कहाँ गया ​चिपको


नैनीताल समाचार
March 26, 2018

गूगल ने तो इसे चमोली जनपद के रैणी गाँव में गौरा देवी के नेतृत्व में वर्ष 1973 में हुए ‘अहिंसक’ प्रतिरोध से ही जोड़ा है। ‘चिपको’ को लेकर इन पिछले सालों में ऐसी समझ बना दी गई है कि यह पर्यावरण का आन्दोलन था। मगर उसे नजदीक से जानने वाले लोग बता सकते हैं कि यह मूलतः रोजगार और आजीविका से जुड़ा आन्दोलन था…

आज, 26 मार्च, का गूगल का डूडल ‘चिपको’ आन्दोलन की 45 वीं वर्षगाँठ को लेकर बनाया गया है। उत्तराखंड में इस बात से खुशी होनी चाहिये, क्योंकि यह आन्दोलन उसी की भूमि पर हुआ था। हालाँकि कुछ लोग इसे 18वीं सदी में राजस्थान के बिश्नोई समुदाय से भी जोड़ते हैं। गूगल ने तो इसे चमोली जनपद के रैणी गाँव में गौरा देवी के नेतृत्व में वर्ष 1973 में हुए ‘अहिंसक’ प्रतिरोध से ही जोड़ा है। ‘चिपको’ को लेकर इन पिछले सालों में ऐसी समझ बना दी गई है कि यह पर्यावरण का आन्दोलन था। मगर उसे नजदीक से जानने वाले लोग बता सकते हैं कि यह मूलतः रोजगार और आजीविका से जुड़ा आन्दोलन था। गौरा देवी और रैणी गाँव की महिलायें इस आन्दोलन में इसलिये आयीं कि उन्हें उनके कृषि यन्त्रों के लिये लकड़ी देने में तो तत्कालीन उत्तर प्रदेश का वन विभाग हजार तरह के अड़ंगे लगा रहा था और उनके पड़ौस का अंगू के पेड़ों का बेशकीमती जंगल वन विभाग ने कटान के लिये इलाहाबाद की साइमण्ड कम्पनी को दे दिया था। जब कम्पनी के श्रमिक पेड़ काटने रैणी के जंगल में आये तो उस रोज गाँव में पुरुष थे ही नहीं और स्त्रियों को मोर्चा सम्हालना पड़ा। उस दौर में उत्तराखंड की सर्वोदयी संस्थाओं को गुस्सा था कि उनके छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों के लिये वन विभाग लकड़ी उपलब्ध नहीं कराता, लेकिन बड़े-बड़े ठेकेदारों को वह खुले हाथों जंगल लुटाता है। पर्यावरण उस आन्दोलन का बहुत छोटा हिस्सा था। सच बात तो यह है कि तब तक पर्यावरण शब्द प्रचलन में ही नहीं आ पाया था। उत्तराखंड के नौजवानों को एक बड़ा हिस्सा इस आन्दोलन में इसलिये कूदा, क्योंकि वह महसूस कर रहा था कि जंगल उसके सबसे बड़े संसाधन हैं, मगर वह उसे रोजगार देने के बदले बाहर के पूँजीपतियों की जेबें भर रहे हैं। 1980 के वन संरक्षण कानून के बाद एक ओर आन्दोलन ठंडा पड़ा और दूसरी ओर बड़े कौशल से उस पर पर्यावरण का मुलम्मा चढ़ा दिया गया। ‘चिपको आन्दोलन’ का यही रूप अब सबके जेहन में है।

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