एक मिसाल है जंगली का जंगल


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अशोक पांडे
December 5, 2018

उत्तराखण्ड के गढ़वाल इलाके में रूद्रप्रयाग जिले के एक छोटे से गांव में रहते हैं जगत सिंह चौधरी और ‘जंगली’ के नाम से जाने जाते हैं. ‘जंगली’ के जंगल तक पहुंचने के लिए रूद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग की तरफ जाने पर कोटमल्ला नाम की जगह के लिए एक संकरा रास्ता कटता है. आगे जाकर यह रास्ता कच्चा और पथरीला हो जाता है. करीब बीस किलोमीटर तक चलने के बाद हरियाली देवी का मंदिर आता है. एक तरह से यह नाम बहुत विडंबनापूर्ण है. पूरा इलाका एकदम सूखा हुआ है और बंजर से लगते पहाड़ों पर चीड़ के सिवा कुछ नज़र नहीं आता.

इसी मन्दिर से करीब एक किलोमीटर दूर पथरीली सड़क पर लगा एक विनम्र सा साइनबोर्ड आपका स्वागत करता है : ‘जंगली का जंगल’. इस जंगल में घुसते ही ठंडक महसूस होती है और आप अपने को तमाम तरह के पेड़ों के बीच पाते हैं. जंगली जी से मिलने को आपको बहुत इंतज़ार नहीं करना पड़ता. वे अपने जंगल में ही कहीं होते हैं.

इस शख्स की आंखों की आग को पहचानने के लिए पहले आप को इस दुर्लभ जंगल की दास्तान सुननी होगी. 1967 में कुल सत्रह की उम्र में जगतसिंह फौज में चले गए. फिर शादी परिवार वगैरह. गांव की स्त्रियों का जीवन बहुत कष्टप्रद था : घर से दो मील नीचे से पानी लाना, फिर दिन भर चारे और ईंधन की खोज में रूखे जंगलों में भटकना.

जगत सिंह को अपना पूरा बचपन याद था जिसमें दिन रात खटती रहने वाली एक मां होती थी : बच्चों के लिए उसके पास ज़रा भी वक्त नहीं होता था. अब शादी के बाद वे देख रहे थे कि उनकी पत्नी भी वैसा ही जीवन बिताने को अभिशप्त है. इसी दौरान 1974 में मृत्युशैया पर पड़े जगतसिंह के दादाजी ने उनसे वचन लिया कि वे गांव के ऊपर स्थित उनकी साठ नाली यानी करीब पौने दो एकड़ ज़मीन की देखभाल करेंगे. इस पूरी बंजर ज़मीन पर सिर्फ एक पेड़ था. इस इकलौते पेड़ को उसकी उम्र के कारण आज भी सबसे अलग पहचाना जा सकता है. जगत सिंह ने बरसातों में कुछ पौधे रोपे और जाड़ों में छुट्टी लेकर घर आए और बच गए पौधों की देखभाल में जुट गए. अगली बरसातों में उन्होंने कुछ और पौधे रोपे और यह क्रम चल पड़ा. चार पांच साल में उस बंजर में इतनी हरियाली हो गई कि घर की औरतों को चारे और ईंधन की समस्या नहीं के बराबर रह गई.

इधर जगत सिंह का स्वाध्याय जारी था और 1980 में उन्होंने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लिया. फौज की नौकरी छोड़कर उन्होंने निश्चय किया कि वे अपना पूरा समय अपने जंगल को देंगे. रिटायरमेन्ट के बाद मिली फंड की रकम का ज्यादातर पैसा उन्होंने तमाम प्रजातियों के पेड़ों की पौध वगैरह में झोंक दिया. पच्चीस सालों की अथक मेहनत और फौलादी इरादों का परिणाम यह हुआ कि उनके जंजल में करीब सौ प्रजातियों के तकरीबन बीस हजार पेड़ हैं. यह फकत जंगल नहीं है : यह जगतसिंह चौधरी का जीवन है और उनकी प्रयोगशाला भी जिसमें उन्होंने तमाम हैरतअंगेज कारनामों को अंजाम दिया.

वे मानते हैं कि किसी पेड़ को लगा देने के बाद उसे काटने का हमारा कोई अधिकार नहीं. लेकिन इसके बदले वे उस पेड़ से विनम्रतापूर्वक मांग करते हैं कि वह भी उन्हें कुछ दे. सो आप देखते हैं कि चीड़ के पेड़ों पर सोयाबीन की लताएं चढ़ी हुई हैं और बांज के पेड़ों पर बारहमासा हरे चारे की. अपने जंगल से वे साल में दो कुन्तल सोयाबीन उगा लेते हैं.

इस जंगल में खेती करने का उनका ढंग निराला है : वे ‘गड्ढा यंत्र’ का इस्तेमाल करते हैं. करीब छह फीट, लम्बे तीन फीट चौड़े और डेढ़ फीट गहरे गडढे कई स्थानों पर खोदे गए हैं. इन गड्ढों में मिट्टी को समानान्तर मेड़ों की शक्ल में बिछाया गया है. दो मेड़ों के बीच खरपतवार गिरती रहती है. मेड़ों के ऊपर मूली, प्याज, आलू और टमाटर वगैरह उगाए जाते हैं. फसल कटने के बाद मेड़ों के बीच इकठ्ठा खरपतवार खाद में बदल चुकी होती है. अगली फसल के लिए अब मेड़ों को खाली जगह में खिसका दिया जाता है. तीखी ढलान वाले पहाड़ी इलाके में पानी को बहने से बचाने और ज़मीन को लगातर उपजाऊ बनाते जाने का यह तरीका नायाब है.

तीस साल पहले जिस धरती की कोई कीमत नहीं थी चौधरी साहब की लगन और मेहनत ने उस ज़मीन पर कुछ इंच की उपजाऊ मिट्टी की परत बिछा दी. अपने घर के लिए अन्न और सब्जी इसी जंगल से उगा लेने वाले जगत सिंह चौधरी ने कई अनूठे प्रयोग किए. सबसे पहले तो उन्होंने तमाम स्थापित ‘वैज्ञानिक’ सत्यों को गलत साबित किया. करीब ढाई हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस जंगल में उन्होंने ऐसी ऐसी प्रजातियां उगाई हैं कि एकबारगी यकीन नहीं होता. आम, पपीता, असमी बांस के साथ साथ वे देवदार और बांज भी उगा चुके हैं. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस ऊंचाई पर इन पेड़ों का उगना असंभव है. आप उनसे इसका रहस्य पूछेंगे तो वे किंचित गर्व से आपसे कहेंगे कि वे अपने जंगल में कुछ भी पैदा कर सकते हैं. आप पूछेंगे ‘कैसे’ तो एक निश्छल ठहाका गूंजेगा “क्योंकि जंगली पागल है.”

तो आप देखते हैं कि एक चट्टान पर आंवले का पेड़ फलों से लदा हुआ है. एक जगह पानी के तालाब के पास हजारों की तादाद में मगही पान की बेलें हैं. छोटी और बड़ी इलायची की झाड़ियों पर बौर आ रहे हैं. कहीं बादाम उग रहा है और कहीं पर हंगेरियन गुलाबों की क्यारियां हैं. अपने इस्तेमाल की चाय भी वे यहीं उगाते हैं. तमाम तरह के पहाड़ी फलों के पेड़ भी हैं. जंगल का एक हिस्सा बेहद आश्चर्यजनक है : जंगली जी यहां दुर्लभ हिमालयी जड़ी बूटिया उगाते हैं. वजदन्ती, हत्थाजड़ी और सालमपंजा जो दस हजार फीट से ऊपर ही पाई जाने वाली औषधीय प्रजातियां हैं यहां बाकायदा क्यारियों में उगाई जाती हैं. यह उनका नवीनतम प्रयोग है जिसमें वे भारत के गरीब पहाड़ी कृषक वर्ग के लिए चमकीले भविष्य का सपना संजोए हैं. वे चाहते हैं कि पहाड़ के किसान अपनी ज़मीन पर जड़ी बूटियां उगाएं. “एक नाली ज़मीन से साल में एक लाख रूपए तक कमा पाना संभव है” वे बहुत विश्वास से कहते हैं.

पिछले दशक में उनकी मेहनत का नतीजा यह निकला कि उनके जंगल में पानी के दो स्रोत फूट पड़े जिनसे अब उनके गांव भर की पानी की दिक्कत दूर हो गई है. मुझे अपना गांव याद आता है जहां बहने वाली गगास नदी पिछले तीन सालों से गर्मियां आते ही सूख जाती है. सरकार की तुगलकी योजना यह है कि बागेश्वर में बहने वाली पिंडर का पानी गगास तक लेकर आया जाए. पेड़ उगा कर पानी के स्रोतों को जिन्दा करने की कोई नहीं सोचता. शुरू शुरू में जगतसिंह चौधरी को पागल और सनकी कहा जाता था. वन विभाग के अफसरों ने उनका मजाक उड़ाया. सरकार ने उनके जंगल के बिल्कुल नजदीक एक कृषि प्रयोगशाला स्थापित करने के लिए लाखों की रकम एक इमारत बनाने पर फूंकी. उसमें कोई काम नहीं हुआ और वह खंडहर में तब्दील होती जा रही थी जब बबालटलाई की नीयत से इस इमारत को गढ़वाल मंडल विकास निगम को सौंप दिया गया. फ़िलहाल उसमें हरियाली देवी के मन्दिर आने वाले यात्री-श्रद्धालुओं के ठहरने हेतु गैस्ट हाउस बना दिया गया है.

आठ-नौ साल पहले तत्कालीन उत्तरांचल के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला इस जंगल को देखने आए और उनकी अनुशंसा पर जगतसिंह चौधरी को प्रतिष्ठित वृक्षमित्र सम्मान मिला. गढ़वाल विश्वविद्यालय ने उन पर एक संक्षिप्त आलेख छापा. रूद्रप्रयाग के तत्कालीन जिलाधिकारी रमेश कुमार सुधांशु ने अपने स्तर से भरसक जंगली जी की सहायता की. लेकिन जगतसिंह चौधरी के जंगल को बतौर मॉडल देखे और प्रचारित किए जाने की आवश्यकता पर कोई गौर नहीं किया गया.

दरअसल ‘जंगली’ को शायद इस सब की अब उतनी दरकार भी नहीं रह गई लगती. रोज सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे तक अपने जंगल और अपने पौधों के बीच काम में लगे रहने वाले जगतसिंह चौधरी का बेटा और भतीजा उनके साथ रहकर प्रकृति के तमाम रहस्यों को सीख रहे हैं. मेहनत करना उनमें सबसे बड़ा रहस्य है.

हाल ही में उत्तराखण्ड वन विभाग ने जगत सिंह चौधरी की मेहनत को सलाम किया है. उत्तराखण्ड राज्य में वन विभाग का ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया गया है.

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अशोक पांडे

एक कवि और सोशल मीडिया पर गुदगुदाने वाले गद्य लेखक के रूप में स्थापित अशोक पांडे हल्द्वानी में रहते हैं. kabaadkhaana.blogspot.in उनका बेहद मशहूर ब्लॉग है और अब 'काफल ट्री' नाम की हिन्दी वैब पत्रिका के मुख्य सम्पादक हैं।