‘गौ रक्षा कानून’ कृषि अर्थव्यवस्था पर हमला


पुरुषोत्तम शर्मा
July 29, 2018

 

देश के जिन राज्यों में भी गौ रक्षा कानून लागू किया गया है मेरे खुद के सर्वे के अनुसार उन राज्यों में गौ—वंश की संख्या दो तिहाई तक कम हो गयी हैण् इससे देश भर में घाटे की खेती की मार झेल रहे छोटे व मध्यम किसानों के सामने आर्थिक संकट ज्यादा गहरा गया हैण् हमारे देश में छोटी व माध्यम जोतों की संख्या अस्सी प्रतिशत के करीब है। इसमें भी बहुतायत छोटी जोतों की है। यही कारण है कि यहाँ छोटी खेती या ग्रामीण मजदूरी पर निर्भर हर परिवार की आर्थिक आय का दूसरा बड़ा साधन पशुपालन भी है। यह हल बैल पर आधारित हमारी छोटी जोत की खेती का सहायक कारोबार भी है और मजदूरी पर निर्भर हर ग्रामीण गरीब का स्थाई सहायक रोजगार भीण् मगर गौ रक्षा कानून ने ग्रामीण ग़रीबों की आजीविका के इस दूसरे सबसे बड़े श्रोत पर भी हमला कर दिया है।

इसके दुष्परिणाम दो तरह से दिख रहे हैं, पहला खेती में लागत बढ़ गयी है। जिन छोटी जोतों को गरीब किसान अपने बैलों से जोतता था उसे अब किराए के ट्रैक्टर से खेत जोतने पड़ रहे हैं।
जिस गोबर को वह ईधन और खाद के रूप में इस्तेमाल कर रहा था उसकी जगह उसे अब ईधन और खाद बाजार से खरीदनी पड़ रही है। दूसरा बैलों और दूध की जरूरत के लिए उसे गाय भी पालनी होती थी। और हर साल बछड़े — गाय की बिक्री या बैलों की अदला बदली के साथ ही दूध की बिक्री से भी उसकी कुछ आय हो जाती थी। पर अब इस कानून के तहत गौ वंश की बिक्री पर लगी रोक के कारण ग्रामीणों ने गाय को पालना ही धीरे — धीरे छोड़ दिया है। किसान मुक्ति यात्रा के दौरान मैंने ग्रामीण भारत में देखा कि ग्रामीण आबादी में भूमिहीन और खेत मजदूरों में दलितों, आदिवासियों और मुसलामानों की ही मुख्य संख्या है। उन्होंने अपने सहायक रोजगार के रूप में या कुछ ने तो मुख्य रोजगार के रूप में भी गौ पालन को अपनाया था। पर अब गायों की बिक्री पर लगी रोक और मुश्लिम गौ पालकों को गौ तस्कर कह कर उनके खिलाफ लगातार संगठित की जा रही भीड़ हत्या के आतंक से ये लोग अब गाय पालना छोड़ रहे हैं।

तो क्या सचमुच गौ रक्षा कानून गायों की रक्षा कर रहा है ? क्या सचमुच इस कानून को लाने के पीछे गाय को पूज्यनीय बनाने और उसके वंश को बढाने की ईमानदार मंशा काम कर रही है ? गाय को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग करने वाले संघ परिवार के बड़बोले नेता क्या सचमुच में गाय की कद्र मां की तरह करते हैं ? आंकड़े तो ठीक उलटी तस्वीर पेश कर रहे हैं। केंद्र सहित आज देश के 20 राज्यों में भाजपा या भाजपा की साझा सरकारें काम कर रही हैं। इनमें से कई राज्यों में तो पिछले 15 — 20 वर्षों से गौ रक्षा कानून लागू है। भाजपा शाषित मध्य व उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में संघ परिवार की छत्रछाया में गौ रक्षा दलों के नाम पर समाज के तमाम आवारा और अपराधी लोगों के उन्मादी लुटेरे गिरोह काम कर रहे हैं। इन गिरोहों को भाजपा सरकार का खुला संरक्षण मिलने के कारण पुलिस के साथ भी इनका गठजोड़ बना है। यह रिपोर्ट समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर लगातार आती रही हैं कि कैसे हर थाना और हर राज्य से गायों की निकासी के लिए इन गिरोहों ने रेट बांधे हैं। यही कारण है कि इन राज्यों में गौ वंस की संख्या एक तिहाई तक घट गयी है। आखिर इस सवाल का जवाब कौन देगा कि जब गाएं बेची नहीं गयी और खाई भी नहीं गयी फिर इतने कड़े कानून और चप्पे — चप्पे पर सत्ता के संरक्षण में पल रहे गौ रक्षा दलों के बावजूद ये दो तिहाई गौ वंश कहाँ चला गया ? असल में इस कानून की आड़ में गौ रक्षा दलों के नाम पर बनाए गए इन लुटेरे गिरोहों का कारोबार खूब फल फूल रहा है।

मेरा गाँव तालेश्वर है जो तहसील स्याल्दे, जिला अल्मोड़ा उत्तराखंड में स्थित है। आज से 17 साल पहले उत्तराखंड में गौ रक्षा कानून लागू हुआ था। तब से अब तक मेरे गाँव में दो तिहाई पशुधन कम हो गया है। मेरे बगल का गाँव लालनगरी हैण् जब मैंने वहाँ के पूर्व प्रधान लीलाधर जोशी से गिनती कराई तो वहाँ भी इसी अवधि में दो तिहाई पशुधन कम निकला। इसी तहसील के कोटसारी गाँव में आज से 20 साल पहले 120 जोड़ा बैल लोगों ने पाले थे। वहाँ की आशा हैल्थ वर्कर धना देवी के अनुसार वहाँ अब कुल चार जोड़ा बैल बचे हैं। जिससे आप बाक़ी बचे पशुधन के आंकड़े की कल्पना खुद कर सकते हैं। उत्तराखंड के किसान नेता आनंद नेगी ने बताया कि भिक्यासैंण तहसील के हउली और डुमना गावों में भी दो तिहाई पशुधन कम हो गया है। पौड़ी गढ़वाल में थलीसैंण ब्लाक के मासूं, पजियाणाए किमोज, डांग, बसोला जैसे गावों का हाल भी यही है। पहाड़ के जिस भी जिले के लोगों से मैंने जानकारी ली सभी जगह एक सी स्थिति मिली। आज पहाड़ के गांवों में खेती के बंजर होने के प्रमुख कारणों में से गौ वंश की बिक्री पर रोक भी एक कारण है। क्योंकि हल बैल पर आधारित पहाड़ की खेती में गाय बैलों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगने के बाद किसानों ने गौ वंश को पालना लगभग छोड़ दिया है।

किसान मुक्ति यात्रा के दौरान मैंने मध्य प्रदेशए राजस्थानए गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, उडीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश में जगह — जगह सड़कों और शहरों में आवारा गायों के झुण्ड के झुण्ड देखे हैं। लोगों ने बताया कि गायों के ये झुण्ड न सिर्फ उनकी फसलों को नुकसान कर रहे हैं बल्कि सड़कों और राजमार्गों पर दुर्घटनाओं के भी बड़े कारण बन गए हैं। पंजाब में किसान नेता गुरुनाम सिंह का कहना है कि आवारा गायों से फसलों की रक्षा का सवाल पंजाब के किसानों का बहुत बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। उनका कहना है कि गौ रक्षा कानून लागू होने के बाद पजाब में बछड़ों और गायों की बिक्री पर लगी रोक के कारण किसान अब ज्यादा जानवर पालने में असमर्थ है और वह पालने की सामर्थ्य से ज्यादा बेकार जानवरों को खुला छोड़ने को मजबूर है। यही कहानी किसान नेता रामचंद्र कुल्हारी ने राजस्थान के गांवों की भी बयान की। राजस्थान ए गुजरात और मध्यप्रदेश में हर वर्ष हजारों गायें उन गौशालाओं में दम तोड़ रही हैं जिन्हें उनके बचाव और सुरक्षा के नाम पर बनाया गया है। जबकि इन गायों को पालने के नाम पर संघ परिवार से जुड़े गौशालाओं के संचालक भारी भरकम अनुदान और चन्दा वसूलते रहते हैं।

आज देश भर में और खासकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में संघ से जुड़े लोग गाय के मांस की झूठी अफवाह फैलाकर या गौ तस्करी की झूठी कहानी गढ़ पशुपालक मुश्लिम गरीब किसानों की लगातार भीड़ हत्या करा रहे हैं। केंद्र के मंत्री सहित भाजपा — संघ के नेता उन्हें खुला संरक्षण दे रहे हैं। पर वहीं भाजपा की सरकारें पांडुचेरी और अरुणांचल में लोगों को गौ मांस की कमी नहीं होने देने का आश्वासन दे रहे हैं। कश्मीर, तीन तलाक, जीएसटी और चुनाव को लेकर एक देश एक कानून का नारा लगाने वाले आरएसएस और भाजपा पांडुचेरी और अरुणांचल में गौ रक्षा कानून लागू करने और गौ मॉस खाने पर प्रतिबन्ध लगाने की बात नहीं करते हैं। असल में भाजपा, आरएसएस का गौ रक्षा का नारा अपनी साम्प्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति को आगे बढाने का एजेंडा है। इसका गौ रक्षा से दूर — दूर तक का भी रिश्ता नहीं है। गौ रक्षा कानून पूरी तरह किसान विरोधी और विभाजन कारी राजनीति को बढाने का कानून है। इस लिए किसान हित और देश हित में इस कानून को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की मांग किसान आन्दोलन के ऐजेंडे में शामिल करनी चाहिए।

पुरुषोत्तम शर्मा