जहरीली हो गयी है देश की हवा


नैनीताल समाचार
April 20, 2018

 

कुछ ही समय में पूरे देश की फिजाँ बदल गई है। दिसम्बर 2012 में दिल्ली में एक युवती के साथ चलती हुई बस में बलात्कार हुआ था तो पूरे देश में तूफान आ गया था। दिल्ली तो हफ्तों तक गम, गुस्से और प्रतिरोध में उबलती रही थी। उस वक्त पूरा देश इस पाशविकता के खिलाफ एकजुट था। मगर 6 साल में स्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। अभी जम्मू कश्मीर के कठुआ में एक आठ वर्षीया बालिका के साथ गैंगरेप कर उसकी हत्या कर दी गई तो उसका धर्म आड़े आ गया। धर्म के आधार पर पक्ष-विपक्ष में तर्क दिये जाने लगे। इससे ज्यादा घृणित और क्या हो सकता है कि अपराधियों को दण्डित करने की बात न की जाये, पीड़िता को न्याय दिलाने के बारे में बात न की जाये, बल्कि अपराध को धर्म के आधार पर तोला जाने लगे ? इन्सानियत अब न्यूनतम स्तर पर आ गई है। कुछ ऐसा ही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एस.सी. एस.टी. एक्ट में संशोधन करने के बाद हुआ। इस निर्णय के बाद दलितों द्वारा आहूत 2 अप्रेल के भारत बन्द के दौरान हुई हिंसा तथा इस बन्द की प्रतिक्रिया में कुछ अनाम संगठनों द्वारा 10 अप्रेल आरक्षण के विरोध में आहूत भारत बन्द के दौरान यह अनुभव हुआ कि जातीय आधार पर कितना बड़ा विभाजन इस देश में पैदा हो गया है। यह सही है कि तमाम कानूनों की तरह एस.सी.एस.टी. एक्ट का दुरुपयोग होता ही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर बातचीत हो सकती है। दलित संगठनों के गुस्से को समझने की कोशिश भी की जा सकती है। मगर उस रोज इन संगठनों पर हमले करने का क्या औचित्य क्या था ? इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि आरक्षण के विरोध में आहूत भारत बन्द के पीछे तो कोई संगठन भी घोषित रूप में नहीं था। सिर्फ सोशल मीडिया में ही यह आह्वान सामने आया और इसका असर ऐसा था कि अल्मोड़ा जैसे दूरस्थ क्षेत्र में तक बाजारें बन्द हो गईं। जो समाज धर्म और जाति के रूप में इस कदर बँट गया हो, उसका भविष्य क्या हो सकता है ?

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