आत्महत्या को मजबूर देश के किसानों का ऐतिहासिक “दिल्ली मार्च”


पुरुषोत्तम शर्मा
December 6, 2018
भाकपा (माले) महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य दिल्ली में किसानों के विरोध मार्च में आनंद विहार स्टेशन से रामलीला मैदान तक चले जत्थे का नेतृत्व करते हुए 17 किलामीटर पैदल मार्च कर रामलीला मैदान पहुंचे। अपनी मांगों को लेकर दिल्ली में पांच दिशाओं से रामलीला मैदान तक मार्च कर पहुंचे किसानों के इस जत्थे में उनके अलावा अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड राजाराम सिंह, पार्टी के पोलित व्योरो सदस्य कार्तिक पाल, किसान महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिव सागर शर्मा, राष्ट्रीय सचिव अशोक प्रधान, बिहार राज्य अध्यक्ष विशेश्वर यादव, सचिव रामाधार सिंह प्रमुख थे। मजनू टीला से रामलीला मैदान पहुंचे किसानों के एक और जत्थे का नेतृत्व किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड ईश्वरी प्रसाद कुशवाहा, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य कामरेड गुरुनाम सिंह और कामरेड गोरा सिंह ने किया।
किसानों का तीसरा जत्था अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक धावले, राष्ट्रीय सह सचिव बीजू कृष्णन के नेतृत्व में सराय कालेखां से, चौथा जत्था बृजवासन से स्वराज अभियान के योगेंद्र यादव के नेतृत्व में और पांचवां जत्था किशन गंज से पंजाब किसान यूनियन धकोंदा के नेता दर्शन पाल के नेतृत्व में रामलीला मैदान पहुंचा। घाटे की खेती के कारण आत्महत्या को मजबूर देश का हजारों
किसान आज  “ऐसी सरकार हमें मंजूर नहीं!!” कहते दिल्ली की सड़कों पर सुबह से देर रात तक मार्च करता रहा। दिल्ली मार्च का आह्वान देश के 210 किसान संगठनों की प्रतिनिधि अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने किया था। 29 ननवम्बर के इन पांच किसान मार्चों के बाद 30 नवम्बर को रामलीला मैदान से सँसद मार्ग तक  किसान मार्च करेंगे जहां किसानों की सभा होगी।शासम से देर रात तक रामलीला मैदान में किसानों के समर्थन में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुआ. एक तरफ जहां भाजपा ‘अयोध्या चलो’ का नारा देकर पूरे देश को हिंसा और नफरत की आग में झोंकना चाहती है, वही दूसरी तरफ देश भर के किसानों ने अपने हक़ और सम्मान के सवाल पर एकजुट होने के लिए ‘दिल्ली चलो’ का आह्वान किया है। किसान संगठनों के सांझा मंच _”अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति” (AIKSCC )_ के आह्वान पर देश भर से किसान मोदी सरकार की किसान विरोधी व जनविरोधी नीतियों के खिलाफ 29-30 नवंबर को दिल्ली मार्च में पहुंचे. अखिल भारतीय किसान महासभा के आह्वान पर भी बिहार, यूपी, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तमिलनाडु से किसान दिल्ली मार्च में शामिल हुए।
किसानों के दिल्ली मार्च की पृष्ठिभूमि
2014 के लोकसभा चुनाव में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा ने अच्छे दिन का झूठा वादा करते हुए, देश के किसानों से कर्ज माफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुरूप फसलों का डेढ़ गुना दाम देने का वायदा किया था. पर अपने साढ़े चार साल के शासन में इस सरकार ने न सिर्फ देश के किसानों के साथ खुला धोखा किया बल्कि अपनी कारपोरेट परस्ती के कारण आज देश को आर्थिक कंगाली के कागार पर खड़ा कर दिया है. जो मोदी सरकार घाटे की खेती के कारण आत्महत्या को मजबूर देश के किसानों की कर्ज माफी को तैयार नहीं है, वही सरकार देश के सभी संशाधनों पर कब्जा जमा कर अति मुनाफ़ा लूट रहे देश के बड़े पूंजीपतियों का साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए का बैंक कर्ज इसी साल बट्टे खाते में डाल चुकी है. इस सरकार ने अपने एक चहेते पूंजीपति के लिए जहां रफाल सौदे में महाघोटाला कर देश को चूना लगाया है, वहीं इनका खुला संरक्षण पाकर ललित मोदी, विजय माल्या, नीरव मोदी से लेकर मेहुल चौकसी जैसे कई लुटेरे देश के बैंकों का लाखों करोड़ रुपए लेकर देश से भागते रहे. और अब जब इस सरकार की लुटेरी और कारपोरेट परस्त नीतियों के कारण देश वित्तीय कंगाली के कागार पर खड़ा है, तो यह सरकार रिज़र्व बैंक के रिज़र्व फंड को निकाल कर देश को पूरी तरह कंगाल बनाने पर तुली है. इस सरकार द्वारा लागू की गयी नोटबंदी व जीएसटी के कारण देश के डेढ़ सौ से ज्यादा लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी और करोड़ों लोगों का रोजगार ख़त्म हो गया. आज रिज़र्व बैंक के आंकड़े साबित कर रहे हैं कि नोटबंदी की आड़ में भाजपा नेताओं के जरिए सारा काला धन सफ़ेद धन में बदल दिया गया. दिल्ली से लेकर देश भर के कई जिलों तक भाजपा के आलीशान पार्टी कार्यालयों की जमीन और इमारतों के लिए इसी दौर में काला धन जुटाया गया. अब यह सरकार नोटबंदी के दो साल बाद भी उसकी आडिट रिपोर्ट को जारी करने से भाग रही है.
अडानी-अम्बानी को टैक्स माफ़ी और किसानों पर लाठी और गोलीबारी
किसानों को राहत देने के बजाय मोदी सरकार ने ठान लिया है कि जब भी किसान भाजपा से चुनावी वायदे पूरे करने की मांग करेंगे, उनका दमन किया जायेगा. पिछले साल मध्‍य प्रदेश के मंदसौर में किसान हड़ताल के दौरान पांच किसानों को गोली मार दी गई. इसी साल दिल्‍ली आ रहे हजारों शांतिपूर्ण किसानों को बॉर्डर पर ही रोक कर उन पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और वाटर कैनन से हमला किया गया.
मंदसौर में किसानों पर गोली चलने के बाद जब केन्‍द्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह से पूछा गया तो जवाब देने की बजाय बड़ी बेशर्मी से उन्‍होंने कहा कि ‘योगा कीजिए’. भाजपा नेता वैंकय्या नायडू जो आज देश के उपराष्‍ट्रपति हैं, जब 2017 में केन्‍द्र में शहरी विकास मंत्री थे तब उन्‍होंने बयान दिया था कि ‘किसानों की कर्ज माफी तो आजकल फैशन बन गया है’. ऐसे भाजपा नेताओं और मंत्रियों की कमी नहीं है जो बार बार संकट में डूबे किसानों का मजाक उड़ाते रहते हैं. मोदी सरकार एक तरफ तमान कॉर्पोरेट कंपनियों को खुली लूट मचाने की छूट दिये हुए है
और दूसरी तरफ किसानों पर दमन जारी है.
आत्महत्या को मजबूर किसान और खाद्य संकट से जूझता देश 
आंकड़े बता रहे हैं कि मोदी के साढ़े चार साल के शासन काल में पचास हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. जबकि पिछले दो साल से इस सरकार ने राष्ट्रीय अपराध शाखा के किसान आत्महत्या से सम्बंधित आंकड़े जारी करना भी बंद कर दिया है. देश की आबादी लगातार बढ़ रही है, पर सरकार खेती की जमीन को कारपोरेट के हित में अधिग्रहित कर उसे लगातार कम कर रही है. यह इतनी बड़ी आबादी के देश की खाद्य सुरक्षा को खतरे में डालने का काम कर रही है. झारखंड और छत्तीसगढ़ के साथ ही दिल्ली तक में भूख से लगातार मौतें हो रही हैं, फिर भी मोदी सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस सिस्टम) को ख़त्म करने की दिशा में आगे बढ़ती जा रही है. आज हमारा देश अब तक के सबसे बड़े सूखे के सामने खड़ा है. महाराष्ट्र के मराठवाड़ा से लेकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश तक अभी से पानी के लिए त्राहि-त्राहि मचनी शुरू हो गयी है. पर इस सरकार ने तीन साल पहले पड़े भयंकर सूखे के बाद भी उससे निपटने के लिए कोई दीर्घकालिक या तात्कालिक कदम नहीं उठाया. बुलेट ट्रेन, ईस्टर्न फ्रेट कारीडोर, वेस्टर्न फ्रेट कारीडोर, गेल की गैस पाईप लाइन, राष्ट्रीय राजमार्गों और औद्योगिक गलियारों के साथ ही कोल ब्लाक व अन्य परियोजनाओं के लिए किसानों, आदिवासियों और ग़रीबों की जमीनों का देश भर में बलपूर्वक अधिग्रहण किया जा रहा है. घाटे की खेती के बाद बड़े पैमाने पर देश भर में हो रही बटाई खेती में लगे बटाईदार किसानों को यह सरकार किसान का दर्जा देने को तैयार नहीं है. इसके चलते इनको सरकार द्वारा दी जा रही सुविधा का लाभ नहीं मिलता है और न उनके उत्पाद की सरकारी खरीद होती है. मनरेगा योजना लगभग ठप्प है और भूमिहीनों, खेत मजदूरों को जमीन देने के बजाए पहले से बसे मजदूरों की बस्ती को उजाड़ा जा रहा है.
नफरत-हिंसा की राजनीति नहीं, किसानों को उनका हक़ और सम्मान दो 
मोदी सरकार द्वारा घोषित नया समर्थन मूल्य और पीएम आशा योजना देश के किसानों के साथ खुला धोखा है. खरीफ फसल के लिए मोदी सरकार द्वारा घोषित नई एमएसपी में सिर्फ नकद लागत और पारिवारिक श्रम जोड़ा गया है, जो यूपीए सरकार के समय से ही लागू है. यह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार +C 2 पद्धति (यानी खेत का किराया और बैंक ऋण के ब्याज) को भी कुल लागत में जोड़कर उसका डेढ़ गुना नहीं है. इसी तरह इस सरकार द्वारा घोषित पीएम आशा योजना किसानों के खुला धोखा और पूरी तरह फेल हो चुकी मध्यप्रदेश सरकार की भावान्तर योजना का ही जारी रूप है. ऐसी स्थिति में खुद के साथ हो रहे इस धोखे से देश भर के किसानों में मोदी सरकार के खिलाफ भारी गुस्सा है. देश के किसानों के गुस्से से घबराकर आज मोदी सरकार एक बार फिर से किसानों की इस एकता को धार्मिक उन्माद और मन्दिर-मसजिद का विवाद पैदा कर तोड़ना चाहती है. गौ रक्षा कानून के बाद गाय बैलों की बिक्री पर लगी रोक और संघी गौरक्षक गुंडों द्वारा मुश्लिम पशुपालकों की देश भर में भीड़ हत्या के बाद आवारा जानवरों की समस्या आज देश व्यापी विकराल समस्या के रूप में हमारे सामने खड़ी है.
अब नागरिक समाज भी आया किसानों के साथ
किसानों के दिल्ली मार्च को बड़े पैमाने पर देश और खासकर दिल्ली के नागरिक समसज ने पूरा समर्थन किया। शायद यह पहला मौका है जब किसी रैली या प्रदर्शन के लिए दिल्ली के लोगों में ऐसी सहानुभूति और सहयोग की भावना पैदा हुई। गुरुद्वारों से लेकर नागरिक संगठनों ने किसानों के किए खाने और चाय नास्ते और पानी का इंतजाम किया। एम्स, अलीगढ़ विश्व विद्यालय और दिल्ली प्रशासन के डॉक्टरों ने फ्री मेडिकल कैम्प लगाकर दिन रात किसानों को स्वास्थ्य सुविधा दी। बड़े पैमाने पर छात्र, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी , भूतपूर्व सैनिक और नागरिक संगठनों के लोग किसानों के इस मार्च के साथ कदम से कदम मिलाते दिखे। इस सब के लिए लंबे समय से वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ द्वारा देश भर में “नेशन फार फार्मर” नाम से चलाई गई मुहिम ने भूमिका बनाई।
किसानों का संसद मार्च-समर्थन में आया नागरिक समाज और देश का विपक्ष
29 नवम्बर को दिल्ली की पांच दिशाओं से चले किसानों के “दिल्ली मार्च” के बाद 30 नवम्बर की सुबह तक किसानों के जत्थे रामलीला मैदान पहुंचते रहे. यहाँ सुबह से ही किसान संसद मार्च की तैयारियों में लग गए थे. 8 बजते-बजते किसानों के जत्थे सजने लगे. रामलीला मैदान में किसानों की अलग-अलग सांस्कृतिक टीमें अपने साथियों में गीतों के जारिये जोश भरने लगी. इसमें सबसे ज्यादा आकर्षण भोजपुर
के जनकवि कृष्णकांत निर्मोही के गीतों का रहा. किसान महासभा के काउंटर पर सुबह आठ बजे जैसे ही उन्होंने क्रांतिकारी गीत गाने शुरू किए तो किसानों के साथ ही पण्डाल में आए मीडिया कर्मी भी उनकी और लपक गए. देश के मशहूर पत्रकार और नेशन फार फार्मर के संयोजक पी साईनाथ भी निर्मोही जी के गीतों पर काफी देर तक झूमते रहे. रात को हुए सांस्कृतिक कार्यक्रमों में (जो सिर्फ़ मनोरंजन पर आधारित थे) किसान आन्दोलन की इन सांस्कृतिक प्रतिभाओं को मौक़ा नहीं मिला था. 9 बजे से झंडे –बैनरों और प्ले कार्ड को लिए किसान अपने-अपने संगठन के बैनरों के पीछे कतार बनाने लगे थे. क़तार में लाल झंडों की बहुतायत थी. इसके साथ ही हरे, पीले, नीले, सफ़ेद सहित कई रंगों के झंडे लिए किसानों की कतारें इंद्र धनुष की तरह लग रही थी. लगभग साढे दस बजे किसानों का हुजूम रामलीला मैदान से सड़क पर आकर मार्च करने लगा. दोनों ओर की सड़क किसानों से पट गई. लगभग तीन किलोमीटर के इस मार्च में किसानों का जोश देखने लायक था. पिछले डेढ़ साल से आन्दोलन की निरंतरता को बनाते हुए एआइकेएससीसी के आह्वान पर किसानों का दिल्ली में यह दो दिन का चौथा
बड़ा मार्च था. इस बार ज्यादातर मीडिया भी किसानों के इस आन्दोलन की पूरी तरह उपेक्षा नहीं कर पाया.
सबसे आगे अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का मुख्य बैनर और प्रचार गाड़ी थी. मुख्य बैनर के पीछे एआइकेएससीसी के राष्ट्रीय संयोजक वी एम सिंह, जय किसान आंदोलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगेन्द्र यादव, महाराष्ट्र के सेतकारी संगठना के नेता राजू शेट्टी, अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष धावले, महासचिव हन्नान मौला, अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव राजाराम सिंह व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रेम सिंह गहलावत, लोक मोर्चा की प्रतिभा सिंदे, किसान सभा अजय भवन के राष्ट्रीय महासचिव अतुल अनजान, कर्नाटक रैयत संगठन से चंद्रशेखरन और आसा से किरन, तमिलनाडू के अय्याकंनु, किसान संघर्ष मोर्चा के
डॉ. सुनीलम, नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मेधा पाटकर, आल इंडिया किसान मजदूर सभा के आशीष मित्तल, भारतीय किसान यूनियन धकोंदा के नेता दर्शन पाल साउथ की संयोजक कविता, जय किसान आन्दोलन के नेता अभिक शाह, सहित एआईकेएससीसी की वर्किंग कमेटी से जुड़े तमाम प्रमुख किसान नेता चल रहे थे. उनके पीछे हजारों की संख्या में किसान जोशीले नारे लगाते बढ़ रहे थे. किसानों के हुजूम के बीच में किसान आन्दोलन की सांस्कृतिक टीमों के साथ ही दिल्ली आइसा व अन्य युवाओं-सांस्कृतिक संगठनों की टीमें भी क्रांतिकारी गीतों को गाते-झूमते किसानों का उत्साह बढ़ा रही थी. ट्रेड यूनियनों व नागरिक समाज के लोग और भूतपूर्व सैनिक न सिर्फ किसानों के मार्च के साथ चल रहे थे बल्कि सड़क किनारे किसानों को बिस्कुट, पानी देकर या प्लेकार्ड व बैनरों के साथ समर्थन में खड़े होकर किसानों का उत्साहवर्धन कर रहे थे.
संसद मार्ग में पहुँच कर किसानों का यह मार्च जन सभा में बदल गया. पूरा संसद मार्ग किसानों की भीड़ से पट गया था. सभा का पहला सत्र किसान नेताओं के संबोधन के लिए तय था. जिसमें एआइकेएससीसी के नेता वी एम सिंह, योगेन्द्र यादव, राजू शेट्टी, हन्नान मौला, राजाराम सिंह, अतुल अनजान, प्रतिभा सिंदे, चंद्रशेखरन, किरन, अय्याकंनु, डॉ. सुनीलम, मेधा पाटकर, आशीष मित्तल, दर्शन पाल और कविता
सहित तमाम प्रमुख किसान नेताओं ने सभा को संबोधित किया. किसानों के दिल्ली मार्च के लिए देश के नागरिक समाज का समर्थन जुटाने के अभियान में जुटे वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ और भूतपूर्व सैनिक संगठन के अध्यक्ष मेजर सतबीर सिंह ने भी सभा को संबोधित करते हुए किसानों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर साथ देने का वचन दिया. सभी किसान नेताओं ने मोदी सरकार द्वारा किसानों के साथ की गयी धोखाधड़ी और वादाखिलाफी के खिलाफ एकजुट होकर जवाब देने का आह्वान किया. किसान नेताओं ने कहा कि 2019 में इस धोखेबाज सरकार को उखाड़ फेंक कर ज्यादा से ज्यादा किसान समर्थक ताकतों को संसद में भेजा जाए. एक ऐसी सरकार देश में लाई जाए जो
किसान-मजदूर आन्दोलन के दबाव में काम करे. किसान महासभा के महासचिव राजाराम सिंह ने कहा कि कर्ज मुक्ति और लागत का ड्योढा दाम के सवाल पर जो लड़ाई हमने शुरू की है उसे अब इस देश में खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विस्तार तक पहुंचाना होगा ताकि फिर किसी संतोषी की भूख से मौत न हो. उन्होंने कहा हमारी आबादी बढ़ रही है और खेती की जमीन को कारपोरेट के पक्ष में लगातार अधिग्रहण किया जा रहा है. देश की आधी से ज्यादा जमीन बटाई पर हो रही है पर बटाईदार किसान को किसान दर्जा नहीं मिला है. खेती किसानी के सहायक रोजगार पशुपालन को बाधित कर कृषि अर्थव्यवस्था पर एक और हमाला हुआ है. मोदी सरकार हर मोर्चे पर फेल है. पांच साल की कोई उपलब्धि न पा कर यह सरकार एकबार फिर राम मंदिर के नाम पर धार्मिक उन्माद पैदा कर किसानों की एकता को तोड़ना चाहती है. पर किसानों ने तय कर दिया है कि भाजपा की विभाजन की राजनीति को करारा जवाब देना है. कैराना का उपचुनाव इसका जीता जगता उदाहरण है.
किसानों के मंच पर आये आज सभी देश के राष्ट्रीय नेता
सभा का दूसरा सत्र किसान समन्वय समिति द्वारा बनाए गए और संसद में व्यक्तिगत बिलों के रूप में पेश किये जा चुके किसान किसान ऋण मुक्ति विधेयक और लाभकारी मूल्य विधेयक को समर्थन देने वाले राजनीतिक दलों के लिए निर्धारित था. सभी दलों और उनके नेताओं को किसान संघर्ष समन्वय समिति ने आमंत्रित कर इसपर उनका समर्थन माँगा था. इस किसान मार्च को देश की विपक्ष की ज्यादातर पार्टियों ने न सिर्फ समर्थन दिया बल्कि उनके मुख्य नेता भी मंच पर पहुंचे. संसद मार्ग पर चल रही सभा में समर्थन देने आने वाले नेताओं में सर्वप्रथम भाकपा (माले) के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य पहुंचे. उन्होंने मंच के नीचे किसानों के साथ बैठकर कई किसान नेताओं के भाषणों को सुना. उनके अलावा इस सभा को संबोधित करने वालों में सीपीएम के महासचिव सीताराम युचुरी, जम्मू कश्मीर के
पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीबाल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी, राष्ट्रवादी काग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार, राजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव, टी डी पी के नेता के रवीन्द्र कुमार, सीपीआई के नेता डी राजा, आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद संजय सिंह, समाजवादी पार्टी के बंदायू से सांसद धरमेन्द्र यादव ने भी सम्बोधि किया.  गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवानी सहित बहुत से राष्ट्रीय नेताओं ने किसान मुक्ति मार्च में भाग लेकर किसानों के इस संघर्ष में उनका साथ देने का वायदा किया.
“किसान मार्च” में अखिल भारतीय किसान सभा और अखिल भारतीय किसान महासभा के जत्थे अलग से अपनी छाप छोड़ रहे थे. लाल झंडों, बैनरों, प्ले कार्ड, फैस्टून से सुसज्जित किसान सभा व किसान महासभा के जत्थों का नेतृत्व किसान सभा के सह सचिव बीजू कृष्णन, कृष्णा प्रसाद, एन के शुक्ला व किसान महासभा के जत्थे का नेतृत्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिव सागर शर्मा, जयप्रकाश नारायण राय, राष्ट्रीय सचिव ईश्वरी प्रसाद कुशवाहा,  पुरुषोत्तम  शर्मा
पुरुषोत्तम शर्मा