कोई लौटा दो मेरा बचपन, कोई लौटा दो हमारी फूलदेई


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चारू तिवारी
March 15, 2019

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देणी द्वार भर भकार
तुमर देई म नमस्कार

फूलदेई आते ही बचपन याद आ जाता है। एक तरह से यह हमारे बचपन को प्रतिबिंबित करता है। प्रकृति से हमने उन्मुक्त, सरल, शांत, समभाव, सहयोग, सहकारिता, समरसता, सौहार्द का संदेश लिया, उसे आत्मसात करने की समझ हमें फूलदेई से मिली। हम छोटे थे तो फूलदेई की तैयारियों में लग जाते। पहला काम था ‘सारी’ में से मिझाउ के फूल तोड़कर लाना। अच्छे से अच्छे फूलों से टोकरी को सजाने की रचनात्मकता। हमने रचनात्मकता का पहला पाठ फूलदेई से ही सीखा। फूलदेई ने हमें प्रकृति के साथ चलना और प्रकृति की समरसता के पैगाम को भी आत्मसात करने की शक्ति प्रदान की। हम एक ऐसे समाज में रहते थे, जिसमें बहुत सारी वर्जनायें थी। बावजूद इसके फूलदेई उन वर्जनाओं को तोड़ देती थी।

फूलदेई जहां प्रकृति का स्वत:स्फूर्त त्योहार है वहीं उस समय हम बच्चों की बहुत सारी आकांक्षाएं फूलदेई से रहती थी। जिन भी घरों में जाते महिलाएं बहुत स्नेह के साथ अपने घर बुलाती। हमें देहरी के अंदर ही जाना होता था। जो संपन्न थे वे कुछ खाने के लिये बना देते, जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती थी वे तो कई दिन से किसी भी तरह हमारे लिये अच्छी—अच्छी चीजें रखते थे। उन्हें लगता था कि बच्चे आयेंगे तो उन्हें निराशा नहीं होनी चाहिये। गांव की महिलाओं में होड़ लगी रहती थी हमें ज्यादा चावल, ज्यादा गुड़ और पैसा देने की। उन दिनो एक, दो, तीन, पांच, दस, बीस, पच्चीस और पचास पैसे के सिक्के चलते थे। ज्यादतर घरों से अधिकतम पांच पैसे मिलते थे। जिन घरों से इससे ज्यादा पैसे मिलते थे, वहां हमारा विशेष ध्यान होता था। कई घरों से मिठाई भी मिल जाती थी।

मेरी ईजा तो पूरे घर को जैसे बच्चों के लिये भर देती थी। नये बच्चों की टोकरी को गांव के लोग विशेष रूप से भरते थे। गांव के सबको पता होता था कि किसके घर से नई टोकरी आने वाली है। बच्चों में इस बात की प्रतियोगिता भी होती थी कि किसकी टोकरी में ज्यादा चावल या गुड़ आया है। एक बार हम लोग फुलदेई खेल रहे थे। आराम करने के लिये एक खेत में बैठे थे। एक बैले उधर आ गया। वह मेरे पीछे पड़ गया। मैं ज्यादा दूर तक भाग नहीं पाया और मेरे हाथ से मेरी थाली गिर गई। मेरे सारे चावल, गुड़ और पैसे मिट्टी में मिल गये। मैं रोने लगा। बच्चों ने सांत्वना दी। लेकिन सालभर की कमाई एक झटके में चली गई। आज भी उस फूलदेई की कमाई को खोने की कसक बाकी है।

एक ऐराड़ी के प्रेमसिंह थे जो हमारी ‘सिमतया’ में अकेेले एक मकान में रहते थे। हम उनके नींबू चुराते थे। उनके यहां अंगूर भी थे उन्हें भी हम चुराते थे। वे हमें ढूढते रहते थे, लेकिन हम हाथ नहीं आते। साल में फूलदेई के दिन उनके देहरी में जाते फूल लेकर तो उन्हें याद ही नहीं रहता कि यही हैं वे बच्चे जिन्हें उनकी तलाश रहती थी। वे भी हमें बहुत सारे चावल देते। प्रेम सिंह ही ऐसे थे जो हमें गुड़ की जगह मिसरी देते थे। एक और थे कमलापति जी। वे हर फूलदेई पर हमें याद आते हैं। उनका घर हमारे खेल के मैदान के पास था। हमेशा हमारे क्रिकेट की बाल उनके सब्जियों के खेतों में चली जाती। हम जब बाल लाने जाते तो उनकी सब्जियों को नुकसान होता। वे पहरेदारी में रहते। जब उनके हाथ बाल आ जाती तो युद्ध का नया मैदान खड़ा हो जाता। हमने उनसे बदला लेने का नया तरीका ढूंढा। कमलापति जी शाम को हाथ में लोटा लेकर दीर्घ शंका से निपटने जाते। हम सब बच्चे पत्थर से उनके लोटे को निशाना बनाते। उनके साथ हमारा यह ‘युद्ध’ आखिरी समय तक चला। लेकिन फूलदेई के दिन सबके ज्यादा गुड-चावल हमें कमलापति जी से ही मिलता था। फिर लौटा दो कोई मेरा बचपन, कोई लौटा दे हमारी फूलदेई।

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चारू तिवारी

दिल्ली में रह कर फ्रीलान्स रूप से पत्रकारिता कर रहे चारू तिवारी उत्तराखंड के आन्दोलनों की परम्परा से सक्रिय रूप से जुड़े हैं.