गैरसैंण राजधानी बनने से क्या होगा?


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रुपेश कुमार सिंह
August 8, 2018

निराशा! उदासी! क्षोभ! असंतोष! आन्दोलन!………… यह तसवीर है अपनी स्थापना के 18 वर्ष पूर्ण कर रहे उत्तराखण्ड की। जिस राज्य को हासिल करने के लिए यहां की जनता ने लम्बा संघर्ष किया और कुर्बानियां दीं, महज 18 साल में ही जनता के भीतर उस राज्य के गठन की सार्थकता पर चर्चाएं तेज होने लगी हैं। ‘‘इससे तो उत्तर-प्रदेश में ही ठीक थे’’ , जैसी बातें आम हैं। वास्तव में 18 साल में नौ मुख्यमंत्रियों की फौज, सत्तर विधायकों, अफसरों, दलालों, माफियाओं की नयी जमात के सिवाय राज्यवासियों को मिला ही क्या है? सरकारी प्रचार तंत्र भले ही चैतरफा विकास और खुशहाली के आंकड़ों की बाजीगरी में मस्त हो, पर लोग जानते हैं कि असलियत क्या है।

उत्तराखण्ड पृथक राज्य आन्दोलन जिन मूलभूत अवधारणाओं के साथ शुरू हुआ और परवान चढ़ा, वे सभी आज तक अधूरी हैं। बल्कि यह कहा जाये कि हाशिए से भी परे धकेल दी गयीं हैं, गलत न होगा। कांग्रेस-भाजपा दोनों ही बड़े राष्ट्रीय दलों ने लगभग बराबर-बराबर शासन किया है, लेकिन हालात नहीं सुधरे। उत्तराखण्ड के अन्तिम गांव तक विकास क्यों नहीं पहुंचा? इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति का न होना ही जिम्मेदार है। भय, भूख, भ्रष्टाचार, दलालों और माफियाओं से मुक्ति की छटफटाहट में जन्मे उत्तराखण्ड में आज सबसे ज्यादा चांदी काटी जा रही है तो इन्हीं के द्वारा।

आज प्रत्येक उत्तराखण्डी स्वयं को ठगा-सा महसूस कर रहा है। आन्दोलन का स्वर फिर से मुखर हो रहा है। इस बार जनता राजधानी गैरसैंण के लिए लामबंध हो रही है। कायदे में राज्य गठन के समय ही देहरादून की जगह गैरसैंण को राजधानी बनाया जाना चाहिए था। लेकिन प्रपंच के तहत तत्कालीन समय में भाजपा ने गैरसैंण से लोगों का ध्यान हटाकर नवगठित राज्य निर्माण के जश्न की ओर कर दिया। बाद में गैरसैंण सिर्फ एक मुद्दा बनकर रह गया। गैरसैंण राज्य का केन्द्र है। आन्दोलन के दौरान गैरसैंण को राजधानी के तौर पर ही गतिविधियों में शामिल रखा गया। राजधानी के रूप में लगातार गैरसैंण की चर्चा होती रही है। गैरसैंण का राजधानी के रूप में डवलप होना जन भावना और सामरिक महत्व से भी जरूरी है।

एक बार फिर नये जोश के साथ गैरसैंण का मुद्दा उठाया जा रहा है। गैरसैंण राजनीतिक मासला है। इसलिए संघर्ष भी राजनीतिक होना लाजिमी है। लेकिन सवाल उठता है, ‘‘क्या गैरसैंण राजधानी बनने से सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा?, क्या पृथक राज्य की मूल अवधारणा साकार हो पाएगी?, जो हस्र उत्तर-प्रदेश से अलग होकर उत्तराखण्ड का हुआ, क्या वही हाल देहरादून से राजधानी गैरसैंण शिफ्ट होने पर नहीं होगा?, सिर्फ राजधानी के मुद्दे पर जनता को उलझाकर सत्ता पक्ष बाकी बड़े सवालों से लोगों को काटने की जुगत में तो नहीं है?, क्या वास्तव में गैरसैंण आम उत्तराखण्डी की मांग है या फिर कुछ आन्दोलनकारी ही इसे मुद्दा बनाये हुए हैं?, सिर्फ गैरसैंण राजधानी बनने से क्या उत्तराखण्ड खुशहाली और विकास के रास्ते पर दौड़ने लगेगा?

राजनेता, अफसर, मंत्री-विधायक, दलाल, ठेकेदार, माफिया, बड़े पैसे वाले नहीं चाहते हैं कि राजधानी गैरसैंण बने। भाजपा-कांग्रेस तो कभी भी इस मुद्दे पर स्पष्ट नहीं हुईं। दिखावे के लिए गैरसैंण में विधानसभा सत्र बैठाने व कुछ औपचारिक कागजी कार्यवाही करने के सिवाय भाजपा-कांग्रेस ने कुछ नहीं किया। मंशा होती तो पिछली हरीश रावत सरकार गैरसैंण को स्थायी राजधानी बना सकती थी। मौजूदा भाजपा सरकार के लिए भी कोई रूकावट नहीं है। लेकिन नहीं! भाजपा-कांग्रेस के लिए गैरसैंण एक मुद्दा बना रहे, यही फायदेमंद है। आन्दोलनकारी, जनवादी शक्तियां जरूर गैरसैंण राजधानी के मसले पर आवाज बुलन्द करती रही हैं। नौजवानों की एक नयी खेप पुरजोर तरीके से वर्तमान में आन्दोलन को गति दे रही है।

इस सबके बीच उत्तराखण्ड के आम लोगों में गैरसैंण को लेकर कोई छटफटाहट नहीं हैं। व्यापक स्तर पर राज्य की जनता राजधानी के मामले पर शान्त है। राजधानी से आम लोगों को कोई काम ही नहीं पड़ता या राजधानी से बढ़कर और तमाम मुद्दें हैं, जो आम लोगों के लिए ज्यादा प्राथमिक हैं। कारण चाहे जो भी हांे पर यह सच है कि व्यापक जनता का गैरसैंण से कोई लेना देना नहीं है। राजधानी गैरसैंण बन जाये तो भी ठीक और देहरादून ही बनी रहे तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता आम जनता को। छोटे से राज्य में दो-दो जगह राजधानी का काम हो, यह तो बिल्कुल भी उचित नहींे है। गर्मी हुई तो सत्र पहाड़ में बैठा लिया, सर्दी हुई तो देहरादून में? ऐशगाह के रूप में राजधानी का इस्तेमाल कहां तक सही है? जनता के पैसे की बर्बादी आखिर क्यों? आवाम को यह सवाल हुकमरानों से करना ही चाहिए।

आज गैरसैंण राजधानी के साथ-साथ तमाम और मुद्दे भी बुलन्द किये जाने आवश्यक हैं। व्यापक जनता तभी राजधानी के मुद्दे पर साथ आयेगी, जब उसके बुनियादी सवाल उठाये जायेंगे। सिर्फ राजधानी बदलने भर से कुछ नहीं होगा। व्यवस्था और सत्ता में आमूल-चूल परिवर्तन ही उत्तराखण्ड की खुशहाली का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। इसके लिए गैरसैंण आन्दोलन का संचालन कर रहे व अन्य वरिष्ठ साथियों को कोई ठोस राजनीतिक विकल्प उत्तराखण्ड की जनता को देना ही होगा। घढ़ियाली आंसू बहाने वाले मगरमच्छों को बारी-बारी से चुनना राज्यवासियों की मजबूरी है, क्योंकि यहां ईमानदार, मजबूत और विचारबान स्थानीय राजनीतिक विकल्प नहीं है।

रोजगार, चिकित्सा और शिक्षा सबसे बड़े मुद्दे हैं उत्तराखण्ड के। बेतहाशा बढ़ता पलायन का मुख्य कारण भी यही है। रोजगार की गारण्टी, बेहतर चिकित्सा व शिक्षा के लिए प्रदेश भर में आन्दोलन शुरू होना चाहिए। इसके अलावा राज्य के औद्योगिक क्षेत्रों में स्थानीय बेरोजगारों को सत्तर फीसदी रोजगार, ठेकेदारी प्रभा बन्द कर कर्मचारियों की नियमितता, ग्राम पंचायत स्तर पर चारा बैंक व पशु पालकों के लिए प्रोत्साहन नीति, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली स्वरोजगार योजना का आकार बढ़ाना, प्रत्येक विकास खण्ड स्तर पर केन्द्रीय नवोदय विद्यालय खोलना, चीन-नेपाल सीमा के निकटवर्ती मार्गों को साल भर यातायात के लिए सुलभ बनाना, विकास के लिए पहाड़ की प्राकृतिक स्थिति के अनुकूल तकनीक का इस्तेमाल, ऊर्जा व पर्यटन विकास के लिए ठोस पहल, पर्वतीय क्षेत्रों के लिए एकीकृत औद्योगिक प्रोत्साहन नीति, प्रशासनिक सुधार आयोग की स्थापना, पंचायतों व निकायों को सत्ता का हस्तांतरण, खेल महाविद्यालय की स्थापना, प्रत्येक जिले में नारी निकेतन एवं बाल सुधार गृह की स्थापना, पर्वतीय क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों के उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराना, प्रत्येक जिले में भण्डार गृह की व्यवस्था, जमरानी व सौंग बांध का निर्माण, कृषि के विकास के लिए विशेष योजना, माल्टा, नींबू, अदरक, आलू या अन्य स्थानीय उत्पाद वाले क्षेत्रों में खाद्य संरक्षण इकाइयां बनाना, जंगल, वन्य जीव-जन्तु और खेती की सुरक्षा, यातायात दुरूस्त करना, सड़क को गांव तक पहुंचाना, प्रशासनिक व पुलिस व्यवस्था में सुधार, रोजगार आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना, गांव में रोजगार की गारण्टी, भ्रष्टाचार, बाहरी लोगों के जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक, खनन और शराब की व्यवस्था को पूर्णतः सरकारी नियंत्रण में करना, लोक संस्कृति को प्रोत्साहन, फिल्म और साहित्य को प्रोत्साहन आदि तमाम मुद्दे हैं जो उत्तराखण्ड की जनता को गहरे से प्रभावित करते हैं। आपदा प्रबंधन का पूरा तन्त्र विकसित करना सबसे जरूरी है। जंगलों में आग की रोकथाम भी प्राथमिक है।

इस सारे मसलों को उठाते हुए एक व्यापक जन आन्दोलन की ओर बढ़ना चाहिए। ऐसे जन आन्दोलन में व्यापक जन भागीदारी से राजनीतिक माफिया के प्रतिरोध में उत्तराखण्ड में सही राजनीतिक विकल्प और समुचित जन प्रतिनिधित्व का मार्ग प्रशस्त होगा। गैरसैंण राजधानी बनने पर भी उपरोक्त समस्याएं तभी हल होगी, जब सदन में जनता के अपने जनवादी प्रतिनिधि शामिल होंगे।

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रुपेश कुमार सिंह

दिनेशपुर (उधमसिंह नगर) में रहने वाले रुपेश कुमार सिंह 'प्रेरणा अंशु' नामक पत्रिका का संपादन करने के साथ—साथ फ्रीलांस पत्रकारिता करते हैं। वे रंगकर्म से जुड़े हैं और सामाजिक—राजनैतिक आंदोलनों में भी स​​क्रिय हैं।