाने की बजाय गांव छोड़कर भागने को अभिशप्त हैं। हमारे यहां अध्यात्म पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। जो लोग इस दिशा में काम कर रहे हैं, बेहद सफल हैं। नदियों व गाड-गधेरों के किनारे वाटर पार्क बनाए जा सकते हैं। पिरुल को रिसोर्स के रूप में अपनाकर थर्मल एनर्जी के काम लाया जा सकता है। भंडारीजी के मुताबिक, विकास का आतंक रोकने के लिए इन विधाओं को आगे बढ़ाना होगा।

वरिष्ठ पत्रकार चारू तिवारी ने कहा कि पलायन नीतिजनक है और इसका समाधान भी नीतिजनक और राजनीतिक है। सरकार यदि चाहेगी तो पलायन रुक सकता है। चारू ने कहा कि सरकारें हमें यही समझाती रहीं कि पहाड़ की अर्थव्यवस्‍था मनीऑर्डर इकोनॉमी है जबकि हमारी इकोनॉमी पूरी तरह जल-जंगल पर आधारित रही है। पर इन दोनों ही संसाधनों को हमको जुदा कर दिया गया है। आज हमारी नदियां 1600 किलोमीटर की सुरंगों में ठेली जा रही हैं। 29 लाख की आबादी इन सुरंगों के ऊपर बैठी होगी। पंचेश्वर में 116 किलोमीटर की झील बनेगी। 376 गांवों का विस्‍थापन होगा। यह सब बहुत डरावना है।

इस बार भी समारोह स्‍थल पर हमेशा की तरह सुप्रसिद्ध् चित्रकार बी. मोहन नेगी के कविता पोस्टरों की प्रदर्शनी लगी थी, मगर अपनी कत्थई दाढ़ी के साथ हंसी बिखेरते नेगीजी वहां नहीं थे। वे तो विगत 25 अक्टूबर को अनंत यात्रा पर निकल चुके थे। कला दीर्घा में स्वर्गीय बी.मोहन की जगह उनके पुत्र ने संभाल रखी थी।

इसी कलादीर्घा में बगट क्राफ्ट का हैरतअंगेज हूनर भी देखने को मिला। इसके जनक भुवन चंद्र शाह एक से बढ़कर एक हस्तशिल्प के साथ वहां मौजूद थे। चीड़ के बगोट यानी छाल से गागर से लेकर पहाड़ी महिलाओं के सर्वप्रिय आभूषण गलाबंद तक बनाए जा सकते हैं, इसकी कल्पना करना दुश्कर है। मगर इसे वास्तविकता में उतारने वाले शाहजी का तजुर्बा कहता है कि छाल को उद्योग के रूप में परिवर्तित करने की अपार संभावनाएं हैं। दिल्ली और मुंबई जैसी जगहों पर अपने उत्पादों के प्रति गजब की ललक उन्होंने देखी। उनका कहना है कि शुरुआती तौर पर सरकार सिर्फ इतना कर दे कि गढ़वाल मंडल विकास निगम और कुमाऊं मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउसों के शो-रूम्स में हमारे उत्पादों को जगह दे दे।

 

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व्योमेश जुगरान

मूलतः पौड़ी के रहने वाले व्योमेश जुगरान दिल्ली में नवभारत टाइम्स से सेवानिवृत्त होने के बाद अब फ्रीलान्स पत्रकारिता कर रहे हैं.