हैल्थकेयर : चमत्कार है या अभिशाप


mm
विनोद पाण्डे
February 14, 2018

क्यूबा में स्वास्थ्य सुरक्षा को इतना महत्व दिया गया है, जिसका विश्व में कहीं भी उदाहरण नहीं मिलता है।  इसे छह स्तरों पर बांटा गया है। प्राथमिक स्तर पर स्थापित केन्द्रों में भी विशेषज्ञ चौबीसों घंटे इन केन्द्रों में रहते हैं। प्रत्येक परिवार को एक परिवारिक डाक्टर आबंटित है, जो स्वस्थ रहने की स्थिति में भी प्रत्येक सदस्य की साल में एक बार पूर्ण जांच अवश्य करता है।

 

भारत की जनता से ‘60 साल के बदले 60 महीने’ मांगते हुए 2014 में नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री पद पर पहुँचे थे। अब 2019 में उन्हें यह हिसाब देना होगा कि क्या इन ‘साठ महीनों’ में वे कुछ उल्लेखनीय बदलाव कर पाये। मगर वे एक ऐसे कुशल राजनेता हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण विपक्ष को हताश और दिशाहीन बना दिया है। देश की अधिकांश संस्थाएँ उनके नियंत्रण में आ गई हैं। फिर भी देश की दशा उत्साहवर्धक नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान था कि 2018-19 का आर्थिक बजट चुनावी बजट होगा। इस अनुमान को पूरा करते हुए ताजा बजट में वित्त मंत्री ने कृषि क्षेत्र के लिये कुछ लुभावनी घोषणाओं करने के अलावा एक महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य बीमा योजना की घोषणा की है। इसमें 10 करोड़ परिवारों के लगभग 50 करोड़ लोगों का स्वास्थ्य बीमा करने का इरादा जाहिर किया गया है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि इन पचास करोड़ गरीब लोगों में अब कोई बीमार पड़ेगा तो उसे देश में उपलब्ध महंगे से महंगा इलाज मुफ्त मिलेगा। सचमुच देश के निर्धन लोग ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे!

देश में स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत खराब स्थिति में हैं। सरकारी अस्पतालों में डाक्टर नहीं होते। जहां वे होते हैं, वे किसी तरह की विशेषज्ञता नहीं रखते। पैरा मेडिकल कर्मचारी दक्ष नहीं हैं। उनकी कोई जिम्मेदारी तय नहीं है। सामान्य सी जांचें भी सरकारी अस्पतालों में नहीं हो पाती हैं। हो भी गयी तो उनकी विश्वसनीयता नहीं रहती। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की दशा तो और भी खराब है। इन स्थितियों में गंभीर बीमारियों को तो छोड़िये, सामान्य बीमारी में भी व्यक्ति को ऐसे निजी अस्पतालों की शरण में जाना पड़ता है जहाँ रोगियों को लूटने की घटनायें आम हैं। यदि कोई ऐसी योजना आ जाये जो हमें स्वास्थ्य के तमाम झंझटों से मुक्ति दे दे तो वह जनता में लोकप्रियता पायेगी ही। पर क्या सचमुच ऐसा है ?

मोदी की तमाम घोषणाओं के बारे में अब कहा जाने लगा है कि वे जैसी कही जाती हैं, वैसी होती नहीं। वह सिर्फ जुमलेबाजी होती है। तो इस नयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की सच्चाई क्या है ?

धन आबंटन नहीं

       इस योजना पर शक करने के कारण पहले दिन ही पैदा हो गये थे, क्योंकि यह दिखा कि इस योजना के लिए धन का आबंटन तो बजट में है ही नहीं। बाद में वित्त मंत्री द्वारा बताया गया कि इसके लिए 1,200 करोड़ रुपये का आबंटन किया जायेगा। पर यह धन कहां से आयेगा, इस पर स्पष्टता नहीं दिखी। उसके बाद वित्त मंत्री ने न्यूज चैनलों को दिये लम्बे इंटरव्यू में कहा कि शेयरों पर लगाये गये नये ‘दीर्घकालीन पंूजी लाभ कर’ से प्राप्त धन को इस योजना में लगाया जायेगा। अर्थशास्त्री मानते हैं कि 5 लाख रुपये के स्वास्थ्य बीमा का प्रीमियम कम से कम 5,000 रु. प्रति परिवार प्रति वर्ष होगा। इस आधार पर इस योजना कुल व्यय करीब 50 हजार करोड़ रुपया प्रति वर्ष होगा। यह इतनी बड़ी धनराशि है, जिसे इधर-उधर से बचे धन से जुगाड़ लगा कर पूरा नहीं किया जा सकता। वित्त मंत्री कहते हैं कि यह योेजना धीरे-धीरे लागू की जायेगी। मगर चूँकि स्वास्थ्य बीमा के प्रीमियम की अवधि एक साल होती है, अतः इसमें भुगतान भी हर साल करना होगा।

पिछली स्वास्थ्य योजना का क्या हुआ ?

       वित्त मंत्री ने पिछले साल के बजट में एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की घोषणा की थी, जिसमें कहा गया था कि स्वास्थ्य बजट, जो कि वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का मात्र 1.5 प्रतिशत है, को प्रति वर्ष 20 प्रतिशत की दर से बढ़ा कर 2025 तक सकल घरेलू उत्पाद का 2.50 प्रतिशत, यानी दुगुने से भी अधिक कर दिया जायेगा। पर इस वित्तीय वर्ष में इसे 20 प्रतिशत के सापेक्ष मात्र 5 प्रतिशत ही बढ़ाया गया। इस वर्ष पिछले वर्ष की नीति के स्थान पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की घोषणा कर दी गई। इससे स्वास्थ्य को लेकर सरकार की विश्वसनीयता संदिग्ध लगती है।

विश्व में स्वास्थ्य सुरक्षा

       विश्व के स्तर पर जन स्वास्थ्य के लिये क्यूबा का माॅडल सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अलावा दो अन्य प्रमुख माॅडल हैं। पहला अमरीका का, जहां पर स्वास्थ्य सुरक्षा निजी चिकित्सालयों के जिम्मे है। सरकारें जन स्वास्थ्य बीमा को अपना कर लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा देने का प्रयास करती है। ओबामा द्वारा शुरू की गई ‘ओबामाकेयर’ ऐसी ही एक योजना थी, जिसमें प्रत्येक नागरिक की स्वास्थ्य सुरक्षा सरकार द्वारा प्रदत्त बीमा योजना से की गई। यह योजना बहुत सफल नहीं रही और टंªप ने राष्ट्रपति पद सम्हालते ही इसे समाप्त कर दिया। दूसरा माॅडल यूरोप का है, जहां जन स्वास्थ्य के लिए बना सरकारी तंत्र इतना सुदृढ़ है कि कहा जाता है वहां राष्ट्राध्यक्ष से लेकर सामान्य श्रमिक तक एक ही अस्पताल में इलाज कराते हैं। वहाँ सरकारों ने बीमा के बजाय सरकारी अस्पतालों को इतना समृद्ध किया है कि उनमें सभी प्रकार के उपचार सामान्य दरों पर उपलब्ध रहते हैं।

क्यूबा का स्वास्थ्य सुरक्षा का माॅडल आदर्श है। वहाँ सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं से लेकर जटिल रोगों तक के लिए मजबूत चिकित्सा प्रणाली विकसित की गई है। इसे छह स्तरों पर बांटा गया है। प्राथमिक स्तर पर स्थापित केन्द्रों में भी चैबीसों घंटे विशेषज्ञ उपलब्ध रहते हैं। प्रत्येक परिवार को एक डाॅक्टर आबंटित है, जो स्वस्थ रहने की स्थिति में भी साल में एक बार परिवार के प्रत्येक सदस्य की पूर्ण जांच करता है। जिन क्षेत्रों में किसी खास रोग की आशंका ज्यादा रहती है, वहां उस रोग के लिए समय-समय पर जांच की जाती है। सामुदायिक पाॅलीक्लीनिक हैं, अस्पतालों का नंबर बहुत बाद में आता है। इस श्रंृखला के शीर्ष में चिकित्सा संस्थान आते हैं। संक्षेप में वहां पर हर रोगी को हर समय चिकित्सा सुविधा निःशुल्क उपलब्ध रहती है। वहां पर एक भी निजी चिकित्सालय नहीं है। 1991 में सोवियत संघ के विघटन और बाद में अमरीका द्वारा अनेक प्रतिबंध लगाये जाने के कारण क्यूबा के संसाधनों में भारी गिरावट आ गयी। तब वहाँ एक्यूपक्ंचर, होमियोपैथी, योग व प्राकृतिक चिकित्सा आदि गैर पारंपरिक पद्धतियों को अपनाया गया। आजकल वहां के स्कूलों में औषधीय पौधों के उगाने से लेकर उनसे उपचार करने के बारे में पढ़ाया जाता है। रेडियो और टेलीविजन में सामान्य रोगों में प्रमाणित विधियों से उपचार के बारे में बताया जाता है।

भारत में चिकित्सा सुविधा आम आदमी से दूर होने का कारण

       पिछले कुछ समय में चिकित्सा के क्षेत्र में चमत्कारिक विकास हुआ। विभिन्न प्रकार की जांचों, हृदय-मस्तिष्क की शल्य चिकित्सा, अनेक अंगों का प्रत्यारोपण आदि शुरू हो जाने के कारण अब तक असाध्य माने जाने वाले कई रोगों का इलाज संभव होने लगा है। मगर ये चिकित्साएँ बहुत विशेषज्ञता की माँग करती हैं, इसलिये अत्यन्त महंगी हैं। इनमें मुनाफा बहुत अधिक है और यह एक कमाऊ व्यापार का क्षेत्र बन चुका है, जिसके कारण कई बड़े उद्योग समूह इस अति विशिष्ट चिकित्सा में कूद चुके हैं। सामान्य चिकित्सा, जिनमें सामान्य जांचों से लेकर छिटपुट सर्जरी होती है, जो हमें पहले सरकारी अस्पतालों से मिल जाती थी, अब पूरी तरह उपेक्षित है। लाभ अपेक्षाकृत बहुत कम होने के कारण निजी व्यापारी इस प्राथमिक क्षेत्र में नहीं आते। चिकित्सकों की सांठगांठ से सामान्य रोगी को भी इन केन्द्रों को रेफर कर दिये जाने का एक नया व्यापार शुरू हो गया है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में चल रहे इस खेल के दुष्परिणाम मध्यम वर्ग से लेकर गरीब लोगों को भुगतने पड़ रहे हैं।

मगर जनता के स्वास्थ्य की इस समस्या का हल किसी भारी-भरकम, स्वप्नदर्शी स्वास्थ्य बीमा योजना से नहीं हो सकता। सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य की प्राथमिक व द्वितीयक सेवाओं को सुदृढ़ करना और चिकित्सा व्यापार पर नियंत्रण के लिये बहुत कडे़ नियमों को लाकर ही जनता को स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया करायी जा सकती हैं। इसके बगैर आम आदमी को स्वास्थ्य सुरक्षा देना असम्भव है। प्राथमिक स्तर पर चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करने से कई रोगियों को जटिल रोगों तक पहुंचने से बचाया जा सकता है। उदाहरण के लिए रक्तचाप जैसे सामान्य रोग पर समय पर जांच और एक रुपये प्रतिदिन की दवा से नियंत्रण हो सकता है। परन्तु प्रारम्भिक स्तर पर चिकित्सा न हुई तो यही सामान्य रोग गुर्दे तक को खराब कर देता है, जिसके इलाज पर लाखों रुपये खर्च कर के भी व्यक्ति सामान्य जीवन से वंचित हो जाता है। यही बात मधुमेह के बारे में भी कही जा सकती है।

कुल मिला कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की पहली जरूरत बुनियादी क्षेत्र में एक अच्छा और प्रभावी तंत्र खड़ा करने की है।

योजना के खतरे

       प्रस्तावित स्वास्थ्य बीमा योजना से बीमा कंपनियों के कारोबार और आय में जबर्दस्त बढ़ोतरी होगी। आज कल अधिकांश बीमा कंपनियां या तो विदेशी हैं या उनमें विदेशी निवेश है। निजी चिकित्सालयों का कारोबार भी बहुत बढ़ेगा। कुछ लोगों को निश्चित रूप से सुविधाएँ भी मिलेगीं। पर जन स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करने के बजाय निजी चिकित्सालयों को जन स्वास्थ्य का जिम्मा दे देने के खतरनाक परिणाम हांेगे। निजी अस्पतालों का आचरण बहुत ही खराब रहता है। अनावश्यक जांचें करवाना, बढ़ा-चढ़ा कर बिल लेना तो सामान्य है, कई बार तो रोगी के मर जाने के बाद भी उसे वेंटीलेटर पर रख कर उसके परिजनों से पैसे ऐंठे जाते हैं। उनकी कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है और न ही उन पर कोई निगरानी रखी जाती है। ऐसे में यदि स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत कोई गरीब इन अस्पतालों में पहंुचेगा तो उसके साथ क्या सलूक होगा ?

सरकार को यह बताना भी जरूरी है कि यह योजना क्या महज कुछ समय के लिए होगी, यानी तब कि जब तक सरकारी क्षेत्र के स्वास्थ्य के तंत्र को प्रभावी नहीं बना लिया जाता, या कि यह एक हमेशा चलने वाली योजना है, जिसमें बाद में बांकी बचे हुए नागरिकों को शामिल कर लिया जायेगा। यदि यह योजना स्थायी है तो इसका अर्थ यह होगा कि सरकार ने अब यह तय कर लिया है कि उसे अब सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ नहीं करना है। सम्भवतः सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बजट भी धीरे-धीरे खत्म कर दिया जाये। यह भारत जैसे गरीब देश के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है, क्योंकि अब यहाँ के सामान्य व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के लिये निजी क्षेत्र के रहमोकरम पर रहना होगा और प्राइवेट अस्पतालों की लूट को चुपचाप बर्दाश्त करना होगा। जो लोग सरकार की इस महत्वांकांक्षी स्वास्थ्य बीमा योजना में शामिल नहीं हो पायेंगे, उनके लिए चिकित्सा कराना और भी महंगा हो जायेगा, क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य तंत्र समाप्त हो चुका होगा। अगर असफल होने के कारण भविष्य में इस योजना को यदि वापस लेना पड़े तो सरकारी स्वास्थ्य के तंत्र को दुबारा बनाना खड़ा करना मुश्किल हो जायेगा।

मोदी की राजनीति में देश की भारी-भरकम समस्याओं का हल जनता की समझ में न आने वाले फटाफट फार्मूले से निकल आता है। लेकिन स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विशय पर इस प्रकार के प्रयोग करना किसी तरह दीर्घकालीन हित में नहीं है। इस चमत्कारी योजना के बजाय इसके यदि देश की वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों को विकसित किया जाये, रोगों के लिए निवारक उपायों को जन-जन तक पहंुचाया जाय, प्राथमिक व द्वितीयक स्वास्थ्य सुविधाओं को सुलभ कराया जाय तो गरीबों और देश का अधिक भला होगा। इस प्रकार के कार्यक्रम लंबी अवधि में परिणाम देते हैं, मगर स्थायी होते हैं। लेकिन मौजूदा दौर की फटाफट राजनीति में इनसे वोट नहीं मिलेंगे। चुनावी भाषणों में इस योजना का जिक्र कारगर होगा, क्योंकि कहा जा सकेगा कि पिछले 70 सालों में गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा नहीं था, जो अब दे दिया गया है।

mm
विनोद पाण्डे

प्रकृति और पर्यावरण में विशेष रुचि रखने वाले विनोद पांडे नैनीताल समाचार के प्रबन्ध सम्पादक हैं.