गाँधी की राह को समर्पित एक जीवन


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उमा भट्ट
April 6, 2018

अम्बादत्त बहुगुणा और पूर्णादेवी की छठी सन्तान सुन्दरलाल का जन्म 9 जनवरी 1927 को टिहरी जिले के भागीरथी नदी के तटवर्ती गांव मरोड़ा में हुआ। गांव की पाठशाला से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्हें पढ़ने के लिए टिहरी भेजा गया। उन दिनों टिहरी में प्रजामण्डल आन्दोलन चल रहा था। टिहरी राजा की जेल में 84 दिन तक भूख हड़ताल कर प्राण त्यागने वाले श्रीदेव सुमन से उनका सम्पर्क हुआ और उनसे वे प्रभावित थे।

हिमालय में महात्मा गांधी के सिपाही: सुन्दरलाल बहुगुणा सुप्रसिद्ध भूवैज्ञानिक प्रो. खड्ग सिंह वल्दिया की नवीनतम कृति है। सन्दर्भ ग्रन्थ सूची के अतिरिक्त 186 पृष्ठों की यह पुस्तक सस्ता साहित्य मण्डल दिल्ली से 2017 में प्रकाशित हुई है, जिसमें श्वेत-श्याम एवं रंगीन चित्र भी दिये गये हैं। सुन्दरलाल बहुगुणा के संघर्षपूर्ण जीवन को इतने कम पृष्ठों में इस तरह समेटना कि उनके जीवन का एक खाका पाठकों के सम्मुख आ सके, यह कठिन कार्य इस किताब में किया गया है। जैसा कि प्रकाशक ने भूमिका में लिखा है, इसमें सुन्दरलाल बहुगुणा की कर्मयात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों को रेखांकित किया गया है। चिपको आन्दोलन का पर्याय बन चुके सुन्दरलाल बहुगुणा पर अब तक प्रभूत मात्रा में लिखा जा चुका है। स्वयं सुन्दरलाल बहुगुणा ने अपने कार्य-विषयों पर पर्याप्त लिखा है। अपने समकालीनों में सुन्दरलाल बहुगुणा तथा उनकी कार्यप्रणाली सर्वाधिक चर्चित एवं विवादग्रस्त रही है। स्थानीय स्तर पर उन्हें आलोचनाओं का शिकार बनना पड़ा है। बहुधा एकला चलो रे की नीति उन्होंने अपनाई है। महात्मा गांधी के अनुयायियों में उनकी सत्याग्रह के लिए अनशन पद्धति को बहुगुणा जी ने सर्वाधिक अपनाया है। परन्तु इस पुस्तक में लेखक ने उनके जीवन को साफ सुथरे ढंग से पाठकों के सम्मुख रखने की कोशिश की है जो नीतिगत विवेचकों के लिए नहीं, सामान्य पाठक वर्ग के लिए उपयुक्त है। सम्भवतः यही इस रचना का उद्देश्य भी है।
अम्बादत्त बहुगुणा और पूर्णादेवी की छठी सन्तान सुन्दरलाल का जन्म 9 जनवरी 1927 को टिहरी जिले के भागीरथी नदी के तटवर्ती गांव मरोड़ा में हुआ। गांव की पाठशाला से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्हें पढ़ने के लिए टिहरी भेजा गया। उन दिनों टिहरी में प्रजामण्डल आन्दोलन चल रहा था। टिहरी राजा की जेल में 84 दिन तक भूख हड़ताल कर प्राण त्यागने वाले श्रीदेव सुमन से उनका सम्पर्क हुआ और उनसे वे प्रभावित थे। श्रीदेव सुमन से खरीदी प्रिंस क्रोपोटकिन की पुस्तक नौजवानों से एक अपील प्रारम्भिक प्रेरकों में रही। श्रीदेव सुमन ने गांधीजी का सिपाही बनने की प्रेरणा दी। मां पूर्णादेवी का कठिन और कर्मठ जीवन और उनकी सुनाई कथाएं सुन्दरलाल को हमेशा याद रहीं। पहाड़ की धरती और पहाड़ की स्त्री का दर्द वे कभी भूले नहीं। लाहौर से शिक्षा ग्रहण कर 1947 में टिहरी लौटकर सुन्दरलाल पुनः प्रजामण्डल आन्दोलन में शामिल हुए। आजादी के बाद एक कांग्रेसी कार्यकर्ता के रूप में सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हो गये। ठक्कर बाबा छात्रावास की स्थापना उनके प्रयासों से हुई। सरला बहन की शिष्या विमला बहन से विवाह के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। गांधी जी की शिष्या सरला बहन का उत्तराखण्ड में आना, आजादी की लड़ाई में भाग लेना और कौसानी में कस्तूरबा महिला उत्थान मण्डल की स्थापना करना उत्तराखण्ड के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। आजादी के बाद इस पिछड़े क्षेत्र में सर्वोदय की धारा से जुड़े रह कर अपने-अपने तरीके से काम करनेवालों की जो कतार बनी, उसने यहां के सामाजिक-राजनीतिक जगत को तो प्रभावित किया ही, पर्यावरण के प्रति विश्वव्यापी जागरूकता पैदा की और गांधीवादी तरीकों की अलख भी जगाये रखी। विमला बहन ने इस शर्त पर सुन्दरलाल बहुगुणा से विवाह किया कि वे सक्रिय राजनीति छोड़कर गावों में रहकर गांवों के विकास के लिए काम करेंगे। स्वयं सुन्दरलाल बहुगुणा गांधी जी की दूसरी शिष्या मीरा बहन को अपना गुरु मानते हैं जिन्होंने उन्हें प्रकृति के प्रति प्रेम व आदर करना सिखाया। इसी सीख ने उन्हें नदी, पेड़, जंगल, पहाड़, पशु-पक्षी, धरती सभी को बचाने के लिए काम करने को प्रेरित किया। जिस तरह सरला बहन और मीरा बहन के प्रभाववश सुन्दरलाल बहुगुणा जैसे व्यक्ति का विकास हुआ, यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सुन्दरलाल बहुगुणा ने भी एक नई पीढ़ी को तैयार किया जिसने अपने-अपने रास्ते चुने मगर समाज के लिए कार्य किया।
विमला बहन के आग्रह से सक्रिय राजनीति छोड़कर वे ग्राम सुधार के रास्ते पर चल पड़े और दम्पति ने टिहरी जिले के सिल्यारा गांव में नवजीवन आश्रम स्थापित कर शिक्षा का प्रचार, अस्पृश्यता का विरोध, शराबबन्दी के लिए आन्दोलन और वनों को बचाने की लड़ाई शुरू कर दी। वन आन्दोलन के अभियान को विश्व स्तर तक प्रचारित करने के लिए सुन्दरलाल बहुगुणा ने लगातार यात्राएं कीं। अस्कोट से आराकोट (1974) और कश्मीर से कोहिमा (1981-1982) दो बड़ी और कठिन यात्राएं साथियों के साथ कीं। नये-नये युवा साथियों की एक पीढ़ी तैयार की और निरन्तर इन आन्दोलनों पर लिखा। सिल्यारा आश्रम और अपनी गृहस्थी को विमला जी चलाती रहीं। टिहरी बांध विरोध के समय आश्रम छूट गया और सुन्दरलाल बहुगुणा बांध के खिलाफ लड़ते रहे। इस परिश्रम और उद्यम के प्रतिदान स्वरूप अनेक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें प्रदान किये गये। पुरस्कारों के साथ-साथ उन्हें अनेक बार अपमान, उपहास, उपेक्षा, अलगाव भी झेलना पड़ा जिसका उन्हें अहसास था और जिन्हें उन्होंने उपहारों की तरह संजोकर रखा था। 1987 में विज्ञान भवन, दिल्ली में कहा हुआ उनका कथन आज भी उतना ही सटीक है – अपने पर्यावरण के संरक्षण के लिए यत्न करना कदापि विकास विरोधी नहीं कहा जा सकता। स्वस्थ पर्यावरण एक चिरस्थायी अर्थव्यवस्था का मूलाधार है।
इस पुस्तक से सुन्दरलाल बहुगुणा के व्यक्तित्व की जो विशेषता उभरती है वह है उनकी कर्मठता और लगन। वे सतत यात्री रहे। ये यात्राएं कष्टप्रद थीं और अपनी खुशी के लिए न होकर समाज की भलाई के लिए थीं। यात्राओं के अनुभव मीठे भी रहे और कड़वे भी लेकिन अनुभवी कार्यकर्ता हर तरह की घटनाओं से सीख लेता है। धरना, अनशन, सत्याग्रह अपने देश में ही नहीं, अमेरिका में भी उन्होंने किया। महात्मा गांधी के सिपाही ने सत्याग्रह के एक अंग के रूप में आमरण अनशन को हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
यह पुस्तक पाठकों को भी पर्यावरण के प्रति गम्भीर बनाती है, सोचने ओर कुछ करने की प्रेरणा देती है। सुन्दरलाल बहुगुणा के परिवार, तत्कालीन ग्रामीण समाज आदि के बारे में अधिक जानकारी इससे नहीं मिलती। यह एक सम्पूर्ण जीवनी नहीं है। कहीं-कहीं प्रसंगों में समय का उल्लेख न होने से अधूरापन प्रतीत होता है। एक-दो स्थानों पर समय के उल्लेख में त्रुटि भी रह गई है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक की वही स्थिति हो जाती है कि सीमित जानकारी तो मिली लेकिन इतनी सहज-सरल भाषा में अधिक जानकारी कैसे मिले। वैज्ञानिक तथ्यों को सरल, स्पष्ट लेकिन सुसंस्कृत भाषा में प्रस्तुत किये जाने से पुस्तक की गरिमा में वृद्धि हुई है। पुस्तक के अन्तिम आवरण में दिया गया लेखक का विस्तृत अकादमिक परिचय विस्मय पैदा करता है कि एक वैज्ञानिक की रुचि और भाषायी क्षमता कितने व्यापक सामाजिक विषयों और व्यक्तियों तक जा सकती है। कुल मिलाकर सुन्दरलाल बहुगुणा के विषय में यह एक परिचयात्मक लेकिन पठनीय पुस्तक है जो अपनी रोचकता और लालित्य के कारण आकर्षित करती है।
हिमालय में महात्मा गांधी के सिपाही सुन्दरलाल बहुगुणा/ लेखक- खड्ग सिंह वल्दिया / सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली / पृष्ठ संख्या-187, मूल्य- 180

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उमा भट्ट

नैनीताल में रह रहीं डॉ. उमा भट्ट महिला पत्रिका 'उत्तरा' की सम्पादक हैं.