एक काबिल जज के साथ अन्याय


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राजीव लोचन साह
May 1, 2018

हमारे एक काबिल न्यायाधीश के साथ बहुत अधिक ज्यादती की जा रही है। मगर हमारी चिन्ता यह है कि इस मामले में कोई गुस्सा या नाराजी उत्तराखंड में परिलक्षित नहीं हो रही है। उत्तराखंड की बार काउंसिल और बार एसोसिएशन का इस मामले में होठ सिये रहना बेहद रहस्यपूर्ण लग रहा है।

न्यायपालिका में अजीबोगरीब घट रहा है। जनवरी के महीने में सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम जजों द्वारा प्रेस कांफ्रेंस कर देश की सबसे बड़ी अदालत के भीतर के हालातों पर चिन्ता व्यक्त करना मानो पर्याप्त नहीं था। मगर लगता है कि किसी भी पक्ष ने उस अभूतपूर्व घटना से कोई सबक नहीं सीखा। अब हालात मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग से लेकर जजों की नियुक्ति में सरकार के अवांछित हस्तक्षेप तक पहुँच गये हैं। सर्वोच्च न्यायालय के भीतर कथित रूप से संदिग्ध तरीके से कामकाज होने की परिणति कांग्रेस तथा कुछ अन्य विपक्षी दलों द्वारा राज्य सभा में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव लाने के रूप में हुई। मगर जितनी जल्दबाजी इन विपक्षी दलों ने महाभियोग प्रस्ताव लाने में दिखाई, उतनी ही उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने इसे खारिज करने में दिखा दी। अब सरकार द्वारा कालेजियम द्वारा नियुक्ति के लिये भेजे गये दो नामों में से एक नाम को खारिज कर देने से एक नया विवाद उठ खड़ा हुआ है। तमाम मुद्दों की तरह इस मुद्दे पर भी तर्क-वितर्क चरम पर है। देश के हालात ऐसे हैं और मीडिया उसे हवा देने में सबसे आगे है कि आधी रात को दिन-दोपहर साबित करना भी फिलवक्त असम्भव नहीं है। कुछ साल पहले तक कौन सोच सकता था कि एक छोटी सी बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर देने के मामले में भी राजनीति और मीडिया के भीतर सहानुभूति की कोई दमदार लहर पैदा हो सकती है ? आरोपी पक्ष ऐसे मामल में बचाव की मुद्रा में ही रहते थे। अब ‘पोस्टट्रुथ’ के कारण चोरी और सीनाजोरी पूरी तरह से युगधर्म बन गई है। उत्तराखंड में हमें विशेष रूप से लग रहा है कि हमारे एक काबिल न्यायाधीश के साथ बहुत अधिक ज्यादती की जा रही है। मगर हमारी चिन्ता यह है कि इस मामले में कोई गुस्सा या नाराजी उत्तराखंड में परिलक्षित नहीं हो रही है। उत्तराखंड की बार काउंसिल और बार एसोसिएशन का इस मामले में होठ सिये रहना बेहद रहस्यपूर्ण लग रहा है।

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राजीव लोचन साह