गांधी आश्रम सेवाग्राम में गांधी शहादत पर प्रोफेसर अपूर्वानंद का मुख्य भाषण


नैनीताल समाचार
February 2, 2019

नैतिक व समतामूलक समाज के द्रोही हैं गांधी के हत्यारे

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इस्लाम हुसैन

गांधी आश्रम सेवाग्राम में गांधी शहादत पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर अपूर्वानंद को निमंत्रित किया गया था यह कार्यक्रम आश्रम में अवस्थित बापू कुटी की बांस की रेलिंग से बाहर की ओर प्रांगण में आयोजित किया गया था।

दो दिन पहले गांधी रसोड़े में भोजन करते समय कार्यक्रम पर बात करते हुए आश्रम प्रतिष्ठान के अध्यक्ष श्रीयुत प्रभु जी ने जब मुझे अपूर्वानंद जी के सेवाग्राम में बुलाने के बारे में बताया तो मुझे अपूर्वानंद जी के साथ हुई पिछली मुलाकातें याद आ गईं, जिसमें मेरी पहली मुलाकात इसी सेवाग्राम आश्रम में हुई थी अभी पिछले कुछ समय से हम कभी कभार व्ट्सऐप पर बात कर लेते।

प्रोफेसर अपूर्वानंद गांधीवादी नहीं गांधी के अध्येता हैं, यहां जब कार्यक्रम के आरम्भ में उनका परिचय देने के लिए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष महादेव भाई जब मंच पर आए तो उन्हांेने कहा प्रोफेसर अपूर्वानंद कोई गांधी भक्त नहीं हैं, वरन् गांधी के काल के विश्लेषक हैं इसलिए उनका आंकलन देशकाल परिस्थितियों के अनुसार होगा और जब अपूर्वानंद जी ने अपना वक्तव्य आरम्भ किया तो यह स्पष्ट हो गया कि उनका विश्लेषण गांधी हत्या के सम्पूर्ण परिदृश्य को स्पष्ट कर देगा।

इससे पहले महावीर भाई यह स्पष्ट कर चुके थे कि हत्या के ज्ञात 8 कुत्सित प्रयासों के अतिरिक्त दो और गांधी हत्या के प्रयास हो चुके थे। पर गांधीजी ने कभी उसको गम्भीरता से नहीं लिया था।

प्रोफेसर अपूर्वानंद ने इस बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि गांधी हत्या करने वाले केवल पाकिस्तान के विरोधी नहीं थे। वो इस बात के भी विरोधी थे कि भारत पाकिस्तान के बंटवारे के समय हिस्से में आए 55 करोड़ अदा करे। वह लोग भारत को गांधी दर्शन पर आधारित व समतामूलक नैतिक देश बनाने के विरोधी थे, गांधी हत्या से पूर्व की परिस्थितियों को स्पष्ट करते हुए गांधी के हत्यारों का मानना था कि गांधी ने हिन्दुओं को नामर्द बना दिया (उस समय की परिस्थितियों के अनसार भारत में बहुसंख्यकों) जो औरतों की तरह हो गए अर्थात वह मुसलमानों के आक्रामकता का जवाब अहिंसा से देने की बात करते हैं। प्रोफेसर अपूर्वानंद का कहना था कि कि यह महिलाओं के प्रति एक विरोधी व दकियानूसी विचारधारा तो है ही स्वस्थ समाज के लिए नकारात्मक धारा भी थी क्योंकि गांधी जी महिलाओं के प्रति किसी नकारात्मक सोच को समाज के लिए अशुभ मानते थे। इसी कारण गांधी के आवाहन पर देश की महिलाएं देश की स्वतंत्रता के लिए घरों से बाहर निकल गईं, और गांधी का यह विचार भी गांधी के हत्यारों को रास नहीं आया और वह इस विचार को हमेशा हमेशा के लिए कुचल देना चाहते थे।

गांधी की अहिंसा कोई निर्बल की अहिंसा नहीं थी वह समर्थ रहते हुए अल्पसंख्यकों की सुरक्षा वाली अहिंसा थी…और विचार गांधी हत्यारों की घृणा का आधार था। गांधी सर्वधर्म समानता में विश्वास करते थे उनकी सर्वधर्म प्रार्थना क्रमिक रूप से विकसित हुई जिसमें कुरान की आयतें भी सम्मलित हैं यह विचार भी गांधी हत्यारों के विश्वास के विरोध में थ। गांधी जी पूजा के लिए कभी मंदिर नहीं गए लेकिन दलितों को मंदिर में प्रवेश दिलाने के लिए अवश्य मंदिर गए, आश्रम में दलितों के प्रवेश व उनके साथ प्रवास करके अपने परिवार तक के बहिष्कार पर अपने विश्वास पर कायम रहे, गांधी की इस समानता की जीवनशैली ने भी गांधी के हत्यारों को उत्तेजित किया जो लोग गांधी के इस जीवन दर्शन के विरोधी थे उनका केन्द्र पूना था जहां एक खास विचारधारा पनपाई जा रही थी।

भारत बहुभाषी देश व बहुधर्म व संस्कारियों का मिला जुला देश है इस तथ्य को हर स्तर पर कुचलने दबाने का प्रयास करने वाले अल्पसंख्यकों की भारत में मौजूदगी को वे किसी भी स्थिति में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि गांधी का कहना था कि भारत में रहने वाले हर व्यक्ति चाहे वह किसी धर्म का हो उसका भारत में रहने का बराबर अधिकार है तथा उसकी सुरक्षा करना बहुसंख्यकों का कर्तव्य है। यह विचार गांधी के हत्यारों की विचारधारा के विपरीत था कि भारत में यदि मुसलमान रहते हैं तो वह पूरी तरह सुरक्षित रहें। वह भारत में यदि हैं तो दूसरे तीसरे दर्जे के नागरिक बनकर रहें।

गांधी के हत्यारे भारत को एक हिन्दू कट्टरपंथी देश बनाना चाहते थे जिसमें कुछ वर्गो की श्रेष्ठता स्थापित रहे अर्थात जो पाकिस्तान में गलत हुआ है। ठीक वही कट्टरता भारत की नियति बन जाए।

यही स्थिति भाषा को लेकर थी गांधीजी भारतीय भाषाओं की समानता व हिन्दुस्तानी भाषा को सम्पर्क भाषा के रूप में स्वीकार करते थे। जो कट्टरपंथियों को स्वीकार नहीं था। गांधीजी भारत-पाक बंटवारे के समय हुए बंटवारे की हिस्सेदारी को हिन्दुओं की हत्या से नहीं तोलना चाहते थे। हर हत्या का प्रतिकार न्यायोचित होना चाहिए, पर अनैतिकता से प्रतिकार करना गांधी के दर्शन में नहीं था और इसी अनैतिकता के अलमबरदारों ने अपनी कायरता को बहुत सोच समझकर गांधी हत्या में बदल दिया।

 

गांधी आश्रम सेवाग्राम
30जनवरी 2019

नैनीताल समाचार