गांधी को समझे बिना गंगा की सफाई कैसे ?


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जय सिंह रावत
October 5, 2018

गांधीजी जब अप्रैल 1915 में कुम्भ के अवसर पर महात्मा मुन्शी राम से मिलने हरिद्वार पहुंचे तो उन्हें इस तीर्थनगरी और खास कर गंगा की गंदगी को देख कर बड़ा कष्ट हुआ। गंगा की इस भौतिक गंदगी से भी कहीं अधिक कष्ट उन्हें नैतिक गंदगी देख कर हुआ। गांधीजी की इस यात्रा और उनकी डायरी में लिखे यात्रा वृतान्त के बाद एक पूरी सदी गुजर गयी मगर राजीव गांधी के गंगा एक्शन प्लान और नरेन्द्र मोदी के नमामि गंगे में हजारों करोड़ रुपये गंगा में बह जाने के बाद भी करोड़ों मनुष्यों के पाप धोने वाली पतित पावनी का अपना मैल घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है। स्थिति यहां तक आ गयी है कि गंगा का पानी पीने लायक तो रहा नहीं मगर कई स्थानों पर उसके जलचरों के लिये जीने लायक भी नहीं रह गया है। इसका कारण यह कि योजनाकारों को केवल गंगा की भौतिक गंदगी ही नजर आई और गांधी जी की उन चिन्ताओं को दरकिनार कर दिया जिनके निराकण के बिना गंगा की चिरस्थाई पवित्रता बहाल करना संभव नहीं है।

भारत सरकार ने गंगा नदी के संरक्षण हेतु मई, 2015 में नमामि गंगे कार्यक्रम अनुमोदित किया था, जिसका कुल परिव्यय 20,000 करोड़ रूपए था। केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा राज्य सभा में दी गयी एक जानकारी के अनुसार एनएमसीजी द्वारा उसके प्रारंभ अर्थात वित्त वर्ष 2011-12 से लेकर 2018-19 में 30 जून, 2018 तक व्यय की गई राशि 4322.37 करोड़ रुपये थी। नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत 22238.49 करोड़ रुपये की लागत पर 221 परियोजनाएं मंजूर की गई हैं। केंद्र सरकार की तमाम रिपोर्टें गवाह हैं कि गंगा और उसके तटीय क्षेत्रों का भूजल लगातार जहरीला होता जा रहा है। गंगा में आर्सेनिक जैसे विषैले तत्व की मात्रा लगातार बढ़ रही है। गंगा की सहायक नदियों यमुना, रामगंगा, चंबल, गोमती-घाघरा, टोंस-कर्मनासा, गंडक-बूढ़ी गंडक, सोन, कोशी और महानंदा आदि नदियों का भी यही हाल है।

गांधी जी जब 1915 दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद अपने मित्र चार्ली एंड्रूज की सलाह पर शांति निकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने के बाद 5 अप्रैल को कुंभ के अवसर पर महात्मा मुन्शीराम से मिलने हरिद्वार पहुंचे तो इस तीर्थनगरी और खास कर गंगा की गंदगी को देख कर बड़ा कष्ट हुआ। गंगा की इस भौतिक गंदगी से भी कहीं अधिक कष्ट उन्हें नैतिक गंदगी देख कर हुआ। उन्होंने वहां भौतिक गंदगी के अलावा जो नैतिक गंदगी, पाखण्ड और अन्धविश्वास देखा उसका उल्लेख वह अपनी हस्तलिखित डायरी में अपने यात्रा वृतान्त में करना नहीं भूले। गांधीजी ने डायरी में लिखा है कि — ‘‘ऋषिकेश और लक्ष्मण झूले के प्राकृतिक दृष्य मुझे बहुत पसन्द आये।…परन्तु दूसरी ओर मनुष्य की कृति को वहां देख चित्त को शांति न हुयी। हरिद्वार की तरह ऋषिकेश में भी लोग रास्तों को और गंगा के सुन्दर किनारों को गन्दा कर डालते थे। गंगा के पवित्र पानी को बिगाड़ते हुये उन्हें कुछ संकोच न होता था। दिशा-जंगल जाने वाले आम जगह और रास्तों पर ही बैठ जाते थे, यह देख कर मेरे चित्त को बड़ी चोट पहुंची…।’’

गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर 1902 में जब गांधी जी भारत भ्रमण पर निकले तो वह 21-22 फरबरी को कलकत्ता से राजकोट को रवाना हुये तो रास्ते में काशी, आगरा, जयपुर और पालनपुर में भी एक-एक दिन रुके। उन पर काशी की गंदगी और भिक्षुओं का अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा। यहां के बारे में भी उन्होंने अपने यात्रा विवरण में इस तरह उल्लेख किया था — ‘‘सुबह मैं काशी उतरा। वहां कई ब्राह्मणों ने मुझे घेर लिया। उनमें से जो साफ सुथरा दिखाई दिया मैंने उसके घर जाना पसन्द किया। मैं यथा विधि गंगा स्नान करना चाहता था और तब तक निराहार रहना था। पण्डे ने सारी तैयारी कर रखी थी। मैंने पहले ही कह रखा था कि सवा रुपये से अधिक दक्षिणा नहीं दे सकूंगा। इसलिये उसी योग्य तैयारी करना। पण्डे ने बिना किसी झगड़े के बात मान ली। बारह बजे तक पूजा स्नान से निवृत्त हो कर मैं काशी विश्वनाथ के दर्शन करने गया। पर वहां पर जो कुछ देखा मन को बड़ा दुख हुआ। मंदिर पर पहुंचते ही मैंने देखा कि दरवाजे के सामने सड़े हुये फूल पड़े हुये थे और उनमें से दुर्गन्ध निकल रही थी। अन्दर बढ़िया संगमरमरी फर्श था। उस पर किसी अन्धश्रद्धालु ने रुपये जड़ रखे थे; रुपयों में मैल कचरा घुसा रहता है।’’ गांधीजी अपनी डायरी में एक जगह आगे लिखते हैं कि, ‘‘…मैं इसके बाद भी एक दो बार काशी विश्वनाथ गया किन्तु गन्दगी और हो-हल्ला जैसे के तैसे ही वहां देखे।’’

हरिद्वार जैसे धर्मस्थलों पर भौतिक और नैतिक गंदगी के बारे में गांधी जी ने डायरी में लिखा था कि — “निसंदेह यह सच है कि हरिद्वार और दूसरे प्रसिद्ध तीर्थस्थान एक समय वस्तुतः पवित्र थे। लेकिन मुझे कबूल करना पड़ता है कि हिन्दू धर्म के प्रति मेरे हृदय में गंभीर श्रद्धा और प्राचीन सभ्यता के लिये स्वाभाविक आदर होते हुये भी ह​रिद्वार में इच्छा रहने पर भी मनुष्यकृत ऐसी एक भी वस्तु नहीं देख सका, जो मुझे मुग्ध कर सकती। पहली बार जब 1915 में मैं हरिद्वार गया था तो मैं सहज ही बहुतेरी बातें आखों देख सका था …लेकिन जहां एक ओर गंगा की निर्मल धारा ने और हिमाचल के पवित्र पर्वत-शिखरों ने मुझे मोह लिया, वहां दूसरी ओर मनुष्य की करतूतों को देख मेरे हृदय को सख्त चोट पहुंची और हरिद्वार की नैतिक तथा भौतिक मलिनता को देख कर मुझे अत्यंत दुख हुआ। पहले की भांति आज भी धर्म के नाम पर गंगा की भव्य और निर्मल धार गंदली की जाती है। गंगा तट पर, जहां पर ईश्वर-दर्शन के लिये ध्यान लगा कर बैठना शोभा देता है, पाखाना-पेशाब करते हुये असंख्य स्त्री-पुरुष अपनी मूढ़ता और आरोग्य के तथा धर्म के नियमों को भंग करते हैं। तमाम धर्म-शास्त्रों में नदियों की धारा, नदी-तट, आम सड़क और यातायात के दूसरे सब मार्गों को गंदा करने की मनाही है। विज्ञान शास्त्र हमें सिखाता है कि मनुष्य के मलमूत्रादि का नियमानुसार उपयोग करने से अच्छी से अच्छी खाद बनती है। यह तो हुयी प्रमाद और अज्ञान के कारण फैलने वाली गंदगी की बात। धर्म के नाम पर जो गंगा-जल बिगाड़ा जाता है, सो तो जुदा ही है। …विधिवत् पूजा करने के लिये मैं हरिद्वार में एक नियत स्थान पर ले जाया गया। जिस पानी को लाखों लोग पवित्र समझ कर पीते हैं उसमें फूल, सूत, गुलाल, चावल, पंचामृत वगैरा चीजें डाली गयीं। जब मैंने इसका विरोध किया तो उत्तर मिला कि यह तो सनातन् से चली आयी एक प्रथा है। इसके सिवा मैंने यह भी सुना कि शहर के गटरों का गंदला पानी भी नदी में ही बहा दिया जाता है, जो कि एक बड़े से बड़ा अपराध है।’’

गांधी जी जब 1915 के कुम्भ में हरिद्वार पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि वहां 17 लाख श्रद्धालुओं की भीड़ एकत्र हुयी थी। लेकिन अब तो करोड़ों लोग चौबीस घण्टों के अन्दर हरिद्वार या इलाहाबाद में स्नान कर रहे हैं। सरकारी आकड़ों के अनुसार 2010 में हरिद्वार के कुंभ मेले में और उसके बाद 2013 में इलाहाबाद के कुंभ मेले में भी मुख्य स्नान के दिन 24 घंटे में एक से डेढ़ करोड़ लोगों द्वारा गंगा और संगम किनारे डुबकी लगाई। उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद कुंभ में 7 करोड़ तथा उत्तराखण्ड सरकार ने 9 करोड़ लोगों के जमा होने का दावा किया था। हर साल डेढ से दो करोड़ तक कांवड़िये गंगाजल भरने हरिद्वार आते हैं। इनके अलावा सालभर एक के बाद एक स्नान पर्वों पर करोड़ों लोग गंगा तटों पर एकत्र होते हैं। अगर गांधीजी इन महाकुम्भों में भी मौजूद रहते तो आप कल्पना कर सकते हैं कि उनकी डायरी में मां गंगा का क्या चित्रण होता! आज की तारीख में कोई भी प्रशासन एक साथ एक या डेढ करोड़ लोगों के बैठने के लिये हरिद्वार या इलाहाबाद में शौचालय नहीं बना सकता। और कोई अगर कहता है कि गंगा का तट ओडीएफ या खुले में शौच मुक्त हो गया या इतनी जल्दी हो जायेगा तो वह झूट बोल रहा है। गंगा की पवित्रता के लिये गांधीजी की चिन्ताओं पर गौर किये जाने की जरूरत है और गंगा के किनारे भौतिक गंदगी के साथ ही नैतिक गंदगी और अन्धविश्वास की सफाई की जरूरत है।

जयसिंह रावत
पत्रकार/लेखक
ई-11, फ्रेंड्स एन्क्लेव शाहनगर
डिफेंस कालोनी रोड,
देहरादून।

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जय सिंह रावत

देहरादून निवासी 63 वर्षीय जय सिंह रावत अनेक अखबारों में काम कर चुकने के बाद अब स्वतंत्र पत्रकारिता और स्फुट लेखन कर रहे हैं. 'स्वाधीनता आन्दोलन में उत्तराखंड की पत्रकारिता' उनके द्वारा लिखित एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है.