इन चुनावों के निहितार्थ


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राजीव लोचन साह
March 15, 2018

अब गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा की पराजय से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का तिलिस्म टूटने लगा है और योगी आदित्यनाथ द्वारा उनका उत्तराधिकार प्राप्त करने की संभावनायें कमजोर पड़ गयी हैं।

सबसे बड़ा प्रान्त होने के नाते उत्तर प्रदेश देश की राजनीति की दिशा तय करता है। इसलिये गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र, जो न केवल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीट थी, बल्कि 1991 से आज तक लगातार भारतीय जनता पार्टी के कब्जे में रही थी और फूलपुर के उप चुनावों में भाजपा के प्रत्याशियों के हारने के गहरे निहितार्थ हैं। सबसे बड़ी बात तो इनसे केन्द्र के एन.डी.ए. गठबंधन में भाजपा की स्थिति कमजोर हुई है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने लोकसभा की 543 में से 282 सीटें जीती थीं, जबकि उसे अपने बलबूते पर सरकार बनाने के लिये मात्र 272 सीटों की ज़रूरत थी। उपचुनावों में लगातार मुँह की खाने के कारण तब से लेकर अब तक उसकी 11 लोकसभा सीटें घट चुकी हैं और अकेली पार्टी के रूप में वह स्पष्ट बहुमत से एक सीट नीचे आ चुकी है। यह सही है कि एन.डी.ए. गठबंधन की स्थिति अभी बहुत मजबूत है, मगर अब भाजपा के सहयोगी दल उसे आँखें दिखाने की स्थिति में आ गये हैं। इसे तेलुगू देशम के हाल के रवैये से देखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश के अन्दर निकाय चुनावों में मतदाता ने भाजपा से जो मोहभंग प्रदर्शित किया था, उसकी इन उप चुनावों ने पुष्टि कर दी है। उस वक्त भाजपा और उसके सहयोगी मीडिया ने इस तथ्य को छिपा दिया था, किन्तु उन चुनावों में प्रदेश के लगभग साढ़े तीन करोड़ शहरी मतदाताओं ने त्रिस्तरीय निकायों के 652 अध्यक्ष पदों में से भाजपा को 184, अर्थात् केवल 28 प्रतिशत, पद ही दिये थे। अर्द्ध शहरी निकायों में तो भाजपा 438 में से 100, यानी केवल 23 प्रतिशत पद ही प्राप्त कर पायी थी। भाजपा का वोट प्रतिशत, जो 2014 के लोकसभा तथा 2017 के विधानसभा चुनावों में करीब 40 प्रतिशत था, इन चुनावों पर गिर कर 30 प्रतिशत के करीब आ गया था। अब गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा की पराजय से यह स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का तिलिस्म टूटने लगा है और योगी आदित्यनाथ द्वारा उनका उत्तराधिकार प्राप्त करने की संभावनायें कमजोर पड़ गयी हैं।

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राजीव लोचन साह