जो हाईकोर्ट नैनीताल के लिए बेहद चिंतित दिखता है, क्या वही उसकी एक बड़ी मुसीबत भी बन गया है?


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गोविन्द पन्त राजू
April 20, 2018

नैनीताल में कई लोगों का मानना है कि उसका दो चरित्रों वाला शहर बनकर रह पाना बेहद मुश्किल है. वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है या फिर हाईकोर्ट का…

एक मई के बाद अगर आप नैनीताल जाने की सोच रहे हैं और अपने ही वाहन से जाने की सोच रहे हैं तो पहले अपनी पार्किंग की व्यवस्था पक्की कर लें. अन्यथा आपको वहां से बैरंग वापस लौटना पड़ सकता है. नैनीताल हाईकोर्ट ने नैनीताल को ईको सेंसटिव जोन घोषित करने के मामले में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जिला प्रशासन को एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है – एक मई के बाद निजी वाहनों से आने वाले पर्यटकों को पार्किंग की अग्रिम व्यवस्था का प्रमाण देने के बाद ही शहर में प्रवेश करने दिया जाए. अदालत ने यह भी कहा है कि इस बारे में पर्याप्त प्रचार करने के लिए चार राष्ट्रीय समाचार पत्रों में विज्ञापन भी दिए जाएं.

नैनीताल में पार्किंग की समस्या को देखते हुए हाईकोर्ट को इस तरह के निर्देश देने पड़े हैं. नैनीताल शहर में पर्यटकों का बढ़ता दबाव और वाहनों की बढ़ती संख्या अब एक बड़ी समस्या बन गई है. भीड़ के चलते अनेक बार ऐसी स्थितियां बन जाती हैं कि पूरे दिन वाहन सड़कों पर कुछ मीटर भी आगे नहीं बढ़ पाते. नैनीताल शहर का एक मात्र खेल मैदान बरसों से पार्किंग के काम में आ रहा है. मगर अब इससे भी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा रहा. हाईकोर्ट ने अब इस खेल मैदान के पार्किंग के लिए दुरूपयोग पर भी नाराजगी जताई है.

हाईकोर्ट की इस सख्ती से यह तो समझ में आता है कि वह एक पर्यटक शहर के रूप में नैनीताल की बदहाली को लेकर कितना चिंतित है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि नैनीताल की इस बढ़ती बदहाली के लिए वह भी किसी न किसी रूप में जिम्मेदार है.

झील के चारों ओर बसे नैनीताल शहर पर आबादी का दबाव अपने सेचुरेशन पाइंट को बहुत पहले ही पार कर चुका है. पर्यावरण और भूगर्भीय खतरों के चलते नैनीताल में निर्माण कार्यो पर कई तरह के प्रतिबंध भी लागू हैं. भूगर्भीय दृष्टि से नैनीताल कितना संवेदनशील है इसका पता सितंबर 1880 के उस भयावह भूस्खलन से चलता है जिसमें 151 लोग मारे गए थे और कई इमारतें जमींदोज हो गई थीं.

उस दुर्घटना के बाद अंग्रेजों ने वैसे किसी दूसरे हादसे से बचाने के लिए नैनीताल के कमजोर पहाड़ी क्षेत्रों में भवन निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया. पूरे शहर की पहाड़ियों से बारिश के पानी की एक-एक बूंद को नालियों के जरिए नियंत्रित करके झील तक पहुंचाने के लिए 90 मील लम्बी नालियों का जाल बिछाया गया. लेकिन 90 के दशक के बाद यहां अवैध निर्माणों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह हाईकोर्ट की स्थापना और तमाम प्रतिबंधों के बावजूद थमा नही है. उल्टे हाईकोर्ट बनने के बाद शहर में उसकी जरूरतों के हिसाब से नए निर्माणों की शुरूआत हो गई.

सचिवालय भवन में हाईकोर्ट की स्थापना के बाद कुमाऊं विश्वविद्यालय के ब्रुकहिल हॉस्टल, वन विभाग के कैंटन लॉज तथा सिल्विकल्चर विभाग के भवन अब हाईकोर्ट की संपत्ति हो चुके हैं. दो सौ मीटर दूरी पर आर्डवैल तक की सारी राज्य संपत्ति भी अब उसके अधीन ही है. इसके अलावा नैनीताल के दर्जनों सरकारी कार्यालय भी कोर्ट के ही कारण अन्यत्र स्थानांतरित कर दिए गऐ हैं. कभी उद्यान विभाग का उद्यान नैनीताल में पर्यटकों के आकर्षण का बड़ा केंद्र था. अब इसका भी एक बड़ा हिस्सा हाईकोर्ट के वकीलों के चैंबरों में बदल चुका है. वहां पर मौजूद भारी भरकम ओवर ब्रिज पर्यावरण के प्रति उपेक्षा का प्रतीक जैसा लगता है.

एक ओर हाईकोर्ट नैनीताल के अवैध निर्माणों पर कड़ा रूख अपनाता रहा है मगर खुद उसके लिए कैंटन लॉज इलाके में ‘नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कार्पोरेशन लिमिटेड’ के जरिए 84 टाइप एक भवन, घरेलू कर्मचारियों के लिए छह भवन और न्यायाधीशों के लिए चार भवनों का निर्माण करवाया जा रहा है. गौरतलब है कि यह निर्माण उसी इलाके में कराया जा रहा है जो नैनीताल झील का मुख्य जलग्रहण क्षेत्र है और भूस्खलन संभावित क्षेत्र माना जाता है. लगभग 400 कमरों वाले इस निर्माण पर एनएलआरएसएडीए (नैनीताल लेक रीजन स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) भी अपनी आपत्ति जता चुका है. लेकिन मामला हाईकोर्ट से जुड़ा होने के कारण निर्माण कार्य पर रोक नहीं लग सकी.

शहर में कई अवैध निर्माण कार्य भी हाईकोर्ट की आड़ में हुए हैं. यहां के कुछ वकीलों पर अवैध निर्माणों के आरोप लग चुके हैं. इसके अलावा कुछ वर्ष पूर्व एक स्थानीय जज साहब ने शेर का डांडा क्षेत्र के अत्यधिक संवेदनशील इलाके में पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर अपने घर तक के लिए एक मोटर सड़क ही बनवा दी थी. इस सड़क के कारण नैनीताल के इस ऊपरी इलाके में वाहनों की आवाजाही तो बढ़ी ही, जुलाई 2015 में यहां एक बड़ा भूस्खलन भी हुआ. इससे हजारों टन मलवा झील में भर गया था.

गर्मियों में पर्यटकों को पार्किंग का इंतजाम करके आने का निर्देश देने वाले हाईकोर्ट ने नैनीताल में सामान्य लोगों की एक प्रमुख पार्किंग को भी अपने वकीलों के लिए आरक्षित कर दिया है. उसके निर्देश पर जिला प्रशासन ने मेट्रोपोल होटल की एक बड़ी पार्किंग हाईकोर्ट के वकीलों के लिए आरक्षित कर दी है. इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने जिला अदालत के वकीलों के लिए भी शहर में पार्किंग आरक्षित करने के बोर्ड लगाने शुरू कर दिए हैं. एक और नैनीताल में पार्किंग नियमों में थोड़ी सी चूक होने पर दस हजार रूपए तक का जुर्माना लग चुका है और दूसरी ओर वकीलों के लिए आरक्षित पार्किंग निःशुल्क हैं. इस मुद्दे को लेकर स्थानीय जनता में काफी रोष है और नैनीताल के नागरिक संगठनों ने अब इसका विरोध करना भी शुरू कर दिया है.

लेकिन समस्या सिर्फ इतनी नहीं है. हाईकोर्ट के न्यायाधीश जब शहर में निकलते हैं तो मल्लीताल में फौवारे के आसपास का इलाका उनके वाहनों की पार्किंग में बदल जाता है और पर्यटकों को उसके आसपास भी फटकने तक नहीं दिया जाता. पहले सीजन के भीड़भाड़ भरे दिनों में ही शाम छह बजे से आठ बजे तक माल रोड पर वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित की जाती थी मगर अब हाईकोर्ट की वजह से यह प्रतिबंध पूरे साल लागू रहता है. इस दौरान हाई कोर्ट के जजों को मॉल रोड पर इवनिंग वॉक करते देखा जा सकता है. उनकी देखा-देखी लोअर ज्यूडिशियरी के जज भी अब ईवनिंग वाक का मजा लेने लगे हैं.

ऐसे मौकों पर कई बार जजों के सुरक्षाकर्मी व गनर आगे-पीछे की जनता को तितर बितर करते हुए देखे जा सकते हैं. नैनीताल के बुजुर्ग इस स्थिति की तुलना अंग्रेजी राज के उन दिनों से करते हैं जब भारतीय लोगों का माल रोड पर चलना प्रतिबंधित होता था. ऐसे में जब शहर की बची-खुची सामान्य पार्किंग को निदान अधिवक्ताओं के लिए आरक्षित किया जाने लगा है तो एक बार फिर इसके औचित्य पर सवाल उठने लगे हैं.

‘संविधान के अनुसार किसी खास पेशे में होने के कारण कोई व्यक्ति विशेष नागरिक अधिकार हासिल नहीं कर लेता. सार्वजनिक पार्किंग स्थल कोर्ट की प्रापर्टी नहीं है, इसलिए इस तरह का आरक्षण वैध नहीं ठहराया जा सकता’ हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता आईबी सिंह कहते हैं.

नैनीताल के जनजीवन पर हाईकोर्ट का दखल जिस तरह से बढ़ता जा रहा है उसके कारण अब ऐसी चर्चाएं भी होने लगी हैं कि क्या उसे हाईकोर्ट की जरूरत है भी! ऐसी चर्चा करने वालों का मानना है कि नैनीताल के लिए दो चरित्रों का शहर बनकर रहना बड़ा मुश्किल है. वह या तो पर्यटकों का शहर हो सकता है या फिर हाईकोर्ट का. 600 से ज्यादा वकीलों, इतने ही स्टाफ और हर रोज आने वाले सैकड़ों मुवक्किलों के दबाव से यह बुरी तरह कराहने लगा है. पर्यटक शहर की मस्ती पर जिस तरह से हाईकोर्ट का आतंक छाया हुआ है, उससे यह सवाल उठने लगा है कि क्यों न उसे कहीं और ट्रांसफर कर दिया जाए!

इसके लिए यह तर्क भी दिया जा रहा है कि राजधानी और हाईकोर्ट अलग-अलग शहरों में होने से सरकारी मुकदमों में धन और समय का भारी अपव्यय हो रहा है. हालांकि ऐसा तर्क देने वालों को यह भी पता है कि नैनीताल की खूबसूरती का मोह ही ऐसा है कि हाईकोर्ट आसानी से उस पर अपना ‘विशेषाधिकार’ छोड़ने वाला नहीं है.

साभार: सत्याग्रह

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गोविन्द पन्त राजू

नैनीताल समाचार से पत्रकारिता शुरू करने के बाद नवभारत टाइम्स और आज तक में काम कर चुके गोविन्द पन्त राजू आजकल लखनऊ में टीवी चैनल 'एपीएन' के सलाहकार सम्पादक हैं.