सुविधाओं को तरसते सरकारी स्कूल


नैनीताल समाचार
October 10, 2018

नवीन चन्द्र कफल्टिया

शिक्षा सतत चलने वाली दीर्धकालिन प्रक्रिया है। शिक्षा व्यवस्था के सकारात्मक एवं उज्जवल स्वरूप को साकार करने के लिए अभिभावकों, विद्यार्थियों तथा शिक्षकों के साथ सरकार तथा व्यवस्था का समन्वित प्रयास आवश्यक है। सरकार द्वारा भौतिक एवं मानव संसाधनों की समुचित व्यवस्था, सम्बन्धित प्रशासन द्वारा शिक्षण संस्थाओं का उचित रख रखाव व प्रबन्धन जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण अभिभावकों, शिक्षकों व विद्यार्थियों का परस्पर सामंजस्य है। इनमें एक की उपेक्षा, शिथिलता शिक्षा की ज्योति को वैसे ही बुझा सकती है जैसे कि आक्सीजन, अग्नि ज्योति तथा ज्योतित होने वाले पदार्थों में एक के अलग हो जाने पर अग्नि की ज्योति बुझ जाती है।

शिक्षण संस्थानों में आवश्यक संसाधनों के साथ-साथ मानव संसाधनों की पूर्ति के बिना उत्कृष्ट शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। जिन विद्यालयों में छात्र संख्या न्यून हैं उन्हें अलग-अलग संचालित करने का औचित्य समझ में नहीं आता। ऐसे विद्यालयों की परस्पर दूरी कुछ मीटरों में होती है। इन विद्यालयों के विद्यार्थियों को समीप के विद्यालय में समायोजित कर भौतिक एवं मानव संसाधनों की बचत के साथ पूर्ण सदुपयोग किया जा सकता है। मेरा आशय उन विद्यालयों से है जो लगभग 400 से 600 मीटर के दायरे में स्थित हैं किन्तु वहाँ विद्यार्थियों की संख्या मानक से बहुत कम जब कि अध्यापक मानक से अधिक। औसतन एक अध्यापक पर दो से तीन, इण्टर में 10 से 11 विद्यार्थियों को शिक्षा देने का गुरुतर भार। समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के अनुसार उत्तराखण्ड सरकार ऐसे तीन हजार बेसिक और जूनियर स्कूलों का विलय करने का विचार कर रही है जिनमें दस से कम विद्यार्थी पंजीकृत हैं। इन स्कूलों के शिक्षकों को अन्य विद्यालयों में समायोजित किया जायेगा जिससे शिक्षकों की क्षमताओं का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा। यह आश्चर्य जनक है कि महाराष्ट्र में नाॅन ग्रान्ट टीचर तक निःशुल्क पढ़ाते हैं जब तक एक निश्चित सरकारी प्रक्रिया से उन अध्यापकों का चयन नहीं हो जाता। चयन के उपरान्त वर्ष वार क्रमशः 20 प्रतिशत, 40 प्रतिशत, 60 प्रतिशत, 80 प्रतिशत तथा 100 प्रतिशत वेतन दिया जाता है। हो सकता है चयन का अवसर पाँच वर्ष में प्राप्त हो।

निःशुल्क शिक्षा, गणवेष, मध्याहन भोजन की व्यवस्थाओं के उपरान्त भी अभिभावक अपने बच्चों को अधिक शुल्क का भार उठाकर अंग्रेजी (प्राइवेट) विद्यालयों में प्रवेश दिलाकर गौरवान्वित होने को अनुभव कर रहे है। या फिर सरकारी विद्यालयों के विकल्प के रुप में सरस्वती शिशु मंदिरों को प्राथमिकता देते हैं। उत्तराखण्ड राज्य में शिक्षा के लिए अन्य विभागों की तुलना में सर्वाधिक बजट आबंटित किया जाता है। आम जनों का यह विचार है कि राजनितिक महत्तवाकांक्षाओं के कारण विद्यालय तो बहुत खोल दिये जाते हैं किन्तु समुचित व्यवस्थाओं का अभाव रहता है। सवाल वहीं रह जाता है कि हैट बड़ा या खूँटा।

अध्यापकों की कमी या इच्छा शक्ति का अभाव ? अध्यापकों पर अध्यापन के अतिरिक्त अन्य कार्यों का दबाव ? कारण जो भी हो अन्ततः इसका खामियाजा हमारे नौनिहालों को ही भुगतना पड़ता है। कभी यह चर्चा भी चल पड़ती है कि मानकों को नजर अन्दाज कर धड़ाधड़ पब्लिक स्कूलों को मान्यता दे दी जाती है। अभिभावक एवं विद्यार्थियों के लिए बाध्यता नहीं है कि वे पब्लिक स्कूलों में ही प्रवेश करायें/प्रवेश लें। अभिभावकों को जहाँ अपने बच्चों का हित दिखाई देगा वे वहीं प्रवेश दिलायेंगे भले ही परिणाम कुछ भी हो। हमारी शिक्षा अंग्रेजियत के मकड़जाल में फंस रही है या सरकारी तंत्र में विश्वास की कमी हो रही है।

व्यक्तिगत रुप से मेरा मानना है कि सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की योग्यता पर सवाल खड़े नहीं किये जाने चाहिए क्योंकि सरकारी विद्यालयों में शिक्षक विशेष चयन पद्धति से सेवा में आते हैं। योग्यता के साथ अध्यापन कौशल उनकी विशेषता है। अपवाद स्वरूप कुछ अध्यापकों की लारपरवाही, उपेक्षा के कारनामे, समाचार पत्रों में छपते हैं। इस तरह की बातें सभी शिक्षकों पर लागू नहीं होती। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि विद्यार्थियों की मांग पर लगातार 6 घटे तक एक ही कक्षा में बिना रुके, बिना थके, प्रसन्नता से अध्यापन करने वाले शिक्षकों की कमी नहीं है।

जिन सरकारी विद्यालयों में छात्र संख्या कम हो रही है वहाँ छात्रों को आकर्षित कर पाने में सफलता क्यों नहीं मिल पा रही है? क्या समन्वित प्रयास का अभाव है? अथवा इच्छा शक्ति का अभाव? या फिर सेवा में आ जाने के बाद की निश्चिन्तता से उत्पन्न उपेक्षा? विद्यार्थियों में अपने बच्चों का प्रतिबिम्बन न कर पाने का कारण? कारण जो भी हो वास्तविकताओं को नजर अंदाज करने के परिणामों को अनदेखा करना समाज, प्रदेश व देश के लिए कल्याणप्रद नहीं हो सकता।

कदाचित कतिपय गुरुजनों के मुखारविन्द से यह भी सुनने को मिलता है कि हम भी उसी समाज के अंग हैं समाज से हमें भी प्रभावित होना पड़ता है। इससे इतर कुछ का मानना है कि शिक्षक ही समाज का निर्माता होता है। शिक्षक अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व की छाप छोड़ कर समाज को सकारात्मक बनाते हैं। हो सकता है उनमें से कुछ मानव स्वभाव वश अतिमहत्तवाकांक्षा की चपेट में आकर परम्परा से दूर हो रहे हों। यों तो सभी शिक्षक सेवा की शर्तों के संज्ञान में सेवा में सहमति देते हुए विभाग में आते हैं। देश-प्रदेश के किसी भी क्षेत्र में विद्यार्थी निवास करते हो वह स्थान अपने ही देश-प्रदेश का होता है। सुगम-दुर्गम वाला प्रश्न प्रतिष्टा से जुड़ा है या सुविधा से कहना मुश्किल है। प्रत्येक भूभाग में सेवा का अवसर देने की ऐसी व्यवस्था हो जिसमें सभी को एक निश्चित समयावधि में सेवा का सुअवसर प्राप्त हो सके किसी भी क्षेत्र अथवा भूभाग को कमतर मानना देश-प्रदेश रूपी अपने शरीर के किसी अंग को छोटा समझ लेने की भूल है।

दिन प्रतिदिन संयुक्त परिवारों का टूटना, पति-पत्नी दोनों का नौकरी करना, कहीं न कहीं अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी का बढ़ना, जल्दी ऊँचाइयों को छू लेने की तमन्ना, परिवार की सुरक्षा, सुविधा, यथाशीध्र स्थाई व्यवस्थाओं को संजो लेने की महत्तवाकाक्षाएँ भी अध्यापन में समर्पण से विरत करने के कारण हो? सुविधा सम्पन्न समाज के परिप्रेक्ष में यह सब स्वाभाविक लगता है किन्तु सुविधाओं के लिए तरसने वालों का क्या?

स्कूलों में बायोमैट्रिक मशीनों का उदय तथा औचक निरीक्षणों की अधिकता विश्वास के बिखरने का संकेत है। आंदोलनों के मौके तलाशने के बजाय विश्वास बहाली के उपायों को तलाशना समीचीन होगा। उत्तराखण्ड़ की शिक्षा यहाँ की संस्कृति है। अध्यापन का कार्य पुण्य का कार्य है। एक विद्यार्थी में बोये जाने वाले संस्कारों के बीज धरती पर मानवता का सुन्दर उपवन बना सकते हैं। प्रत्येक विद्यार्थी में अपने बच्चे का प्रतिबिम्बन करते हुए तन्मयता से किये गये अध्यापन से जो संतोष प्राप्त होता है वह किसी भी पुरस्कार से कम नहीें होता, कवि दुष्यन्त कुमार की निम्न पंक्तियों को शिक्षा की दृष्टि से जोड़ना भी उचित हो सकता है।
मेरे मन में नहीं, तेेरे मन में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

 

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