जादूगर बुढ़िया और खुराफाती बालक


नैनीताल समाचार
February 4, 2018

दीवान नगरकोटी

बुढ़िया ने जैसे ही पोटली का मुंह खोल कर अन्दर झांका, पोटली की मधुमक्खियाँ बुढ़िया के मुँह पर चिपट गयीं। मधुमक्खियों के काटने से बुढ़िया का मुँह गुब्बारे सा फूल गया। वह बेहोश हो गयी।

मल्लाकोट के घने जंगल में एक बहुत पुराना वीरान महल था। उसमें एक जादूगर बुढ़िया रहती थी। वह रोजाना साधारण वेश में आस-पास के गांवों में घूमती रहती थी। उसे जहाँ भी कोई वस्तु अच्छी लगती तो वह तुरन्त अपने दायें हाथ की अंगुली से अपने को छूती और जादू-मंत्र से उस वस्तु को अपनी पोटली में डाल लेती।

इस तरह गांव भर की अच्छी-अच्छी कीमती वस्तुओं के अलावा घोड़े, बकरी, गाय आदि जानवर भी महल पहुँचने लगे। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि ये चीजें गुम कैसे हो रही हैं ? आखिर कौन है चोर ? पूरे इलाके के लोग परेशान हो गये। उन्होंने राजा से चोर को पकड़ने की फरियाद की। राजा ने दो सिपाहियों को गांव भेजा। पर बुढ़िया ने अपने जादू से सिपाहियों को भी अपने वश में कर लिया रास्ते में उसने राजकुमारी को खेलते देखा। उसकी नजर राजकुमारी के हार पर पड़ी। बस क्या था जादूगरनी ने अपनी मुस्कान के साथ ही उसे वश में कर लिया और हार लेकर जंगल को चल दी। दूसरे ही दिन पूरे इलाके में यह खबर फैल गयी। लोग कहने लगे जब राजमहल की राजकुमारी ही सुरक्षित नहीं है तो गांव वालों का क्या होगा। राजा चिन्ता में डूब गया। उसने राज्य में एलान करवा दिया कि जो भी चोर को पकड़वायेगा उसे राजा की ओर से बहुत बड़ा इनाम दिया जायेगा।

उस इलाके के एक गांव में इन्दर नाम का युवक रहता था। इन्दर के माता-पिता मेहनत करके अपना परिवार पालते थे। खेती-बाड़ी का काम काम इन दिनों बन्द था, सो घर में खाने के लिए अनाज भी नहीं था। वह जंगली फलों का तोड़ने जंगल की ओर निकल गया। जंगल में उसे जामुन का एक पेड़ दिखाई दिया जिस पर खूब जामुन पके थे। पेड़ पर चढ़ कर उसने खूब जामुन खाये फिर माता-पिता के लिए जामुन तोड़ने लगा। थोड़ी ही देर में उसने देखा कि एक सफेद चमकीले बाल वाली बुढ़िया लाठी टेककर चली आ रही है। पेड़ के नीचे आकर बुढ़िया बोली, नाती! मीठे-मीठे जामून अकेले ही खा रहा है ? अपने बूढ़े माता-पिता के लिए भी लेते जाना। हाँ, जरा संभल कर तोड़ना। जामुन की टहनी कच्ची होती है। पेड़ से नीचे मत गिर पड़ना। तुम सूखी टहनी पर पांव रखो और हरी टहनी हाथ से पकड़ लो फिर आराम से फल तोड़ना।

बुढ़िया की जादू भरी आवाज सुनकर बालक ने सूखी टहनी पर पांव रखे और हरी टहनी पकड़ी। पकड़ते ही उसके भर से टहनी टूटी और इन्दर धड़ाम से जमीन में गिर कर बेहोश हो गया। बुढ़िया ने उसे फौरन अपनी चादर में बांध कर पोटली में डाल लिया और उसे कन्धे में लब्काकर जंगल की ओर चल दी। जाते-जाते बुढ़िया थक गयी। एक जगह बुढ़िया न पोटली जमीन में रखी और पेशाब करने कुछ दूर चली गयी। तब तक पोटली में इन्दर को होश आ चुका था। उसने पास से गुजर रही घस्यारिनों से मदद मांगी और पोटली से बाहर निकल आया। बाहर निकल कर उसने चादर में गीली मिट्टी और पत्थर भर कर पोटली बन्द कर दी और भाग कर घर चला गया। कुछ देर बाद बुढ़िया लौटी और पोटली लेकर चल पड़ी। कुछ ही दूर चलने पर पोटली से पानी टपकने लगा। बुढ़िया बोली मुझ पर पेशाब करने की सजा मैं तुझे घर पहँुच कर दूंगी। घर पहँुच कर बुढ़िया ने अपनी लड़की से कहा, देखो मैं तुम्हारे लिए एक गुलाम लायी हूँ। इसने मुझे रास्ते में बहुत परेशान किया है। जरा इसकी मरम्मत तो कर दूँ । जैसे ही बुढ़िया ने पोटली खेली, चादर में मिट्टी व पत्थर निकले। उसे लड़के पर  बहुत गुस्सा आया। वह फिर से वेश बदलकर लड़के की तलाश में निकल पड़ी। उसे पक्का भरोसा था कि  वह लड़का जरूर जंगली फल खाने आयेगा। अबकी बार वह मेरे हाथ से निकल नहीं पायेगा।

लड़के की खोज में कई दिन बीत गये। एक दिन वह जंगल से गुजर रही थी। उसने देखा वही लड़का एक जगल पेड़ पर बैठा काफल खा रहा है। बुढ़िया ने फिर कहा मेरे बच्चे काफल की टहनी बहुत कच्ची होती है। अच्छी तरह काफल तोड़ना गिर मत पड़ना। तुम सूखी टहनी पर पाँव जमा लो और हरी टहनी पकड़ कर हिलाओ, ताकि पके काफल के दाने गिर जायें। तुम्हारी बदौलत मैं भी काफल खा लूंगी । मैं जमीन में अपनी चादर बिछा लेती हूँ।

बालक इन्दर बुढ़िया को पहचान गया। उसने जवाब दिया- मैं तुझे पहचान गया हूँ। तू वही जालिम बुढ़िया है। अब मैं तेरे बहकावे में आने वाला नहीं। बुढ़िया ने अनजान बनते हुए कहा, अरे, वह तो न जाने कौन जालिम थी। देखो मेरे दाँत सोने की तरह सुनहरे हैं। लड़का समझ न पाया कि जादू बुढ़िया के दांतों में है। जैसे ही उसने उसके दांतों की चमक देखी, वह उसकी बातों में आ गया। इन्दर ने जैसे ही बुढ़िया के कहे अनुसार सूखी टहनी में पांव रखा और हरी टहनी हिलाई वैसे ही टहनी टूट गयी और काॅलों के साथ लड़का भी बुढ़िया की चादर में आ गिरा। बुढ़िया ने फौरन पोटली बांधी और चल दी घर की ओर।

रास्ते भर थकान और प्यास के मारे बुढ़िया बेहाल थी। एक स्थान पर बुढ़िया को एक गधेरे में पानी बहने की आवाज सुनाई दी। उससे रहा न गया। उसने पोटली जमीन में रखी और पानी पीने चली गयी। पानी पीने के बाद वह आसपास लगे हिसालू-किलमोड़े खाने लगी। उधर इन्दर को लगा कि आसपास कुछ ग्वाले खेल रहे हैं। उसने उन्हें मदद के लिए नुकारा। ग्वालों की मदद से इन्दर पोटली से बाहर निकल आया। उसने तुरन्त जंगली मधुमक्खियों का एक बड़ा सा छत्ता उस पोटली में रख दिया। थोड़ी देर में बुढ़िया जब लौट आयी तो वह उस पोटली को लादकर चल पड़ी। मधुमक्खियों ने थोड़ी देर में बुढ़िया की पीठ पर डंक मारने शुरू कर दिये। उसने सोचा कि पोटली से बालक चिंकोटी काट रहा है। वह धमकाते हुए बोली खूब नाखून चुभा ले। अभी घर पहुंच कर उखाडूंगी तेरे नाखून। इन्दर चुपचाप पीछे-पीछे उसकी बातें सेन रहा था।

कुछ ही दूर पहुंचने पर जब मधुमक्खियाँ तेज काटने लगीं तो बुढ़िया को बहुत दर्द होने जगा। उसे बहुत गुस्सा आ रहा था। घर पहुंचते ही उसने अपनी पोटली जमीन में गिरा दी और लड़के को पीटने के लिए डंडा ले आई। बुढ़िया ने जैसे ही पोटली का मुंह खोल कर अन्दर झांका, पोटली की मधुमक्खियाँ बुढ़िया के मुँह पर चिपट गयीं। मधुमक्खियों के काटने से बुढ़िया का मुँह गुब्बारे सा फूल गया। वह बेहोश हो गयी। इन्दर ने देखा बुढ़िया की लड़की राजकुमारी का हार पहिने हुए है। वह दौड़ा-दौड़ा राजा के पास पहुँचा उसने हार का सुराग मिलने की बात बताई। राजा ने उसके साथ दो सिपाहियों को भेजा। तब तक बुढ़िया वहीं गिरी पड़ी थी।

सिपाही बुढ़िया और उसकी लड़की को राजा के पास ले गये। राजा के आदेश से बुढ़िया ने चोरी किया  हुआ सारा सामान गांव वालों को लौटा दिया। इन्दर को राजा की घोषणा के अनुसार ढेर सारा धन इनाम में मिला। उसकी चतुराई से खुश होकर राजा ने उसे अपने दरबारियों में भी शामिल कर लिया। अब इन्दर अपने परिवार के साथ मजे से रहने लगा। 

                                             -यह लोक कथा डॉ. दीवान नगरकोटी द्वारा संकलित कुमाउनी लोक कथाओं के संग्रह ‘चल तुमड़ी बाटे-बाट’ (प्रकाशक : दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, देहरादून) से ली गयी है.

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